रक्षा विशेषज्ञ मेजर मारूफ रजा का 67 वर्ष की आयु में निधन, सेना, मीडिया और साहित्य जगत में शोक की लहर, पीएम मोदी ने जताया शोक। 

भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर और प्रसिद्ध रक्षा विशेषज्ञ मारूफ रजा का 26 फरवरी 2026 को निधन हो गया। वे 67 वर्ष के थे और पिछले कई

Feb 27, 2026 - 14:07
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रक्षा विशेषज्ञ मेजर मारूफ रजा का 67 वर्ष की आयु में निधन, सेना, मीडिया और साहित्य जगत में शोक की लहर, पीएम मोदी ने जताया शोक। 
रक्षा विशेषज्ञ मेजर मारूफ रजा का 67 वर्ष की आयु में निधन, सेना, मीडिया और साहित्य जगत में शोक की लहर, पीएम मोदी ने जताया शोक। 

भारतीय सेना के रिटायर्ड मेजर और प्रसिद्ध रक्षा विशेषज्ञ मारूफ रजा का 26 फरवरी 2026 को निधन हो गया। वे 67 वर्ष के थे और पिछले कई महीनों से कैंसर सहित गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। उनका अंतिम समय फोर्टिस अस्पताल, गुरुग्राम में बीत रहा, जहां वे क्रिटिकल केयर में थे और लाइफ सपोर्ट पर रखे गए थे। मारूफ रजा का जन्म 1959 में हुआ था और उन्होंने भारतीय सेना में 1980 से 1994 तक सेवा दी, जिसमें काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशंस में महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त किया। उनकी मृत्यु से रक्षा, रणनीतिक मामलों और मीडिया जगत में गहरा शोक व्याप्त है, क्योंकि वे राष्ट्रीय सुरक्षा, भारत-पाकिस्तान संबंधों और कश्मीर मुद्दों पर अपनी गहन जानकारी और संतुलित विश्लेषण के लिए जाने जाते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया और कहा कि उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा पर अपनी सूक्ष्म समझ से सार्वजनिक बहस को समृद्ध किया।

मारूफ रजा की शिक्षा और करियर काफी प्रभावशाली रहा। उन्होंने मेयो कॉलेज, अजमेर से शुरुआत की, जहां वे बैच 1975 के स्कूल कैप्टन थे। उसके बाद दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में ऑनर्स किया। उच्च शिक्षा के लिए वे ब्रिटेन गए, जहां किंग्स कॉलेज लंदन से वॉर स्टडीज में एमए और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल रिलेशंस में एमफिल किया। 1980 में भारतीय सेना में कमीशन होने के बाद उन्होंने ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट और मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री में सेवा की। उन्होंने नॉर्थ ईस्ट इंडिया में काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशंस में हिस्सा लिया और इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून में इंस्ट्रक्टर के रूप में भी काम किया। 1994 में वे सेना से रिटायर हुए, लेकिन रक्षा और रणनीतिक मामलों में सक्रिय रहे।

सेना से रिटायरमेंट के बाद मारूफ रजा ने मीडिया और लेखन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे टाइम्स नाउ के कंसल्टिंग एडिटर (स्ट्रैटेजिक अफेयर्स) थे और वीकेंड शो 'लैटिट्यूड' होस्ट करते थे। संसद टीवी पर 'द डिफेंडर्स' शो भी उनकी मेजबानी में प्रसारित होता था। उन्होंने 'लाइन ऑफ ड्यूटी' नामक मिलिट्री डॉक्यूमेंट्री सीरीज बनाई, जो भारत की पहली ऐसी सीरीज थी और रोम फिल्म फेस्टिवल में अवॉर्ड जीता तथा लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में शामिल हुई। उनकी किताबें जैसे 'लो-इंटेंसिटी कॉन्फ्लिक्ट्स', 'वॉर्स एंड नो पीस ओवर कश्मीर', 'जनरल्स एंड गवर्नमेंट्स इन इंडिया एंड पाकिस्तान' और 'कॉन्फ्रंटिंग टेररिज्म' रक्षा अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। वे 'सल्यूट टू द इंडियन सोल्जर' मैगजीन के पब्लिशर भी थे और विभिन्न संस्थानों में लेक्चर देते थे।

मारूफ रजा की विशेषज्ञता मुख्य रूप से दक्षिण एशियाई संघर्षों, भारत-चीन बॉर्डर विवादों, कश्मीर मुद्दे और भारत-पाकिस्तान संबंधों पर केंद्रित थी। वे टेलीविजन डिबेट्स में अपनी स्पष्ट और जिम्मेदार राय के लिए प्रसिद्ध थे, जहां वे सैनिक की आवाज को जनता तक पहुंचाते थे। उनकी टिप्पणियां अक्सर संतुलित और तथ्य-आधारित होती थीं, जिससे वे विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों के बीच सम्मानित थे। उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों जैसे सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, हेनरी एल. स्टिमसन सेंटर और किंग्स कॉलेज में विजिटिंग फेलोशिप की। 1994 में उन्हें टाइम्स ऑफ इंडिया फेलोशिप मिली थी। उनकी विद्वता और सैन्य अनुभव ने उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा पर एक विश्वसनीय आवाज बनाया।

निधन के बाद विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धांजलि आई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि मारूफ रजा जी के निधन से उन्हें गहरा दुख हुआ है और उनके परिवार को शोक संवेदना व्यक्त की। रक्षा मंत्रालय और सेना के पूर्व अधिकारी उन्हें एक सच्चे सैनिक और विद्वान के रूप में याद कर रहे हैं। उनकी अंत्येष्टि 27 फरवरी 2026 को गुरुग्राम के अंजुमन बागिया, सेक्टर 56 में दोपहर 3:45 बजे हुई, जहां मिलिट्री मेमोरियल सर्विस भी आयोजित की गई। कई पूर्व सैनिकों और मीडिया सहयोगियों ने उन्हें 'ऑफिसर एंड जेंटलमैन' कहा और उनकी बहादुरी तथा बौद्धिक योगदान को सलाम किया।

मारूफ रजा की विरासत भारतीय रक्षा विश्लेषण में अमिट रहेगी। उन्होंने जटिल सैन्य और रणनीतिक मुद्दों को आम जनता के लिए सरल भाषा में समझाया, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर जन जागरूकता बढ़ी। उनकी मृत्यु से एक युग का अंत हुआ, जहां सैन्य अनुभव और अकादमिक गहराई का संयोजन दुर्लभ था। वे कई युवा विश्लेषकों और पत्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहे। उनकी किताबें और टीवी कमेंट्री आज भी रक्षा अध्ययन में संदर्भ के रूप में इस्तेमाल होती हैं।

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