बिहार के छह जिलों में माताओं के दूध के सैंपल में यूरेनियम मिला, शिशुओं के लिए स्वास्थ्य जोखिम, ICMR समर्थित अध्ययन में खुलासा। 

बिहार के गंगा मैदानी इलाकों में एक चिंताजनक खोज सामने आई है। महावीर कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र, पटना की एक रिसर्च

Nov 26, 2025 - 12:43
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बिहार के छह जिलों में माताओं के दूध के सैंपल में यूरेनियम मिला, शिशुओं के लिए स्वास्थ्य जोखिम, ICMR समर्थित अध्ययन में खुलासा। 
बिहार के छह जिलों में माताओं के दूध के सैंपल में यूरेनियम मिला, शिशुओं के लिए स्वास्थ्य जोखिम, ICMR समर्थित अध्ययन में खुलासा। 

पटना। बिहार के गंगा मैदानी इलाकों में एक चिंताजनक खोज सामने आई है। महावीर कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र, पटना की एक रिसर्च में पाया गया कि छह जिलों की 40 माताओं के स्तन दूध के सैंपल में यूरेनियम की मौजूदगी है। यह अध्ययन भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के सहयोग से किया गया, जिसमें सभी 40 सैंपल्स में यूरेनियम-238 का पता चला। एकाग्रता 0 से 5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक पाई गई। अध्ययन के अनुसार, लगभग 70 प्रतिशत शिशुओं को गैर-कैंसर संबंधी स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे किडनी क्षति, हड्डियों का विकास बाधित होना और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं। हालांकि, विशेषज्ञों ने तत्काल घबराहट न करने की सलाह दी है, क्योंकि स्तर वैश्विक मानकों से कम हैं। यह खोज 20 नवंबर 2025 को 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' जर्नल में प्रकाशित हुई, जो भूमिगत पानी में यूरेनियम प्रदूषण की समस्या को और गहरा करती है।

यह अध्ययन अक्टूबर 2021 से जुलाई 2024 तक चला। महावीर कैंसर संस्थान के डॉ. अरुण कुमार और प्रो. अशोक घोष के नेतृत्व में यह रिसर्च की गई। इसमें दिल्ली के एम्स के डॉ. अशोक शर्मा, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, पंजाब और हाजीपुर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मास्यूटिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (NIPER) के विशेषज्ञ शामिल थे। ICMR ने फंडिंग प्रदान की, जिसका संदर्भ नंबर 5/10/FR/79/2020-RBMCH है। सैंपल्स छह जिलों - भोजपुर, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, कटिहार और नालंदा - से एकत्र किए गए। इन जिलों में 17 से 35 वर्ष की आयु की 40 माताओं को चयनित किया गया। प्रत्येक माता से सूचित सहमति ली गई। इंटरव्यू में स्तनपान की आदतें, बच्चे का विकास और आवासीय इतिहास पूछा गया। सैंपल्स स्टेरलाइज्ड फाल्कन ट्यूब्स में लिए गए, जिन्हें 2 से 6 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा गया। इन्हें कूल बॉक्स में पैक कर पटना के महावीर कैंसर संस्थान पहुंचाया गया। वहां ICP-MS (इंडक्टिवली कपल्ड प्लाज्मा मास स्पेक्ट्रोमेट्री) तकनीक से यूरेनियम-238 का विश्लेषण किया गया।

अध्ययन के नतीजे चौंकाने वाले थे। सभी 40 सैंपल्स में यूरेनियम पाया गया। उच्चतम स्तर 5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर था। शिशुओं के लिए खतरे का आकलन हेल्थ रिस्क इंडेक्स (HRI) से किया गया। 70 प्रतिशत मामलों में HRI 1 से अधिक पाया गया, जो गैर-कैंसर प्रभावों का संकेत देता है। किडनी पर असर सबसे बड़ा चिंता का विषय है, क्योंकि यूरेनियम किडनी को जमा हो जाता है। लंबे समय में हड्डियों का कमजोर होना, मूत्र संबंधी समस्याएं और न्यूरोडेवलपमेंटल डिसऑर्डर हो सकते हैं। माताओं के लिए भी जोखिम है, लेकिन शिशु अधिक संवेदनशील होते हैं। डॉ. अशोक शर्मा ने कहा कि स्रोत स्पष्ट नहीं है। भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (जीएसआई) भी जांच कर रहा है। संभावना है कि गंगा के मैदानी इलाकों में प्राकृतिक यूरेनियम प्रदूषण हो। बिहार में पहले भी ग्राउंडवाटर में यूरेनियम की समस्या रिपोर्ट हुई है। सुपौल में 82 माइक्रोग्राम प्रति लीटर, नालंदा में 77 और वैशाली में 66 तक पाया गया।

यह खोज बिहार के लिए चेतावनी है। गंगा बेसिन में भारी धातुओं का प्रदूषण पुरानी समस्या है। पहले महावीर कैंसर संस्थान ने ही लेड की मौजूदगी का अध्ययन किया था, जिसमें समस्तीपुर, दरभंगा, बेगूसराय, खगड़िया, मुंगेर और नालंदा में स्तन दूध में लेड पाया गया। लेड से शिशुओं के न्यूरोलॉजिकल विकास पर असर पड़ता है। यूरेनियम पर यह पहला विस्तृत अध्ययन है। विशेषज्ञों का कहना है कि तत्काल खतरा कम है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दूध में यूरेनियम का सुरक्षित स्तर 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक है। यहां 5.25 तक है, जो कम है। लेकिन लंबे संपर्क से जोखिम बढ़ सकता है। डॉ. अरुण कुमार ने कहा कि स्तनपान बंद न करें, क्योंकि दूध ही सबसे पौष्टिक है। इसके बजाय बायोमॉनिटरिंग और सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप जरूरी। सरकार को पानी की जांच और फिल्ट्रेशन सिस्टम लगाने चाहिए।

प्रकाशन के बाद मीडिया में खबर फैली। इंडिया टुडे, एनडीटीवी, इकोनॉमिक टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान जैसे अखबारों ने इसे प्रमुखता दी। सोशल मीडिया पर #UraniumInBreastMilkBihar ट्रेंड किया। कई यूजर्स ने सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग की। एक यूजर ने लिखा कि बिहार के बच्चे भविष्य की पीढ़ी हैं, प्रदूषण से बचाना जरूरी। विशेषज्ञों ने अध्ययन की वैधता पर सवाल उठाए। कुछ ने कहा कि सैंपल छोटे हैं, बड़े पैमाने पर जांच चाहिए। इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि कुछ वैज्ञानिकों ने कहा कि स्तर चिंताजनक नहीं, लेकिन निगरानी जरूरी। जीएसआई ने कहा कि बिहार में यूरेनियम प्राकृतिक है, लेकिन कृषि और औद्योगिक गतिविधियां बढ़ा रही हैं।

बिहार सरकार ने संज्ञान लिया। स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि प्रभावित जिलों में जांच अभियान चलेगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने निर्देश दिए कि पानी के स्रोतों की जांच हो। ICMR ने भी बयान जारी कर कहा कि अध्ययन महत्वपूर्ण है, लेकिन घबराहट न फैले। वे आगे के अध्ययन फंड करेंगे। महावीर कैंसर संस्थान ने जागरूकता अभियान शुरू किया। माताओं को सलाह दी कि वे उबला पानी पिएं और फिल्टर इस्तेमाल करें। शिशुओं के लिए नियमित चेकअप कराएं। वैश्विक स्तर पर यूरेनियम प्रदूषण की समस्या कई देशों में है। अमेरिका के कुछ इलाकों में भी ग्राउंडवाटर प्रभावित है। लेकिन बिहार जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में यह गंभीर है। यहां 13 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं, और गंगा पर निर्भरता अधिक।

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