बिहार विधान परिषद चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी चरम पर, उपेंद्र कुशवाहा के बेटे का नाम गायब होने से गहराया संकट
विधान परिषद की खाली हो रही सीटों पर होने वाले इस चुनाव के लिए एनडीए के भीतर सीटों का गणित इस तरह से बैठाया गया था कि सभी छोटे-बड़े सहयोगियों को साधा जा सके। लेकिन जब धरातल पर उम्मीदवारों के नामों का ऐलान हुआ, तो भारतीय जनता पार्टी और जनता दल
- एनडीए में नौवें उम्मीदवार को लेकर फंसा जबरदस्त पेंच, छोटे दलों की उपेक्षा से गठबंधन के भीतर असंतोष की सुगबुगाहट
- दीपक प्रकाश की मंत्री पद की कुर्सी पर मंडराए खतरे के बादल, छह महीने के भीतर सदन की सदस्यता लेने की संवैधानिक बाध्यता
बिहार में होने वाले विधान परिषद चुनाव को लेकर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के भीतर इस समय जबरदस्त घमासान देखने को मिल रहा है। गठबंधन के सबसे बड़े सहयोगी दलों ने जब से अपने प्रत्याशियों की घोषणा की है, तब से छोटे दलों के समीकरण पूरी तरह से बिगड़ चुके हैं। इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश का नाम सूची से गायब होना सबसे बड़ा चर्चा का विषय बन गया है। सीटों के बंटवारे में जिस तरह से उनके नाम को दरकिनार किया गया है, उसने गठबंधन की आंतरिक एकता और बड़े दलों के रवैये पर कई तरह के गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस निर्णय से नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सतह पर आने लगी है, जो आने वाले समय में राज्य की राजनीति को नया मोड़ दे सकती है।
विधान परिषद की खाली हो रही सीटों पर होने वाले इस चुनाव के लिए एनडीए के भीतर सीटों का गणित इस तरह से बैठाया गया था कि सभी छोटे-बड़े सहयोगियों को साधा जा सके। लेकिन जब धरातल पर उम्मीदवारों के नामों का ऐलान हुआ, तो भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड ने आपस में सीटों का बड़ा हिस्सा बांट लिया। इसके बाद जो उम्मीद की किरण लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के कोटे से बची हुई थी, वहां से भी एक अन्य नाम की घोषणा होने के बाद राष्ट्रीय लोक मोर्चा के लिए रास्ते पूरी तरह बंद हो गए। इस चुनावी चक्रव्यूह में उपेंद्र कुशवाहा के बेटे को जगह न मिलना केवल एक परिवार या पार्टी का नुकसान नहीं है, बल्कि यह गठबंधन के भीतर सत्ता के संतुलन के बदलने का सीधा संकेत माना जा रहा है।
इस पूरे सियासी ड्रामे के बीच दीपक प्रकाश के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनके मंत्री पद को बचाने की खड़ी हो गई है। वर्तमान में वह राज्य सरकार में पंचायती राज मंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, लेकिन वह राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। भारतीय संविधान के नियमों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने मंत्री पद की शपथ लेता है, तो उसे छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद में से किसी एक की सदस्यता ग्रहण करनी अनिवार्य होती है। दीपक प्रकाश ने मई के महीने में मंत्री पद की शपथ ली थी, जिसके बाद से उनके पास नवंबर के पहले सप्ताह तक का ही समय शेष है। इस विधान परिषद चुनाव को उनके लिए सदन में पहुंचने का सबसे सीधा और सुरक्षित रास्ता माना जा रहा था, जो अब हाथ से निकलता हुआ प्रतीत हो रहा है।
गठबंधन के इस फैसले ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा के नेतृत्व को पूरी तरह से असमंजस में डाल दिया है, क्योंकि पार्टी को यह उम्मीद थी कि उनके कोटे को हर हाल में सुरक्षित रखा जाएगा। सीटों की इस घोषणा के बाद से ही पटना से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में बैठकों का दौर शुरू हो चुका है, जहां इस बात पर माथापच्ची की जा रही है कि इस संकट का क्या समाधान निकाला जाए। हालांकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की तरफ से अभी तक संयम बरतने की बात कही जा रही है और नामांकन की अंतिम तिथि तक का इंतजार करने की सलाह दी जा रही है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस अनदेखी के कारण पार्टी के भीतर गहरे स्तर पर असंतोष पनप रहा है, जो कभी भी एक बड़े विवाद का रूप ले सकता है।
बिहार की मौजूदा विधानसभा में सीटों के संख्या बल को देखें तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास पूर्ण बहुमत मौजूद है, जिसके दम पर वह अधिकांश सीटों को आसानी से जीतने की स्थिति में है। प्रत्येक उम्मीदवार को जीत दर्ज करने के लिए एक निश्चित संख्या में विधायकों के मतों की आवश्यकता होती है, जो एनडीए के उम्मीदवारों के पास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। इसके बावजूद नौवीं सीट के लिए जिस तरह से आपसी समन्वय की कमी दिखाई दी है, उसने विपक्षी खेमे को भी एक बड़ा मौका दे दिया है। विपक्ष इस स्थिति का फायदा उठाने और एनडीए के भीतर मची इस रार को भुनाने की पूरी कोशिश कर रहा है, जिससे चुनाव का मुकाबला और भी ज्यादा दिलचस्प होने की उम्मीद है। अनुच्छेद 164(4) के तहत यदि कोई मंत्री छह महीने के भीतर विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं बनता है, तो उसकी मंत्री पद की पात्रता स्वतः समाप्त हो जाती है। गठबंधन के भीतर सीटों के वितरण की पुरानी व्यवस्था और बड़े दलों के एकाधिकार की प्रवृत्ति को एक बार फिर से सामने ला दिया है। अक्सर देखा गया है कि चुनाव के समय छोटे दलों को साथ रखने के लिए बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जब सीटों के वास्तविक आवंटन का समय आता है तो प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल जाती हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है जहां क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक समीकरणों की दुहाई देने वाले दल अपने ही सहयोगियों के हितों की रक्षा करने में नाकाम साबित हुए हैं। यह स्थिति आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भी गठबंधन के सहयोगियों के बीच अविश्वास की खाई को और चौड़ा कर सकती है।
What's Your Reaction?







