SC की केंद्र और महाराष्ट्र को चेतावनी- NIA मामलों के लिए विशेष अदालतें बनाएं, नहीं तो आरोपियों को जमानत देनी पड़ेगी।
Maharashtra News: SC ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (UAPA) जैसे विशेष कानूनों के तहत दर्ज मामलों की....
SC ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (UAPA) जैसे विशेष कानूनों के तहत दर्ज मामलों की सुनवाई में देरी को लेकर केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि सितंबर 2025 तक इन मामलों के लिए विशेष अदालतें स्थापित नहीं की गईं, तो विचाराधीन कैदियों को जमानत देने पर विचार करना पड़ सकता है। यह टिप्पणी जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने 2019 के गढ़चिरौली IED विस्फोट मामले में आरोपी कैलाश रामचंदानी की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की। इस मामले में 15 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे, और रामचंदानी 2019 से जेल में हैं। SC ने केंद्र और राज्यों की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि विशेष अदालतों की कमी से न्याय प्रक्रिया कमजोर हो रही है।
SC ने 18 जुलाई 2025 को केंद्र और महाराष्ट्र सरकार को चार सप्ताह का समय दिया ताकि वे NIA और UAPA जैसे विशेष कानूनों के तहत मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों की स्थापना पर जवाब दें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि समयबद्ध सुनवाई के लिए जरूरी ढांचा नहीं बनाया गया, तो विचाराधीन कैदियों को जमानत देना मजबूरी होगी। यह टिप्पणी उस समय आई जब कोर्ट गढ़चिरौली मामले में कैलाश रामचंदानी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। रामचंदानी पर माओवादी समर्थक होने का आरोप है, और वे छह साल से जेल में हैं, बिना आरोप तय हुए। उनके सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है।
SC ने अपने 17 मार्च 2025 के आदेश को भी वापस लिया, जिसमें रामचंदानी की जमानत याचिका खारिज की गई थी। कोर्ट ने कहा कि यदि अगली सुनवाई तक विशेष अदालतें स्थापित नहीं होतीं, तो याचिका पर राहत दी जा सकती है। जस्टिस सूर्यकांत ने नाराजगी जताते हुए कहा, “आप विशेष कानूनों के तहत मुकदमा चलाना चाहते हैं, लेकिन त्वरित सुनवाई की व्यवस्था नहीं है।” कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि मुंबई में एक मौजूदा अदालत को NIA मामलों के लिए नामित करना कैसे विशेष अदालत की स्थापना माना जा सकता है, जब वह पहले से ही अन्य मामलों में व्यस्त है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) 2008 में गठित एक केंद्रीय एजेंसी है, जिसे आतंकवाद, माओवादी गतिविधियों, और अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अपराधों की जांच का अधिकार है। NIA अधिनियम 2008 की धारा 11 और 22 के तहत केंद्र सरकार को विशेष अदालतें स्थापित करने की जिम्मेदारी दी गई है, जो इन मामलों की त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करें। ये अदालतें सत्र न्यायालय की शक्तियों के साथ काम करती हैं और इन्हें प्राथमिकता के आधार पर रोजाना सुनवाई करनी होती है।
हालांकि, SC ने बार-बार इस बात पर चिंता जताई है कि केंद्र और राज्य सरकारें विशेष अदालतों की स्थापना में विफल रही हैं। कोर्ट ने 9 मई 2025 को केंद्र और राज्यों से विशेष अदालतों की स्थिति स्पष्ट करने को कहा था, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। 23 मई 2025 को कोर्ट ने फिर आदेश दिया कि NIA मामलों के लिए विशेष अदालतें बनाई जाएं, ताकि जघन्य अपराधों से जुड़े माम,Vance, and other marginalized groups, as well as marital disputes, will face further delays. This compromises the judicial process and the rights of undertrial prisoners.
18 अप्रैल 2019 को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले में माओवादियों द्वारा किए गए एक IED विस्फोट में राज्य पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया टीम के 15 जवान शहीद हो गए थे। इस मामले में कैलाश रामचंदानी को माओवादी समर्थक के रूप में गिरफ्तार किया गया था। वे 2019 से जेल में हैं, और उनके खिलाफ अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं। SC ने इस बात पर चिंता जताई कि छह साल बाद भी मुकदमा शुरू नहीं हुआ, जो विचाराधीन कैदियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि यदि विशेष अदालतें नहीं बनाई गईं, तो ऐसे मामलों में जमानत देना अनिवार्य हो सकता है, क्योंकि लंबी हिरासत न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
SC ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि विशेष अदालतों की कमी से न केवल NIA और UAPA मामलों में देरी हो रही है, बल्कि अन्य मामलों, जैसे वरिष्ठ नागरिकों, वैवाहिक विवादों, और हाशिए के समुदायों से जुड़े मामलों की सुनवाई भी प्रभावित हो रही है। मौजूदा अदालतों पर पहले से ही भारी बोझ है, और उन्हें NIA मामलों के लिए नामित करना अन्य मामलों में देरी को और बढ़ाता है। कोर्ट ने कहा कि विशेष अदालतों के लिए अलग से जजों की नियुक्ति, कर्मचारियों की भर्ती, और बुनियादी ढांचे का निर्माण जरूरी है।
जस्टिस सूर्यकांत ने NIA के अवर सचिव द्वारा दायर हलफनामे पर असंतोष जताया, जिसमें कोई प्रभावी कदम नहीं दिखाए गए। कोर्ट ने कहा कि विशेष अदालतों की स्थापना के लिए उच्च न्यायिक सेवा कैडर में नए पदों का सृजन और मंत्रालयिक कर्मचारियों की नियुक्ति आवश्यक है। यदि यह नहीं हुआ, तो विचाराधीन कैदियों को जमानत देना न्यायालयों की मजबूरी होगी, क्योंकि समयबद्ध सुनवाई संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है।
भारत में विचाराधीन कैदियों की लंबी हिरासत एक गंभीर मुद्दा है। SC ने पहले भी कहा है कि यदि मुकदमे समय पर पूरे नहीं होते, तो गंभीर अपराधों में भी जमानत देना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, एल्गार परिषद-माओवादी लिंक मामले में 83 वर्षीय वरवरा राव को 2022 में स्वास्थ्य आधार पर जमानत दी गई थी। इसी तरह, शोमा कांति सेन ने 2023 में स्वास्थ्य आधार पर जमानत की मांग की थी, क्योंकि वे पांच साल से जेल में थीं और उनका मुकदमा शुरू नहीं हुआ था।
जमानत का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी व्यक्ति बिना उचित प्रक्रिया के अपनी स्वतंत्रता से वंचित न हो। SC ने कहा कि जमानत केवल उन मामलों में दी जानी चाहिए, जहां यह सुनिश्चित हो कि आरोपी कोर्ट में उपस्थित होगा। हालांकि, लंबी हिरासत और सुनवाई में देरी इस अधिकार का उल्लंघन करती है।
NIA को आतंकवाद, मनी लॉन्ड्रिंग, और माओवादी गतिविधियों जैसे जघन्य अपराधों की जांच का जिम्मा सौंपा गया है। UAPA जैसे कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तारियां अक्सर बिना पुख्ता सबूतों के होती हैं, जिससे विचाराधीन कैदियों की संख्या बढ़ती है। SC ने कहा कि इन मामलों की गंभीरता के बावजूद, त्वरित सुनवाई के बिना न्याय प्रक्रिया कमजोर होती है।
महाराष्ट्र के मालेगांव बम विस्फोट मामले में NIA विशेष अदालत ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर को 2025 में बयान दर्ज करने का आदेश दिया था, लेकिन ऐसे कई मामले लंबित हैं। विशेष अदालतों की कमी से इन मामलों में देरी होती है, जिससे आरोपियों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है।
केंद्र और महाराष्ट्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल राजकुमार भास्कर ठाकरे ने दलील दी कि मुंबई में एक अदालत को NIA मामलों के लिए नामित किया गया है। लेकिन SC ने इसे अपर्याप्त माना, क्योंकि यह अदालत पहले से ही अन्य मामलों में व्यस्त है। कोर्ट ने कहा कि विशेष अदालतों का मतलब अलग से बुनियादी ढांचा और संसाधन है, न कि मौजूदा अदालतों पर अतिरिक्त बोझ डालना।
महाराष्ट्र सरकार ने यह भी तर्क दिया कि NIA मामलों की संख्या सीमित है, लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि मामलों की गंभीरता को देखते हुए त्वरित सुनवाई जरूरी है। कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को चार सप्ताह में ठोस कदम उठाने का निर्देश दिया, जिसमें नए जजों की नियुक्ति और बुनियादी ढांचे का विकास शामिल है।
SC की यह चेतावनी भारत में न्यायिक सुधारों की जरूरत को उजागर करती है। विचाराधीन कैदियों की संख्या भारत की जेलों में 70% से अधिक है, और विशेष अदालतों की कमी इस समस्या को और बढ़ाती है। लंबी हिरासत न केवल आरोपियों के अधिकारों का हनन करती है, बल्कि यह समाज में न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास को भी बढ़ावा देती है।
सोशल मीडिया पर इस मामले ने भी ध्यान खींचा। X पर कई यूजर्स ने कोर्ट के रुख की सराहना की, एक ने लिखा, “SC ने सही कहा। बिना सुनवाई के सालों तक जेल में रखना अन्याय है।” एक अन्य ने कहा, “NIA और UAPA के दुरुपयोग को रोकने के लिए विशेष अदालतें जरूरी हैं।” ये प्रतिक्रियाएं दिखाती हैं कि जनता भी त्वरित न्याय की मांग कर रही है।
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