WhatsApp पर धर्म को को लेकर अभद्र Messages करना हुआ Crime, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने से इनकार कर दी चेतावनी।
Tech News: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि Whatsapp पर किसी खास धर्म या समुदाय को निशाना
Tech News: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि Whatsapp पर किसी खास धर्म या समुदाय को निशाना बनाते हुए भड़काऊ मैसेज भेजना अपराध माना जा सकता है। यह फैसला अफाक अहमद नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर आया, जिन्होंने अपने भाई की गिरफ्तारी के बाद Whatsapp पर कई लोगों को मैसेज भेजे थे। इन मैसेज में उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से यह संकेत दिया था कि उनके भाई को फर्जी केस में फंसाया गया क्योंकि वह एक खास धर्म से ताल्लुक रखते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही मैसेज में धर्म का नाम न लिया गया हो, लेकिन उसके निहितार्थ से धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी, घृणा और वैमनस्य की भावना पैदा हो सकती है। इस फैसले से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने की जरूरत पर जोर मिला है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की FIR रद्द करने की मांग ठुकरा दी और जांच जारी रखने का आदेश दिया।
यह मामला 26 सितंबर 2025 को सुनवाई के दौरान सामने आया। बिजनौर के रहने वाले अफाक अहमद के भाई अरिफ अहमद को उत्तर प्रदेश धर्म स्वतंत्रता (अवैध धर्मांतरण) निषेध अधिनियम 2021 के तहत गिरफ्तार किया गया था। अरिफ पर अवैध धर्मांतरण का आरोप था। गिरफ्तारी के बाद अफाक ने Whatsapp पर कई लोगों को मैसेज फॉरवर्ड किए। इन मैसेज में उन्होंने लिखा था कि उनके भाई को फर्जी केस में फंसाया गया है और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा है। मैसेज में सीधे किसी धर्म का नाम नहीं लिया गया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि इसके अनकहे शब्दों से यह संकेत मिलता है कि भाई को उसके धार्मिक पहचान के कारण निशाना बनाया गया। यह मैसेज कई लोगों तक पहुंचा, जिससे सांप्रदायिक तनाव फैलने का खतरा पैदा हो गया। स्थानीय पुलिस ने इसे गंभीरता से लिया और अफाक के खिलाफ FIR दर्ज की।
अफाक ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उन्होंने कहा कि मैसेज में कोई भड़काऊ सामग्री नहीं थी, यह केवल भाई की गिरफ्तारी पर उनका व्यक्तिगत आक्रोश था। उनके वकील सैयद शाहनवाज शाह ने तर्क दिया कि FIR में कोई पीड़ित का नाम नहीं है और यह केवल प्रतिशोध के रूप में दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि अफाक कोर्ट की प्रक्रिया पर पूरा भरोसा रखते हैं। लेकिन जस्टिस जे.जे. मुनिर और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने इन तर्कों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मैसेज भले ही संयमित भाषा में लिखा गया हो, लेकिन इसका अंतर्निहित संदेश सांप्रदायिक पूर्वाग्रह दर्शाता है। कोर्ट ने फैसले में लिखा कि यह मैसेज धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी, घृणा और वैमनस्य को बढ़ावा दे सकता है। खासकर जब यह कई लोगों को भेजा जाता है, तो इसका प्रभाव व्यापक होता है।
कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(2) का हवाला दिया। यह धारा धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी, घृणा या वैमनस्य को बढ़ावा देने के अपराध को परिभाषित करती है। कोर्ट ने कहा कि मैसेज का प्रथम दृष्टया अपराध के तत्व मौजूद हैं। अगर धारा 353(3) लागू न हो, तो भी 353(2) पूरी तरह फिट बैठती है। कोर्ट ने आगे कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिकाकर्ता को जांच रोकने का अधिकार नहीं है। जांच पूरी होने दें, अगर निर्दोष साबित होते हैं तो बरी हो जाएंगे। कोर्ट ने FIR रद्द करने से साफ इनकार कर दिया और पुलिस को जांच तेज करने का निर्देश दिया। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि डिजिटल मैसेज भी सांप्रदायिक सद्भाव के खिलाफ इस्तेमाल नहीं हो सकते।
यह फैसला भारत में बढ़ते साइबर क्राइम और सांप्रदायिक तनाव के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में अवैध धर्मांतरण के कानून के तहत कई मामले दर्ज हो चुके हैं। 2021 में लागू इस कानून के बाद से 500 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुई हैं। बिजनौर जैसे जिलों में धार्मिक रूपांतरण के आरोप आम हैं। अफाक के भाई अरिफ के मामले में भी यही हुआ। पुलिस ने कहा कि अरिफ पर एक महिला को जबरन धर्मांतरण का आरोप था। लेकिन परिवार ने इसे फर्जी बताया। Whatsapp मैसेज के बाद पुलिस ने अफाक को धारा 123, 64(1), 318(4) और 336(3) BNS के अलावा धर्मांतरण अधिनियम की धारा 3 के तहत केस जोड़ा। कोर्ट ने कहा कि मैसेज से सांप्रदायिक शांति भंग होने का खतरा था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने सोशल मीडिया यूजर्स के बीच बहस छेड़ दी। कई लोग कह रहे हैं कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह सांप्रदायिक सद्भाव की रक्षा के लिए जरूरी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2024 में सांप्रदायिक दंगों में 20 प्रतिशत वृद्धि हुई। सोशल मीडिया पर भड़काऊ मैसेज इसका बड़ा कारण हैं। Whatsapp जैसे प्लेटफॉर्म्स पर फॉरवर्ड मैसेज तेजी से फैलते हैं। कोर्ट ने कहा कि मैसेज के अनकहे शब्दों से भी अपराध बन सकता है। यह फैसला अन्य हाईकोर्ट्स के पुराने फैसलों से मेल खाता है, जहां सोशल मीडिया पोस्ट को अपराध माना गया।
अफाक के वकील ने कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रारंभिक जांच में अपराध के तत्व मौजूद हैं। बिजनौर पुलिस ने कहा कि जांच पूरी होने पर चार्जशीट दाखिल करेंगे। स्थानीय लोग इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं। एक वकील ने कहा कि यह डिजिटल युग में जिम्मेदारी सिखाता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी साइबर सेल को मजबूत किया है। 2025 में अब तक 10,000 से ज्यादा सांप्रदायिक मैसेज पर कार्रवाई हुई। कोर्ट ने अपील की कि लोग मैसेज फॉरवर्ड करने से पहले सोचें।
यह मामला भारत के संवेदनशील सांप्रदायिक माहौल को दर्शाता है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जहां हिंदू-मुस्लिम आबादी बराबर है, ऐसे मैसेज तनाव बढ़ा सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का आरोप लगाना भी गंभीर है। अफाक का मैसेज कई Whatsapp ग्रुप्स में पहुंचा, जिससे अफवाहें फैलीं। पुलिस ने ग्रुप एडमिन्स से भी पूछताछ की। विशेषज्ञ कहते हैं कि Whatsapp को फैक्ट-चेकिंग टूल्स अपनाने चाहिए। केंद्र सरकार ने IT एक्ट के तहत सख्ती बढ़ाई है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट भारत का सबसे व्यस्त कोर्ट है। यहां रोजाना सैकड़ों याचिकाएं सुनाई जाती हैं। जस्टिस मुनिर और जस्टिस श्रीवास्तव की बेंच ने इस मामले में विस्तृत फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान का हिस्सा है, लेकिन यह दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकती। सांप्रदायिक सद्भाव लोकतंत्र की नींव है। इस फैसले से वकीलों और जजों में चर्चा हो रही। बार काउंसिल ने कहा कि यह डिजिटल नैतिकता का पाठ है।
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