Delhi Police Vs CJP Controversy: दिल्ली पुलिस के दावे पर मचा बवाल, हाई कोर्ट पहुंचा मामला; जानें पूरा घटनाक्रम

दिल्ली में CJP प्रदर्शन के दौरान 2873 गंभीर आरोपियों की मौजूदगी के दिल्ली पुलिस के दावे पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच चुका है। पढ़ें पूरी खबर।

Jul 28, 2026 - 11:22
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Delhi Police Vs CJP Controversy: दिल्ली पुलिस के दावे पर मचा बवाल, हाई कोर्ट पहुंचा मामला; जानें पूरा घटनाक्रम
Delhi High Court CJP Case
  • CJP Protest Case: 2,873 आरोपियों की मौजूदगी का दावा, दिल्ली पुलिस के बयान पर सरकार और विपक्ष आमने-सामने
  • '2873 हत्या और रेप के आरोपी!' दिल्ली पुलिस के इस दावे से क्यों गरमाई राजनीति? HC तक पहुंचा मामला
  • CJP प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस के बयान से विवाद: हाई कोर्ट पहुंचा मामला, केंद्र और दिल्ली पुलिस से जवाब तलब

देश की राजधानी नई दिल्ली में सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के हालिया प्रदर्शन को लेकर एक नया कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। दिल्ली पुलिस ने अदालत में हलफनामा दाखिल कर दावा किया है कि इस विरोध प्रदर्शन में हत्या, बलात्कार और अन्य गंभीर अपराधों में शामिल लगभग 2,873 आरोपी और संदिग्ध मौजूद थे। पुलिस का यह दावा उनके फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) तकनीक के विश्लेषण पर आधारित है। इस बयान के बाद गृह मंत्रालय, केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस विपक्ष के निशाने पर आ गए हैं। इस पूरे घटनाक्रम और पुलिस द्वारा इस्तेमाल की गई निगरानी तकनीक की निष्पक्षता को चुनौती देते हुए यह मामला अब दिल्ली हाई कोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है, जहां अदालत ने संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है।

मामला सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के हवाले से इस प्रदर्शन की निगरानी के लिए फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) यानी चेहरा पहचानने वाली आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया था। प्रदर्शन समाप्त होने के बाद, पुलिस द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट और अदालत में प्रस्तुत जानकारियों में यह दावा किया गया कि भीड़ में 2,800 से अधिक ऐसे लोग शामिल थे जिनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है या जो हत्या और बलात्कार जैसे संगीन मामलों में आरोपी/संदिग्ध हैं।

इस खुलासे के सार्वजनिक होते ही नागरिक अधिकार संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। विरोध करने वाले पक्षों का कहना है कि यह दावा लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार को दबाने और प्रदर्शनकारियों को गलत तरीके से संदिग्ध बनाने की कोशिश है।

इस पूरे विवाद की शुरुआत CJP के उस प्रदर्शन से हुई, जिसकी अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर स्थानीय प्रशासन व पुलिस मुस्तैद थी।

सीसीटीवी व एफआरएस तकनीक का प्रयोग: पुलिस ने इलाके में लगाए गए कैमरों के जरिए भीड़ की मैपिंग की। FRS डेटाबेस को दिल्ली पुलिस के क्रिमिनल रिकॉर्ड सिस्टम से मैच किया गया।

पुलिस का दावा: FRS मैचिंग के आधार पर पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि प्रदर्शन स्थल पर 2,873 ऐसे चेहरे पाए गए जो आपराधिक पृष्ठभूमि, विशेषकर हत्या (Section 302) और बलात्कार (Section 376) जैसे जघन्य अपराधों के रिकॉर्ड से मेल खाते हैं।

अदालत का दरवाजा खटखटाना: याचिकाकर्ताओं ने इस दावे को पूरी तरह से काल्पनिक, असत्यापित और निजता के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की।

हाई कोर्ट की सुनवाई: दिल्ली हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिका पर सुनवाई स्वीकार की और दिल्ली पुलिस व केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इस प्रक्रिया की तकनीकी सटीकता और प्रामाणिकता पर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

ध्यान दें: फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (FRS) की सटीकता दर और इसके डेटाबेस के इस्तेमाल को लेकर देश और दुनिया में पहले से ही मानवाधिकार व निजता से जुड़ी बहस चल रही है।

दिल्ली पुलिस का पक्ष: पुलिस अधिकारियों का कहना है कि राजधानी में कानून-व्यवस्था बनाए रखना और किसी भी अनहोनी या हिंसक घटना को रोकना उनकी प्राथमिकता है। FRS तकनीक का उपयोग केवल सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखकर किया गया था, न कि किसी निर्दोष नागरिक की निजता का हनन करने के लिए।

CJP व याचिकाकर्ताओं का तर्क: संगठन का कहना है कि यह शांतिपूर्ण नागरिक आंदोलनों को बदनाम करने का प्रयास है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि वास्तव में वहां इतनी बड़ी संख्या में गंभीर अपराधी मौजूद थे, तो पुलिस ने मौके पर ही उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया?

राजनीतिक घमासान: विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस पर हमला बोलते हुए कहा है कि सुरक्षा एजेंसियों का इस्तेमाल असहमति की आवाज को दबाने के लिए किया जा रहा है। वहीं, सत्ता पक्ष के समर्थकों का कहना है कि सुरक्षा के लिहाज से ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल जरूरी है।

इस विवाद का असर अब व्यापक कानूनी और सामाजिक स्तर पर देखने को मिल रहा है:

तकनीक और निजता पर बहस: यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि सार्वजनिक स्थानों पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और फेशियल रिकग्निशन के बिना किसी स्पष्ट दिशानिर्देश के इस्तेमाल से आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है।

अदालती निगरानी: हाई कोर्ट के इस मामले में हस्तक्षेप करने से अब सुरक्षा एजेंसियों द्वारा FRS के इस्तेमाल के लिए सख्त गाइडलाइंस या स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तय होने की उम्मीद जागी है।

सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों पर असर: इस प्रकार के दावों से भविष्य में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में भाग लेने वाले आम नागरिकों के मन में एक प्रकार की हिचकिचाहट या डर का माहौल बन सकता है।

अब सभी की निगाहें दिल्ली हाई कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत यह तय करेगी कि:

क्या दिल्ली पुलिस द्वारा प्रस्तुत FRS डेटा का कोई वैज्ञानिक और कानूनी सत्यापन हुआ है या नहीं?

क्या सार्वजनिक प्रदर्शनों में इस प्रकार की निगरानी प्रक्रिया 'निजता के अधिकार' (Right to Privacy) का उल्लंघन करती है?

क्या पुलिस को FRS तकनीक का इस्तेमाल करने से पहले कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा या दिशा-निर्देश दिए जाने चाहिए?

अदालत का फैसला न केवल इस मामले के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि भविष्य में भारतीय पुलिस प्रणाली द्वारा AI और डिजिटल निगरानी तकनीकों के इस्तेमाल की सीमाएं भी तय करेगा।

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