नेहरू सरकारी पैसे से बाबरी मस्जिद बनवाना चाहते थे लेकिन सरदार पटेल ने ... - रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2 दिसंबर 2025 को गुजरात के वडोदरा जिले के साधली गांव में सरदार पटेल की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 2 दिसंबर 2025 को गुजरात के वडोदरा जिले के साधली गांव में सरदार पटेल की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित एकता मार्च के दौरान जवाहरलाल नेहरू पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू बाबरी मस्जिद के निर्माण के लिए सरकारी खजाने से धन खर्च करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसका कड़ा विरोध किया और इसे लागू नहीं होने दिया। सिंह ने पटेल को सच्चा धर्मनिरपेक्ष बताते हुए कहा कि पटेल ने कभी तुष्टिकरण की राजनीति नहीं की। उन्होंने नेहरू के सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण पर विरोध का भी जिक्र किया, जहां नेहरू ने सरकारी धन के उपयोग पर सवाल उठाया था, जबकि पटेल ने स्पष्ट किया कि सोमनाथ का मामला अलग था क्योंकि उसके लिए जनता ने 30 लाख रुपये दान में दिए थे और एक ट्रस्ट का गठन किया गया था, जिसमें सरकारी धन का एक पैसा भी नहीं लगा।
राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में पटेल को उदारवादी और सच्चे धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में चित्रित किया, जो कभी किसी समुदाय को खुश करने के लिए नीति नहीं बनाते थे। उन्होंने कहा कि जब नेहरू ने बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर सरकारी खजाने से पैसा खर्च करने की बात उठाई, तो गुजरात की मिट्टी से निकले सरदार पटेल ने इसका विरोध किया। सिंह ने जोर दिया कि पटेल ने उस समय बाबरी मस्जिद को सरकारी धन से बनने नहीं दिया। यह दावा पटेल की धर्मनिरपेक्षता को पटेल के दृष्टिकोण से जोड़ते हुए किया गया, जहां सार्वजनिक धन का धार्मिक निर्माण पर उपयोग अस्वीकार्य था। सिंह ने कहा कि पटेल की यह सोच ही सच्ची समावेशिता की मिसाल थी। कार्यक्रम के दौरान सिंह ने पटेल की जयंती को एकता का प्रतीक बताया, जो देश को एक सूत्र में बांधने वाले लौह पुरुष थे।
सोमनाथ मंदिर के संदर्भ में सिंह ने नेहरू के रुख का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए सरकारी धन के उपयोग पर सवाल उठाया था, लेकिन पटेल ने स्पष्ट किया कि यह जनता के दान पर आधारित था। सिंह ने बताया कि सोमनाथ के लिए 30 लाख रुपये जनसंग्रह से आए थे, और एक ट्रस्ट ने इसका प्रबंधन किया, जिसमें सरकारी खजाना शामिल नहीं था। उन्होंने इसकी तुलना अयोध्या के राम मंदिर से की, जहां भी निर्माण जनता के दान से हो रहा है और सरकारी धन का उपयोग नहीं हो रहा। सिंह ने कहा कि राम मंदिर का पूरा खर्च देश की जनता ने वहन किया है, जो पटेल की सोच से प्रेरित है। यह बयान पटेल की विरासत को नेहरू के कथित प्रस्ताव से जोड़ते हुए दिया गया, जो ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित था।
राजनाथ सिंह ने पटेल की प्रधानमंत्री पद न स्वीकारने की बात भी दोहराई। उन्होंने कहा कि 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में पटेल को बहुमत का समर्थन मिला था, लेकिन महात्मा गांधी के कहने पर पटेल ने नाम वापस ले लिया और नेहरू को पद सौंप दिया। सिंह ने कहा कि पटेल कभी पद की लालसा नहीं करते थे, और विचारधाराओं के अंतर के बावजूद नेहरू के साथ काम किया क्योंकि यह गांधी जी का वादा था। उन्होंने पटेल को शक्ति के पीछे न भागने वाले नेता के रूप में वर्णित किया। सिंह ने कहा कि पटेल की यह त्यागमयी भावना ही उनकी महानता का प्रमाण थी। कार्यक्रम में सिंह ने पटेल की एकता मार्च को देश की अखंडता का प्रतीक बताया, जो 150वीं जयंती के अवसर पर गुजरात में आयोजित हो रही थी।
इस बयान के बाद कांग्रेस ने कड़ा विरोध जताया। कांग्रेस ने कहा कि राजनाथ सिंह का दावा ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं है और इसमें कोई अभिलेखीय प्रमाण नहीं है। उन्होंने नेहरू को धार्मिक स्थलों के लिए राज्य धन के उपयोग के सख्त विरोधी बताया, जिसमें सोमनाथ मंदिर का उदाहरण दिया। कांग्रेस ने कहा कि नेहरू ने सोमनाथ के लिए भी सार्वजनिक धन के उपयोग से इनकार किया था, इसलिए बाबरी मस्जिद के लिए ऐसा प्रस्ताव असंभव था। उन्होंने सिंह के बयान को नेहरू और पटेल की विरासत को तोड़ने का प्रयास बताया। कांग्रेस ने कहा कि नेहरू ने लाखों लोगों के प्रतीक सोमनाथ के लिए भी राज्य धन अस्वीकार किया, तो बाबरी के लिए क्यों स्वीकारते। यह प्रतिक्रिया नेहरू की नीतियों पर आधारित थी, जहां राज्य का धन धार्मिक कार्यों से अलग रखा गया।
राजनाथ सिंह का बयान सरदार पटेल की जयंती समारोह का हिस्सा था, जो गुजरात में बड़े स्तर पर आयोजित हो रहा था। साधली गांव में एकता मार्च के दौरान सिंह ने पटेल को किसानों का नेता बताया। उन्होंने कहा कि पटेल की मृत्यु के बाद जनता ने उनके स्मारक के लिए धन एकत्र किया, लेकिन नेहरू ने सुझाव दिया कि यह धन गांवों में कुओं और सड़कों के निर्माण पर खर्च किया जाए। सिंह ने कहा कि पटेल किसानों के नेता थे, इसलिए नेहरू का यह सुझाव पटेल की विरासत से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि कुछ लोग पटेल की विरासत को छिपाने का प्रयास करते हैं, लेकिन यह सफल नहीं होगा। सिंह ने पटेल को गुजरात की मिट्टी का सपूत बताया, जो देश को एकजुट करने वाले थे। कार्यक्रम में पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी उपस्थित थे।
सिंह ने अपने संबोधन में ऑपरेशन सिंदूर का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह ऑपरेशन शांति की भाषा न समझने वालों को भारत की मजबूत प्रतिक्रिया का प्रमाण है, जो पटेल की दृढ़ता से प्रेरित है। ऑपरेशन सिंदूर 2025 में भारत-पाकिस्तान हवाई झड़पों के दौरान हुआ था, जहां भारतीय वायुसेना ने सफल कार्रवाई की। सिंह ने कहा कि भारत अब उकसावे को बर्दाश्त नहीं करेगा और पटेल की तरह दृढ़ रहेगा। उन्होंने रक्षा क्षेत्र में लक्ष्य भी साझा किए। सिंह ने कहा कि 2029 तक रक्षा उत्पादन तीन लाख करोड़ रुपये और निर्यात 50,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य है। उन्होंने बताया कि 11 वर्षों में रक्षा निर्यात 34 गुना बढ़ा है। यह बयान पटेल की एकता की भावना से जोड़कर दिया गया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा था।
राजनाथ सिंह ने संविधान संशोधन विधेयक 2025 का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सरकार संविधान के 130वें संशोधन विधेयक को संसद से पारित कराना चाहती है, जो उच्च पदों पर नैतिक आचरण सुनिश्चित करेगा। सिंह ने कहा कि यदि किसी पदाधिकारी को गंभीर आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और 30 दिनों में जमानत न मिले, तो वह पद से स्वतः हट जाएगा। यह प्रावधान भ्रष्टाचार के खिलाफ कदम है। सिंह ने पटेल को नैतिकता का प्रतीक बताया, जो कभी पद के लिए नहीं लड़े। बयान पटेल की जयंती के संदर्भ में आया, जहां एकता और अखंडता पर जोर था। सिंह ने कहा कि पटेल ने 1946 में नेहरू को समर्थन दिया, लेकिन विचारधाराओं में अंतर था।
यह बयान राजनीतिक बहस को हवा दे रहा है। कांग्रेस ने इसे नेहरू-पटेल की विरासत को तोड़ने का प्रयास कहा, जबकि सिंह ने पटेल की धर्मनिरपेक्षता को नेहरू के कथित प्रस्ताव से अलग किया। बाबरी मस्जिद का मुद्दा 1949 से जुड़ा है, जब विवाद शुरू हुआ था। सिंह ने कहा कि पटेल ने सरकारी धन का उपयोग रोका, जो पटेल की नीति थी। सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण 1951 में हुआ, जहां नेहरू ने राज्य धन से इनकार किया। सिंह ने इस अंतर को रेखांकित किया। पटेल की जयंती समारोह गुजरात में कई कार्यक्रमों के साथ चल रहा है, जहां एकता मार्च प्रमुख है। सिंह का बयान इस समारोह का हिस्सा था, जो पटेल की विरासत को जीवंत करने का प्रयास है।
राजनाथ सिंह ने पटेल को शक्ति के पीछे न भागने वाले बताया। उन्होंने कहा कि पटेल ने गांधी के कहने पर नाम वापस लिया, जो उनकी त्याग भावना दर्शाता है। सिंह ने कहा कि पटेल ने नेहरू के साथ काम किया, लेकिन कभी पद नहीं मांगा। यह बयान पटेल की महानता पर केंद्रित था। कार्यक्रम में सिंह ने पटेल को किसानों का नेता कहा, और नेहरू के सुझाव का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पटेल की मृत्यु के बाद एकत्र धन का उपयोग गांवों के विकास पर हुआ। सिंह ने कहा कि पटेल की विरासत को मिटाने का प्रयास विफल रहेगा। बयान पटेल की 150वीं जयंती के अवसर पर आया, जो राष्ट्रीय स्तर पर मनाई जा रही है।
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