Nana Patekar Passed Away: 75 वर्ष की उम्र में अभिनेता नाना पाटेकर का निधन, गोवा में कार्डियक अरेस्ट के बाद पुणे में हुआ अंतिम संस्कार
भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। गोवा में कार्डियक अरेस्ट के बाद पुणे स्थित फार्म हाउस पर उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।

- दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का निधन: आधी रात को फार्म हाउस पर दी गई अंतिम विदाई, बेटे मल्हार ने बताई वजह
- अलविदा नाना पाटेकर: 'परिंदा' से 'क्रांतिवीर' तक अभिनय का दौर थमा, परिवार और करीबियों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार संपन्न
- Nana Patekar Demise: गोवा के घर में देर रात बिगड़ी थी तबीयत, पुणे में राजकीय सम्मान के बीच पंचतत्व में विलीन हुए नाना पाटेकर
मुंबई/पुणे: भारतीय सिनेमा और रंगमंच के सबसे सशक्त और प्रभावशाली अभिनेताओं में शुमार नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। गोवा स्थित उनके आवास पर देर रात अचानक हृदय गति रुकने (कार्डियक अरेस्ट) के कारण उनका देहावसान हुआ। इसके उपरांत उनके पार्थिव शरीर को महाराष्ट्र के पुणे स्थित फार्म हाउस लाया गया, जहां परिवार के सदस्यों, करीबी मित्रों और प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। उनके निधन की सूचना से हिंदी और मराठी सिनेमा जगत सहित देश भर के कला प्रेमियों में गहरा शोक छा गया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, 8 अक्टूबर की देर रात गोवा स्थित आवास पर उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी थी। रात के लगभग 2 बजे से 4 बजे के बीच सीने में तेज दर्द और असहजता की शिकायत के बाद उन्हें नजदीकी चिकित्सा केंद्र ले जाया गया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। डॉक्टरों ने कार्डियक अरेस्ट को उनके निधन का मुख्य कारण बताया।
- बेटे मल्हार का बयान
नाना पाटेकर के अंतिम पलों को लेकर सामने आई जानकारियों के अनुसार, देर रात बेचैनी महसूस होने पर उन्होंने अपने करीबी परिचितों से संवाद किया था। निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को पुणे लाया गया, जहां देर रात ही अत्यंत सादगी और गरिमा के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।
अंतिम संस्कार के समय को लेकर उनके सुपुत्र मल्हार पाटेकर ने स्पष्ट किया कि उनके पिता हमेशा आडंबर से दूर, शांत और सरल जीवनशैली के हिमायती थे। मल्हार के अनुसार, नाना जी की इच्छा थी कि उनके अंतिम विदाई के समय अनावश्यक भीड़भाड़ या औपचारिकताएं न हों और सभी प्रक्रियाएं परिजनों व अत्यंत आत्मीय लोगों के बीच शांतिपूर्वक पूरी की जाएं। उन्होंने यह भी बताया कि अपने जीवन के अंतिम दौर में भी वह परिवार, किसानों और अपनी संस्था 'नाम फाउंडेशन' की सामाजिक जिम्मेदारियों को लेकर निरंतर सजग बने हुए थे।
थिएटर से शुरू होकर तीन राष्ट्रीय पुरस्कारों तक का सफर
1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना पाटेकर का प्रारंभिक जीवन कड़े संघर्षों से भरा रहा। मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स से वाणिज्यिक कला में शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने प्रायोगिक मराठी रंगमंच से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की।
सिनेमा में पदार्पण: 1978 में फिल्म 'गमन' से बड़े पर्दे पर कदम रखने के बाद उन्हें 'आज की आवाज' (1984) और 'अंकुश' (1986) जैसी सामाजिक यथार्थवादी फिल्मों से व्यापक पहचान मिली।
यादगार फिल्में: विधु विनोद चोपड़ा की 'परिंदा' (1989) में गैंगस्टर 'अन्ना सेठ' के किरदार ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया। इसके बाद 'प्रहार' (1991), 'तिरंगा' (1992), 'क्रांतिवीर' (1994), 'खामोशी: द म्यूजिकल' (1996), 'यशवंत' (1997) और 'अब तक छप्पन' (2004) जैसी फिल्मों में उनके तीखे संवाद और दमदार अभिनय ने उन्हें हर वर्ग के दर्शकों का चहेता बना दिया।
कॉमेडी में भी लोहा मनवाया: 'वेलकम' (2007) और 'वेलकम बैक' (2015) में 'उदय शेट्टी' के हास्य किरदार को जीवंत कर उन्होंने साबित किया कि वे केवल गंभीर ही नहीं, बल्कि सटीक कॉमिक टाइमिंग में भी अद्वितीय थे। मराठी फिल्म 'नटसम्राट' (2016) में गणपतराव बेलवलकर के रूप में उनके अभिनय को भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे मार्मिक प्रदर्शनों में गिना जाता है।
अपने सुदीर्घ करियर में नाना पाटेकर को तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कला के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्मश्री' से अलंकृत किया था।
निजी जीवन और सामाजिक सरोकार: 'नाम फाउंडेशन'
नाना पाटेकर का विवाह नीलकंती पाटेकर से हुआ था, जो स्वयं एक जानी-मानी रंगमंच कलाकार और लेखिका रही हैं तथा राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं। हालांकि वैवाहिक जीवन में आगे चलकर दोनों ने आपसी सहमति से अलग रहने का फैसला किया था, लेकिन उनके बीच हमेशा परस्पर सम्मान बना रहा।
नाना पाटेकर केवल एक महान अभिनेता ही नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े संवेदनशील समाजसेवी भी थे। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में सूखे से जूझ रहे किसानों की आत्महत्या की घटनाओं से व्यथित होकर उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 2015 में 'नाम फाउंडेशन' (NAAM Foundation) की स्थापना की थी। इस संस्था के जरिए उन्होंने सैकड़ों सूखा पीड़ित किसान परिवारों को आर्थिक संबल दिया, गांवों में जल संरक्षण के लिए नदियों को गहरा कराया और किसानों की विधवाओं के पुनर्वास की व्यवस्था की।
सिनेमा जगत और राजनेताओं ने दी श्रद्धांजलि
नाना पाटेकर के निधन पर प्रधानमंत्री, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री सहित राजनीति, कला और सामाजिक क्षेत्र के गणमान्य व्यक्तियों ने गहरा शोक प्रकट किया है। फिल्म उद्योग के दिग्गजों ने उन्हें भारतीय अभिनय परंपरा की एक 'अद्वितीय संस्था' बताते हुए कहा कि उनकी बुलंद आवाज, अनूठी संवाद अदायगी और सच्चाई से भरे अभिनय की जगह कभी नहीं भरी जा सकेगी।
सादगी पसंद अभिनेता अपने पीछे बेटे मल्हार पाटेकर, अपनी सामाजिक विरासत और सिनेमाई इतिहास में दर्ज दर्जनों अमर किरदार छोड़ गए हैं।
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