मथुरा में हिंसक बंदरों का खौफ: शादी से पहले पिंगारी गांव में छत से गिरकर व्यक्ति की मौत, परिजनों में मचा कोहराम।

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी मथुरा में इन दिनों बंदरों का आतंक अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है। कान्हा की नगरी में बंदरों की बढ़ती

Apr 28, 2026 - 12:02
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मथुरा में हिंसक बंदरों का खौफ: शादी से पहले पिंगारी गांव में छत से गिरकर व्यक्ति की मौत, परिजनों में मचा कोहराम।
मथुरा में हिंसक बंदरों का खौफ: शादी से पहले पिंगारी गांव में छत से गिरकर व्यक्ति की मौत, परिजनों में मचा कोहराम।
  • बंदरों के डर से घरों में कैद होने को मजबूर हुए ब्रजवासी, फरह क्षेत्र की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल
  • बेटी की शादी की खुशियां मातम में बदलीं: बंदरों के हमले से पिता की मौत, मथुरा में बढ़ता जा रहा है बेकाबू बंदरों का आतंक

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी मथुरा में इन दिनों बंदरों का आतंक अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है। कान्हा की नगरी में बंदरों की बढ़ती संख्या और उनके आक्रामक व्यवहार ने स्थानीय निवासियों और दर्शनार्थियों के जीवन को संकट में डाल दिया है। आलम यह है कि शहर की गलियों से लेकर घरों की छतों तक अब बंदरों का कब्जा है, जिससे लोगों का अपने ही घरों में कैद होने जैसी स्थिति पैदा हो गई है। हाल ही में फरह क्षेत्र के पिंगारी गांव में हुई एक दर्दनाक घटना ने प्रशासन की मुस्तैदी और बंदरों के इस हिंसक होते व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहाँ एक व्यक्ति को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। मथुरा जिले के फरह थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पिंगारी गांव में रविवार को एक हृदयविदारक हादसा हुआ। गांव निवासी 48 वर्षीय अमर सिंह उर्फ भोलू अपने घर की छत पर बारिश के कारण भीगे हुए गेहूं सुखाने के लिए गए थे। जैसे ही वे काम में जुटे, वहां पहले से घात लगाकर बैठे बंदरों के एक बड़े झुंड ने उन पर अचानक हमला कर दिया। बंदरों की आक्रामकता देख अमर सिंह घबरा गए और खुद को बचाने के प्रयास में उनका संतुलन बिगड़ गया। संतुलन खोने के कारण वे सीधे छत से नीचे जमीन पर आ गिरे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं। बेहोशी की हालत में परिजन उन्हें तुरंत आगरा के एक निजी अस्पताल ले गए, जहाँ उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। अमर सिंह की मौत ने पूरे गांव को शोक में डुबो दिया है, लेकिन सबसे अधिक दुखद पहलू यह है कि आगामी 10 मई को उनकी बेटी की शादी तय थी। घर में जिस समय मंगल गीत गूंजने चाहिए थे और विवाह की तैयारियां जोरों पर थीं, उस समय अब अंतिम संस्कार की रस्मों का सन्नाटा पसरा हुआ है। मृतक अपने पीछे चार बेटियां और तीन बेटों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं, जिनका भविष्य अब अंधकारमय नजर आ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन ने समय रहते बंदरों की समस्या का समाधान निकाला होता, तो आज एक पिता अपनी बेटी की डोली उठते हुए देख पाता।

मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन और बरसाना जैसे क्षेत्रों में बंदरों की समस्या केवल एक सामान्य परेशानी नहीं, बल्कि एक जानलेवा संकट बन चुकी है। यहाँ के बंदर अब इतने निडर और हिंसक हो गए हैं कि वे लोगों के हाथों से सामान छीनने के साथ-साथ सीधे हमला करने से भी नहीं हिचकते। विशेष रूप से चश्मा, मोबाइल और खाने-पीने की वस्तुएं उनके निशाने पर रहती हैं। संकरी गलियों में चलना अब खतरे से खाली नहीं रह गया है। स्थानीय प्रशासन और वन विभाग द्वारा चलाए गए बंदर पकड़ने के अभियान अब तक नाकाफी साबित हुए हैं, जिससे जनता में गहरा रोष व्याप्त है। बंदरों के इस बढ़ते आतंक को देखते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है। न्यायालय ने मथुरा और गाजियाबाद जैसे जिलों के लिए एक प्रभावी 'स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर' (SOP) तैयार करने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन अब बंदरों की नसबंदी और उनके व्यवहार के अध्ययन के लिए एक विस्तृत सर्वे कराने की योजना बना रहा है, ताकि भविष्य में इस तरह की जानलेवा भिड़ंत को रोका जा सके।

जंगली क्षेत्रों की कमी और शहरीकरण के कारण बंदर अब पूरी तरह से मानवीय बस्तियों पर निर्भर हो गए हैं। मंदिरों के आसपास मिलने वाले भोजन ने उनकी प्राकृतिक भोजन तलाशने की प्रवृत्ति को बदल दिया है। जब उन्हें आसानी से भोजन नहीं मिलता, तो वे आक्रामक हो जाते हैं। पिंगारी गांव की घटना यह दर्शाती है कि बंदर अब केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में भी उनका आतंक फैलता जा रहा है। छतों पर चढ़ना, पानी की टंकियां तोड़ना और खिड़कियों के जाल काटकर घर के भीतर घुसना उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों में शामिल हो गया है। प्रशासनिक स्तर पर बंदरों के खिलाफ कार्रवाई करने में कई चुनौतियां भी सामने आती हैं। धार्मिक आस्था के कारण कई बार लोग बंदरों को खिलाना बंद नहीं करते, जो उनकी आबादी बढ़ने का एक मुख्य कारण है। इसके अलावा, बंदरों को पकड़कर दूसरे जंगलों में छोड़ने पर भी समस्या का हल नहीं होता, क्योंकि वे वहां से वापस लौट आते हैं या नए क्षेत्रों में आतंक मचाना शुरू कर देते हैं। हाल ही में राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान लंगूरों के कट-आउट लगाए गए थे, लेकिन यह केवल एक अस्थायी समाधान था। स्थायी समाधान के लिए बड़े पैमाने पर नसबंदी केंद्र और वानर सफारी जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम करने की आवश्यकता है।

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