कमलेश नहीं था मुख्यारोपी... गाजीपुर मुठभेड़ मामले में अपनी ही सरकार की पुलिस नीति के खिलाफ खड़े हुए कैबिनेट मंत्री संजय निषाद

राजनीतिक परिदृश्य में इस कदम को आगामी चुनावों और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। पूर्वांचल के जिलों में निषाद और बिंद समुदायों का एक बड़ा और निर्णायक वोट बैंक मौजूद है, और अपनी राजनीतिक जमीन को खिसकने से बचाने के लिए कोई भी नेता

Jun 7, 2026 - 11:25
Jun 7, 2026 - 11:26
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कमलेश नहीं था मुख्यारोपी... गाजीपुर मुठभेड़ मामले में अपनी ही सरकार की पुलिस नीति के खिलाफ खड़े हुए कैबिनेट मंत्री संजय निषाद
कमलेश नहीं था मुख्यारोपी... गाजीपुर मुठभेड़ मामले में अपनी ही सरकार की पुलिस नीति के खिलाफ खड़े हुए कैबिनेट मंत्री संजय निषाद

  • उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में बढ़ा आंतरिक तनाव, सहयोगी दल के प्रमुख ने उठाई उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग
  • कानून व्यवस्था के दावों के बीच अपनों के ही तीखे तेवर, मुख्य आरोपियों को छोड़ दूसरे नंबर के नामजद पर कार्रवाई से उपजा विवाद

उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और अपराधियों के खिलाफ चलाई जा रही कड़े अभियानों के बीच एक अभूतपूर्व सियासी गतिरोध सामने आया है। राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री और सहयोगी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद ने गाजीपुर जिले में हुई एक हालिया पुलिस मुठभेड़ की विश्वसनीयता पर सीधे तौर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विवाद गाजीपुर पुलिस द्वारा विनीत राय नामक एक व्यवसायी की हत्या के मामले में वांछित आरोपी कमलेश चौधरी उर्फ कमलेश बिंद को मार गिराए जाने के बाद शुरू हुआ। सरकार का हिस्सा होने के बावजूद अपनी ही प्रशासनिक मशीनरी को कटघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने पुलिस की इस कार्रवाई को पूरी तरह से असंतोषजनक करार दिया है। इस राजनीतिक कदम ने प्रदेश के सत्ताधारी गठबंधन के भीतर एक आंतरिक खींचतान की स्थिति पैदा कर दी है, जहां एक तरफ सरकार अपनी जीरो टॉलरेंस की नीति का प्रचार कर रही है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने ही वरिष्ठ मंत्री इस प्रक्रिया को भेदभावपूर्ण बता रहे हैं।

इस पूरे मामले की संवेदनशीलता तब और बढ़ गई जब कैबिनेट मंत्री ने सीधे तौर पर गाजीपुर के जिला पुलिस प्रमुख को खुली चुनौती दे डाली। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इस पूरे घटनाक्रम में शामिल मुख्य आरोपियों को पकड़ने या उन पर इसी तरह की त्वरित कार्रवाई करने में पुलिस प्रशासन पूरी तरह नाकाम रहा है। उनका तर्क है कि जिस व्यक्ति को मुठभेड़ में मार गिराया गया है, वह इस पूरे हत्याकांड का मुख्य सूत्रधार या प्राथमिक अभियुक्त नहीं था, बल्कि उसे जानबूझकर आसान निशाना बनाया गया। उन्होंने स्थानीय पुलिस के मुखिया को ललकारते हुए कहा कि अगर पुलिस की यह कार्रवाई कानून सम्मत और न्यायसंगत थी, तो वे इस मामले के दो अन्य मुख्य नामजद आरोपियों को भी इसी तरह कानून के दायरे में लाकर दिखाएं। इस तीखे बयान ने पुलिस के दावों पर सवालिया निशान लगाने के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारियों की मंशा को भी सीधे तौर पर राजनीतिक चुनौती दी है।

मुठभेड़ की पृष्ठभूमि: गाजीपुर जिले में पिछले दिनों एक होटल व्यवसायी विनीत राय की एक करोड़ रुपये की रंगदारी न देने के कारण गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पुलिस ने चार लोगों को नामजद किया था, जिसमें मुख्य आरोपी के रूप में एक लाख रुपये के इनामी बदमाश कमलेश बिंद को पुलिस ने एक कथित मुठभेड़ में मार गिराया, जबकि अन्य मुख्य आरोपी अब भी फरार चल रहे हैं।

इस घटना के बाद से गाजीपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में सामाजिक और जातीय समीकरण बेहद तेजी से गरमाने लगे हैं। मृत युवक के परिवार और विशेषकर उसकी पत्नी द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों को आधार बनाते हुए कैबिनेट मंत्री ने इस बात पर जोर दिया है कि कानून की स्थापित प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया है। मृतक के परिजनों का दावा है कि पुलिस ने पहले उसे उसके घर अथवा थाने में लाकर बुरी तरह प्रताड़ित किया और उसके बाद एक सुनियोजित तरीके से इस कथित एनकाउंटर की कहानी रच दी। मंत्री ने इस बात को पुरजोर तरीके से उठाया है कि भारतीय न्याय व्यवस्था हर नागरिक को न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करने और अपनी बेगुनाही साबित करने का मौलिक अधिकार देती है, लेकिन इस मामले में जिस तरह की जल्दबाजी दिखाई गई, वह पूरी तरह से संदेहास्पद है और इसकी एक स्वतंत्र जांच एजेंसी या विशेष जांच दल से गहन पड़ताल कराई जानी अनिवार्य है।

इस विवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इस एनकाउंटर के बाद स्थानीय जनता के भीतर भारी आक्रोश फूट पड़ा था। शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाते समय उग्र भीड़ द्वारा पुलिस बल पर किए गए पथराव और उसके बाद कानून व्यवस्था की बिगड़ी स्थिति को लेकर भी प्रशासनिक विफलता के सवाल खड़े किए जा रहे हैं। मंत्री ने पुलिस की खुफिया इकाई यानी लोकल इंटेलिजेंस यूनिट की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाते हुए पूछा कि जब स्थानीय अधिकारियों को यह भली-भांति ज्ञात था कि इस तरह की कार्रवाई से एक बड़े समुदाय के भीतर भारी असंतोष पैदा हो सकता है, तो समय रहते सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए गए। शव यात्रा के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद स्थानीय युवाओं पर रासुका जैसी गंभीर धाराएं लगाने की पुलिसिया धमकी को उन्होंने पूरी तरह से अन्यायपूर्ण और समाज विशेष के खिलाफ दमनकारी नीति का हिस्सा बताया है।

राजनीतिक परिदृश्य में इस कदम को आगामी चुनावों और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। पूर्वांचल के जिलों में निषाद और बिंद समुदायों का एक बड़ा और निर्णायक वोट बैंक मौजूद है, और अपनी राजनीतिक जमीन को खिसकने से बचाने के लिए कोई भी नेता अपने मूल कैडर के बीच गलत संदेश नहीं जाने देना चाहता। इसी रणनीति के तहत मुख्यमंत्री को लिखे एक आधिकारिक पत्र में मंत्री ने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि इस घटना से पूरे जिले के भीतर व्यापक असंतोष और भ्रम का माहौल है। उन्होंने आशंका जताई है कि कुछ प्रशासनिक अधिकारी जानबूझकर ऐसी कार्रवाइयों को अंजाम दे रहे हैं जिससे राज्य सरकार की छवि धूमिल हो और जनता के बीच सत्ताधारी गठबंधन के प्रति अविश्वास की भावना पैदा हो, जो आने वाले समय में राजनीतिक रूप से काफी नुकसानदेह साबित हो सकती है।

इस बड़े विवाद पर अब सरकार के शीर्ष स्तर से भी प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं, जिससे इस मामले की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। राज्य के उप मुख्यमंत्री ने भी इस पूरे प्रकरण पर संज्ञान लेते हुए साफ किया है कि गाजीपुर में हुई इस घटना की पूरी निष्पक्षता के साथ जांच सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने भरोसा दिलाया है कि यदि पुलिस की इस पूरी कार्रवाई के दौरान किसी भी स्तर पर कोई लापरवाही, प्रक्रियात्मक त्रुटि या जानबूझकर की गई ज्यादती की बात सामने आती है, तो दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कानूनी कदम उठाए जाएंगे। इस आश्वासन के बावजूद सहयोगी दल के मुखिया अपनी इस मांग पर अड़े हुए हैं कि जब तक इस पूरे मामले के पीछे की वास्तविक परिस्थितियों की जांच किसी उच्च स्तरीय स्वतंत्र कमेटी से नहीं कराई जाती, तब तक पीड़ित परिवार को न्याय मिलना असंभव है।

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