12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर कोलकाता की ऐतिहासिक रेड रोड से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया देश का नेतृत्व, दुनिया भर में गूंजा भारतीय संस्कृति का संदेश।

भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा से निकले इस अनमोल उपहार की यात्रा वैश्विक पटल पर बेहद विस्मयकारी रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2014 में भारत के प्रस्ताव को अभूतपूर्व समर्थन देते हुए 21 जून को इस विशेष दिवस के रूप में घोषित किया गया था, जिसके बाद 2015 में पहली बार इस

Jun 21, 2026 - 09:27
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12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर कोलकाता की ऐतिहासिक रेड रोड से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया देश का नेतृत्व, दुनिया भर में गूंजा भारतीय संस्कृति का संदेश।
12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर कोलकाता की ऐतिहासिक रेड रोड से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया देश का नेतृत्व, दुनिया भर में गूंजा भारतीय संस्कृति का संदेश।

  • 'स्वस्थ आयु के लिए योग' के मूल मंत्र के साथ वैश्विक स्तर पर मनाया गया सामूहिक उत्सव, प्रधानमंत्री ने स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिए योग को जीवन का अटूट हिस्सा बनाने का दिया आह्वान।
  • वैश्विक मंच पर भारत की प्राचीन धरोहर ने बिखेरी अपनी अनूठी चमक, पूरब से पश्चिम तक करोड़ों लोगों ने एक साथ प्राणायाम और आसनों के माध्यम से एकजुटता का पेश किया अनूठा उदाहरण।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और मानसिक चेतना के सबसे बड़े अभियान के रूप में स्थापित हो चुका योग दिवस इस बार अपने 12वें संस्करण के साथ बेहद भव्य तरीके से मनाया गया। देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भूमि पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के रेड रोड पर मुख्य राष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसकी कमान स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभाली। सुबह के तड़के उजाले के साथ ही हजारों की संख्या में योग साधकों, युवाओं और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने ऐतिहासिक मैदान पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि आज 21 जून का यह दिन केवल एक तारीख मात्र नहीं रह गया है, बल्कि यह संपूर्ण विश्व के लिए सबसे बड़े सामाजिक और सामूहिक उत्सव के रूप में परिवर्तित हो चुका है। भौगोलिक सीमाओं को लांघकर दुनिया के कोने-कोने में रहने वाले लोगों के लिए अब योग उनकी दैनिक जीवनशैली का एक अत्यंत आवश्यक और अभिन्न हिस्सा बन गया है, जो उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ़ बना रहा है।

इस वर्ष के आयोजन को बेहद खास बनाने के लिए एक विशेष विचार को केंद्र में रखा गया था, जो सीधे तौर पर मानव जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ है। वर्तमान समय में जब दुनिया भर में औसत आयु बढ़ रही है और कई तरह की जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां पैर पसार रही हैं, तब इस बार 'स्वस्थ आयु के लिए योग' यानी 'योग फॉर हेल्दी एजिंग' की अवधारणा को मुख्य विषय बनाया गया। कोलकाता के मंच से देश और दुनिया के नागरिकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने इस बात पर विशेष बल दिया कि योग किसी एक विशिष्ट आयु वर्ग या सीमा के लिए नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर पड़ाव पर इंसान को ऊर्जावान बनाए रखने का एक सशक्त माध्यम है। उम्र के बढ़ने के साथ शरीर में आने वाले स्वाभाविक बदलावों और मानसिक चुनौतियों का सामना करने के लिए यह प्राचीन पद्धति एक मजबूत ढाल की तरह काम करती है। नियमित रूप से प्राणायाम और विभिन्न आसनों का अभ्यास करने से न केवल बढ़ती उम्र में शारीरिक लचीलापन बना रहता है, बल्कि यह इंसान के भीतर एक गहरा भावनात्मक संतुलन और मानसिक दृढ़ता भी पैदा करता है, जिससे जीवन के अंतिम पड़ाव को भी सम्मानजनक और सक्रिय तरीके से जिया जा सकता है।

भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा से निकले इस अनमोल उपहार की यात्रा वैश्विक पटल पर बेहद विस्मयकारी रही है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2014 में भारत के प्रस्ताव को अभूतपूर्व समर्थन देते हुए 21 जून को इस विशेष दिवस के रूप में घोषित किया गया था, जिसके बाद 2015 में पहली बार इसका आयोजन हुआ और तब से लेकर अब तक यह निरंतर आगे बढ़ रहा है। कोलकाता में आयोजित मुख्य समारोह के दौरान पूरा माहौल योग की सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर दिखा। कार्यक्रम की शुरुआत सामान्य योग प्रोटोकॉल के तहत विभिन्न आसनों के क्रमिक अभ्यास से हुई, जिसमें प्रधानमंत्री ने स्वयं आम नागरिकों और साधकों के साथ मिलकर योगासन किए। देश के पूर्वी हिस्से में इस मुख्य कार्यक्रम के आयोजन ने पश्चिम बंगाल के समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को भी एक नई पहचान दी। इस सामूहिक अभ्यास के दौरान मैदान पर मौजूद हर व्यक्ति के भीतर एक अनोखा अनुशासन और उत्साह देखने को मिला, जिसने यह साबित कर दिया कि यह विधा आधुनिक समाज में तनाव से मुक्ति पाने और आंतरिक शांति की खोज का सबसे सरल और प्रामाणिक जरिया बन चुकी है।

सांस्कृतिक धरोहरों का जुड़ाव

इस वर्ष देश के सांस्कृतिक मंत्रालय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सहयोग से देश के 100 ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित स्थलों पर विशेष सत्र आयोजित किए गए। इनमें दिल्ली का लाल किला, उत्तराखंड का हरिद्वार, ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर, कर्नाटक का हम्पी और बिहार का प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय शामिल रहे, जहां प्राचीन स्थापत्य के बीच योग की ऊर्जा का प्रवाह हुआ।

वैश्विक स्तर पर इस अभियान की पहुंच और व्यापकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस बार दुनिया के 210 से अधिक देशों में स्थित भारतीय मिशनों और दूतावासों के माध्यम से लगभग 2500 अलग-अलग स्थानों पर भव्य कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की गई थी। पहाड़ों की ऊंचाइयों से लेकर समंदर के किनारों तक और ठंडे यूरोपीय देशों से लेकर अफ्रीकी महाद्वीप तक, हर जगह लोगों ने भारतीय समय के अनुसार इस अभियान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। भारत के भीतर भी भौगोलिक विविधता के बावजूद एक अनूठी एकता का परिदृश्य निर्मित हुआ। कश्मीर में डल झील के शांत किनारों से लेकर कन्याकुमारी के महासागरीय तट तक और पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों से लेकर गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र तक, पूरा देश एक ही समय पर योगमय नजर आया। प्रधानमंत्री ने अपने उद्बोधन में इस बात को विशेष रूप से सामने रखा कि यह विधा इंसानी समाज, विभिन्न संस्कृतियों और देशों को आपस में जोड़ने वाली एक अदृश्य लेकिन बेहद मजबूत शक्ति है, जो वैश्विक शांति और वसुधैव कुटुंबकम की भावना को धरातल पर उतारने का काम कर रही है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और शोध भी अब इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि केवल दवाओं के भरोसे पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए एक समग्र और निवारक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। इस वर्ष आयोजित कार्यक्रमों में केवल शारीरिक व्यायाम पर ही ध्यान केंद्रित नहीं किया गया, बल्कि खान-पान की शुद्धता और समग्र कल्याण को बढ़ावा देने के लिए 'आयुष आहार' जैसी अनूठी पहलों को भी शामिल किया गया। मुख्य कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे प्रतिभागियों को पारम्परिक और पोषक तत्वों से भरपूर प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के महत्व के बारे में जागरूक किया गया। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य लोगों को यह समझाना था कि योगासनों के साथ-साथ यदि सही और संतुलित पोषण को अपनाया जाए, तो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कई गुना तक बढ़ाया जा सकता है। बदलती जीवनशैली और मानसिक अवसाद के दौर में यह प्राचीन भारतीय दर्शन संपूर्ण मानवता के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर उभरा है, जो बिना किसी खर्च के व्यक्ति को आत्मिक और शारीरिक रूप से समृद्ध बनाने की क्षमता रखता है।

कोलकाता की धरती से देश को मिला यह संदेश केवल एक दिन के उत्सव तक सीमित रहने वाला नहीं है, बल्कि इसे एक निरंतर चलने वाले आंदोलन के रूप में देखा जा रहा है। पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों, जैसे दार्जिलिंग के पहाड़ी इलाकों से लेकर दीघा के तटीय क्षेत्रों तक, इस बार लोगों में एक अलग ही स्तर का जुड़ाव देखने को मिला। स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर स्वच्छता अभियानों को भी इस आयोजन के साथ जोड़ा गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि आंतरिक शुद्धि के साथ-साथ बाह्य पर्यावरण की स्वच्छता भी स्वास्थ्य के लिए उतनी ही अनिवार्य है। प्रधानमंत्री ने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा कि हमें इस विधा को साल के केवल एक दिन यानी 21 जून तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे हर दिन के चौबीस घंटों की दिनचर्या में शामिल करना होगा। जब योग हमारे जीवन की दैनिक आदत बन जाएगा, तभी एक स्वस्थ, ऊर्जावान और सशक्त समाज का निर्माण संभव हो सकेगा जो देश के विकास में अपना पूर्ण योगदान दे सके।

इस ऐतिहासिक आयोजन की भव्यता और सफलता ने एक बार फिर यह प्रमाणित कर दिया है कि भारत की सांस्कृतिक विरासत में विश्व का कल्याण करने की अद्भुत क्षमता निहित है। कोलकाता के रेड रोड पर हजारों लोगों द्वारा एक सुर और एक ताल में किए गए आसनों की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी। इस सामूहिक प्रयास ने वैश्विक नागरिकों को यह संदेश दिया कि आधुनिकता की अंधी दौड़ और मानसिक तनाव के बीच अगर कोई तत्व इंसान को खुद से और प्रकृति से दोबारा जोड़ सकता है, तो वह यही प्राचीन विद्या है। यह आयोजन केवल शारीरिक कसरत का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह मानवीय चेतना, आपसी सद्भाव और वैश्विक कल्याण की सामूहिक प्रार्थना का जीवंत रूप था। जैसे-जैसे यह अभियान आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे यह पूरी मानव जाति के लिए अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और आंतरिक आनंद का सबसे प्रामाणिक मार्ग बनता जा रहा है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी एक संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता रहेगा।

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