बिहार में सियासी हलचल- सीएम पद के उत्तराधिकारी पर अटकलें तेज, कई नाम चर्चा में, जीतन राम मांझी ने सीएम रेस से खुद को किया अलग। 

बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर दिया

Mar 9, 2026 - 11:39
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बिहार में सियासी हलचल- सीएम पद के उत्तराधिकारी पर अटकलें तेज, कई नाम चर्चा में, जीतन राम मांझी ने सीएम रेस से खुद को किया अलग। 
बिहार में सियासी हलचल- सीएम पद के उत्तराधिकारी पर अटकलें तेज, कई नाम चर्चा में, जीतन राम मांझी ने सीएम रेस से खुद को किया अलग। 

बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है। यह फैसला उनके 20 वर्षों से अधिक समय के मुख्यमंत्री पद के सफर को समाप्त करने का संकेत देता है, जो 2005 से विभिन्न गठबंधनों के साथ जारी रहा है। नामांकन के समय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत कई प्रमुख नेता मौजूद थे, जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की एकजुटता को दर्शाता है। नीतीश कुमार की उम्र 75 वर्ष है और उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से यह कदम उठाया है, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि वे बिहार की सेवा में हमेशा सक्रिय रहेंगे। राज्यसभा चुनाव 16 मार्च को होने वाले हैं, जहां गठबंधन की बहुमत स्थिति से उनकी जीत तय मानी जा रही है। इस फैसले के बाद बिहार में मुख्यमंत्री पद के लिए उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो गई है, जहां जनता दल यूनाइटेड और भारतीय जनता पार्टी के बीच चर्चा चल रही है। कई वरिष्ठ नेता इस पद के लिए दावेदारी पेश कर रहे हैं, लेकिन अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। नीतीश कुमार ने अपने बेटे निशांत कुमार को पार्टी में शामिल कर लिया है, जो राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की दिशा में कदम है, हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तराधिकार परिवारवाद पर आधारित नहीं होगा। इस बदलाव से बिहार की राजनीति में नई पीढ़ी के नेताओं को मौका मिल सकता है, जो राज्य के विकास और जातीय समीकरणों को प्रभावित करेगा।

नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले ने राज्य की राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर मुख्यमंत्री पद के उत्तराधिकारी को लेकर। गठबंधन में भारतीय जनता पार्टी की मजबूत स्थिति को देखते हुए, यह संभावना है कि अगला मुख्यमंत्री इसी पार्टी से आएगा, जो बिहार में पहली बार होगा। संभावित उम्मीदवारों में उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का नाम सबसे आगे है, जो कुशवाहा समुदाय से आते हैं और नीतीश कुमार के करीबी माने जाते हैं। सम्राट चौधरी ने पार्टी संगठन में मजबूत पकड़ बनाई है और विधानसभा में बहुमत के साथ गठबंधन को मजबूत करने में भूमिका निभाई है। इसके अलावा, विजय कुमार सिन्हा का नाम भी चर्चा में है, जो भूमिहार समुदाय से हैं और पूर्व में उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं। वे विधानसभा स्पीकर भी रह चुके हैं और पार्टी के वरिष्ठ नेता के रूप में जाने जाते हैं। दिलीप जायसवाल और नित्यानंद राय जैसे नाम भी सामने आ रहे हैं, जहां नित्यानंद राय केंद्रीय मंत्री हैं और यादव समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। जनता दल यूनाइटेड की ओर से निशांत कुमार या विजय कुमार चौधरी जैसे नामों पर विचार हो सकता है, लेकिन गठबंधन की डायनामिक्स को देखते हुए फैसला केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर करेगा। यह चुनाव जातीय समीकरणों को ध्यान में रखकर किया जाएगा, क्योंकि बिहार की राजनीति में जाति एक प्रमुख फैक्टर है।

इनसेट: नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर नीतीश कुमार ने 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाला था और विभिन्न गठबंधनों के साथ 10 बार शपथ ली। उन्होंने बिहार में विकास कार्यों जैसे सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य पर फोकस किया, जो राज्य की छवि बदलने में मददगार साबित हुए। अब राज्यसभा में जाकर वे राष्ट्रीय स्तर पर योगदान देंगे।

केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने खुद को मुख्यमंत्री पद की रेस से अलग कर लिया है, जो एक महत्वपूर्ण बयान है। उन्होंने कहा कि वे इस दौड़ में नहीं हैं और उनके मुख्यमंत्री बनने की कोई संभावना नहीं है। मांझी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के नेता हैं और गठबंधन में शामिल हैं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका फोकस अपनी पार्टी के विकास और दलित समुदाय के हितों पर है। मांझी पूर्व में मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जब 2014 में नीतीश कुमार ने उन्हें पद सौंपा था, लेकिन वह कार्यकाल विवादों से भरा रहा। अब वे केंद्रीय स्तर पर मंत्री हैं और बिहार की राजनीति में अपनी भूमिका को सीमित रखना चाहते हैं। इस बयान से गठबंधन में अन्य दावेदारों को राहत मिल सकती है, क्योंकि मांझी का नाम भी कभी-कभी चर्चा में आता था। उनका यह फैसला गठबंधन की एकजुटता को मजबूत कर सकता है, जहां वे सहयोगी के रूप में बने रहेंगे। मांझी ने अतीत में कई विवादास्पद बयान दिए हैं, लेकिन इस बार उन्होंने साफ-साफ अपनी स्थिति स्पष्ट की है।

इस सियासी बदलाव का असर बिहार की विधानसभा पर भी पड़ेगा, जहां गठबंधन के पास 202 विधायकों का बहुमत है। नीतीश कुमार के जाने के बाद नई सरकार का गठन जल्द होगा, जो राज्य के विकास योजनाओं को जारी रखेगी। बिहार में हाल के चुनावों में गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की थी, जो नीतीश कुमार की लोकप्रियता का प्रमाण था। अब उत्तराधिकारी को इस विरासत को संभालना होगा, जहां चुनौतियां जैसे बेरोजगारी, बाढ़ और स्वास्थ्य सेवाएं प्रमुख हैं। सम्राट चौधरी जैसे उम्मीदवारों की मजबूत पकड़ राज्य के विभिन्न जिलों में है, जो चुनावी रणनीति में फायदेमंद साबित हो सकती है। वहीं, अगर जनता दल यूनाइटेड से कोई नेता चुना जाता है तो गठबंधन की संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा। केंद्रीय नेतृत्व इस फैसले में प्रमुख भूमिका निभाएगा, जहां अमित शाह जैसे नेता पटना में मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं।

नीतीश कुमार के फैसले से विपक्षी दलों में भी हलचल है, जहां राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस जैसे दल इसे अवसर के रूप में देख रहे हैं। वे आरोप लगा रहे हैं कि यह कदम नीतीश कुमार की राजनीतिक थकान को दर्शाता है और नई सरकार अस्थिर हो सकती है। हालांकि, गठबंधन ने इन आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि संक्रमण सुचारू रूप से होगा। निशांत कुमार के पार्टी में शामिल होने से परिवारवाद के आरोप लग सकते हैं, लेकिन नीतीश कुमार ने हमेशा इससे दूरी बनाई है। निशांत की भूमिका उपमुख्यमंत्री या अन्य पद पर हो सकती है, जो युवा नेतृत्व को बढ़ावा देगा।

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