प्रयागराज के साइंस ग्रेजुएट शैलेंद्र कुमार सिंह गौर का क्रांतिकारी इंजन, माइलेज और प्रदूषण नियंत्रण में नया कीर्तिमान। 

Prayagraj: प्रयागराज के साइंस ग्रेजुएट शैलेंद्र कुमार सिंह गौर ने एक ऐसे इंजन का प्रोटोटाइप विकसित करने का दावा किया है, जो ऑटोमोबाइल उद्योग में...

Aug 19, 2025 - 11:29
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प्रयागराज के साइंस ग्रेजुएट शैलेंद्र कुमार सिंह गौर का क्रांतिकारी इंजन, माइलेज और प्रदूषण नियंत्रण में नया कीर्तिमान। 
प्रयागराज के साइंस ग्रेजुएट शैलेंद्र कुमार सिंह गौर का क्रांतिकारी इंजन, माइलेज और प्रदूषण नियंत्रण में नया कीर्तिमान। 

प्रयागराज के साइंस ग्रेजुएट शैलेंद्र कुमार सिंह गौर ने एक ऐसे इंजन का प्रोटोटाइप विकसित करने का दावा किया है, जो ऑटोमोबाइल उद्योग में क्रांति ला सकता है। उनके इस इंजन ने 100 सीसी की बाइक पर 176 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज हासिल किया है, जो सामान्य इंजनों की तुलना में कई गुना अधिक है। शैलेंद्र का कहना है कि उनकी तकनीक न केवल माइलेज को बढ़ाती है, बल्कि प्रदूषण को भी लगभग खत्म कर देती है। इस तकनीक को विकसित करने के लिए उन्होंने अपनी संपत्ति बेच दी और किराए के घर को वर्कशॉप में बदल लिया। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है।

शैलेंद्र कुमार सिंह गौर, जो प्रयागराज विश्वविद्यालय के स्नातक हैं, ने इंटरनल कंबशन (आईसी) इंजन में एक मौलिक बदलाव करके इस प्रोटोटाइप को विकसित किया है। उनके अनुसार, पारंपरिक इंजन में पिस्टन का अधिकतम थ्रस्ट (जोर) 25 डिग्री पर होता है, जिसके कारण ईंधन की ऊर्जा का केवल 30% हिस्सा ही उपयोग में आता है। शैलेंद्र ने अपनी तकनीक में इस थ्रस्ट को 60 डिग्री पर सेट किया, जिससे इंजन 70% तक ऊर्जा का उपयोग कर पाता है। इससे न केवल माइलेज में अभूतपूर्व वृद्धि होती है, बल्कि ईंधन की बर्बादी भी कम होती है। उनके प्रोटोटाइप ने 2017 मॉडल की 100 सीसी टीवीएस बाइक पर 50 मिलीलीटर पेट्रोल में 35 मिनट तक चलकर 176 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज दिया। शैलेंद्र का दावा है कि पर्याप्त फंडिंग और संसाधनों के साथ यह आंकड़ा 200 किलोमीटर प्रति लीटर से भी अधिक हो सकता है। इस तकनीक की एक और खासियत इसका प्रदूषण नियंत्रण है। शैलेंद्र के अनुसार, उनके इंजन से निकलने वाला कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ) लगभग शून्य है, और साइलेंसर का तापमान भी सामान्य इंजनों की तुलना में बहुत कम रहता है। इससे वाहन न केवल पर्यावरण के लिए अनुकूल बनता है, बल्कि इसका रखरखाव भी आसान हो जाता है। उनकी तकनीक की बहुमुखी प्रतिभा इस बात में भी नजर आती है कि यह पेट्रोल, डीजल, सीएनजी, और इथेनॉल जैसे विभिन्न ईंधनों के साथ काम कर सकती है। यह विशेषता इसे भारत जैसे देशों के लिए खास तौर पर उपयोगी बनाती है, जहां विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग ईंधन का उपयोग होता है।

शैलेंद्र की इस यात्रा में कई चुनौतियां आईं। फंडिंग की कमी के कारण उन्होंने अपनी सारी संपत्ति बेच दी और अपने किराए के घर को ही वर्कशॉप में बदल लिया। इस दौरान उन्होंने मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एमएनएनआईटी), प्रयागराज में प्रोफेसर अनुज जैन के साथ छह महीने तक रोजाना 5-6 घंटे काम किया। इस सहयोग से उन्हें इंजन की बारीकियों को समझने और अपनी तकनीक को परिष्कृत करने में मदद मिली। प्रोफेसर जैन ने उनके दृष्टिकोण और समर्पण की सराहना की है, हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर लागू करने के लिए और अधिक परीक्षण और संसाधनों की जरूरत होगी। शैलेंद्र ने अपनी तकनीक को टाटा मोटर्स के सामने भी प्रस्तुत किया। कुछ समय पहले, उन्होंने टाटा मोटर्स की यूके शाखा के प्रमुख से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने अपनी तकनीक का प्रोटोटाइप दिखाया, जिसे बनाने का सुझाव कंपनी ने ही दिया था। इससे पहले, शैलेंद्र ने एक अन्य प्रोटोटाइप पर काम किया था, जिसने 120 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज दिया था। हालांकि, उस समय टाटा मोटर्स की रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) टीम ने उनके प्रोटोटाइप को खारिज कर दिया था। बाद में, कंपनी के मालिक के हस्तक्षेप के बाद उनकी तकनीक की क्षमता को पहचाना गया। टाटा मोटर्स ने अभी तक इस प्रोटोटाइप के लिए कोई आधिकारिक फंडिंग प्रदान नहीं की है, लेकिन शैलेंद्र का कहना है कि वह अपनी तकनीक को और बेहतर बनाने के लिए कंपनी के साथ सहयोग करने को तैयार हैं।

इस प्रोटोटाइप ने ऑटोमोबाइल उद्योग में नई संभावनाओं को जन्म दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर शैलेंद्र के दावे सही साबित होते हैं, तो यह तकनीक न केवल भारत बल्कि वैश्विक स्तर पर वाहन उद्योग को बदल सकती है। भारत में, जहां ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और प्रदूषण एक बड़ी समस्या है, शैलेंद्र की तकनीक एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह इंजन कार्बन उत्सर्जन को लगभग शून्य तक कम कर सकता है, तो यह भारत के 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को 45% तक कम करने के लक्ष्य में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। शैलेंद्र की इस उपलब्धि ने सोशल मीडिया पर भी खूब चर्चा बटोरी है। कई यूजर्स ने इसे भारतीय नवाचार का शानदार उदाहरण बताया है। एक यूजर ने लिखा, "यह प्रयागराज से निकली एक नई क्रांति है। शैलेंद्र जैसे लोग भारत को तकनीकी क्षेत्र में विश्व गुरु बना सकते हैं।" हालांकि, कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि क्या यह तकनीक बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए व्यावहारिक होगी। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के प्रोटोटाइप को व्यावसायिक स्तर पर लागू करने के लिए कई तकनीकी और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। शैलेंद्र ने अपनी तकनीक को और विकसित करने के लिए फंडिंग की जरूरत पर जोर दिया है। उनका कहना है कि अगर उन्हें पर्याप्त संसाधन और समर्थन मिले, तो वह इस इंजन को कार, ट्रक, और अन्य वाहनों के लिए भी अनुकूल बना सकते हैं। उन्होंने सरकार और निजी कंपनियों से इस प्रोजेक्ट में निवेश करने की अपील की है। भारत सरकार की 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत इस तरह के नवाचारों को बढ़ावा देने की नीति है, और शैलेंद्र को उम्मीद है कि उनकी तकनीक को सरकारी समर्थन मिल सकता है।

इस तकनीक की संभावनाओं को देखते हुए, कुछ विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि इसे राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षण के लिए भेजा जाना चाहिए। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (एनआईटी) जैसे संस्थानों में इस प्रोटोटाइप का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जा सकता है। इससे इसकी विश्वसनीयता और व्यावसायिक उपयोगिता को और बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा। शैलेंद्र की कहानी प्रेरणादायक है। एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले इस साइंस ग्रेजुएट ने अपनी मेहनत, लगन, और नवाचार की भावना से एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए फायदेमंद हो सकती है। उनकी इस यात्रा में कई बाधाएं आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनके इस समर्पण ने न केवल स्थानीय समुदाय बल्कि पूरे देश में लोगों को प्रेरित किया है। हालांकि, इस तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले कई सवालों के जवाब ढूंढने होंगे। क्या यह इंजन विभिन्न प्रकार के वाहनों और परिस्थितियों में उतना ही प्रभावी होगा? क्या इसे बड़े पैमाने पर उत्पादन करना आर्थिक रूप से व्यवहार्य होगा? इन सवालों के जवाब भविष्य में इस तकनीक की सफलता को निर्धारित करेंगे।

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