Mumbai Garjana Morcha: चुनाव आयोग के खिलाफ एक मंच पर दिखे उद्धव और राज ठाकरे, ईवीएम और चुनावी प्रक्रिया पर उठाए तीखे सवाल
मुंबई में आयोजित 'गर्जना मोर्चा' के दौरान उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक ही मंच पर नजर आए। प्रदर्शन में हजारों लोगों की मौजूदगी के बीच चुनाव आयोग और ईवीएम प्रणाली पर सवाल उठाए गए।

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में आयोजित विशाल 'गर्जना मोर्चा' ने राज्य के सियासी समीकरणों में हलचल पैदा कर दी है। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के सत्यापन और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से जुड़ी प्रक्रियाओं को लेकर बुलाए गए इस विरोध प्रदर्शन में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे लंबे अरसे बाद एक ही राजनीतिक मंच पर साथ खड़े नजर आए। इस मोर्चे में दोनों दलों के कार्यकर्ताओं समेत हजारों की संख्या में आम लोग शामिल हुए, जिससे दक्षिण मुंबई और आसपास के इलाकों में व्यापक राजनीतिक माहौल गर्मा गया।
इस संयुक्त विरोध प्रदर्शन का मुख्य केंद्र भारत निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता, चुनाव संचालन के तौर-तरीके और हालिया चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे संदेह थे। प्रदर्शनकारियों ने निर्वाचन आयोग के शीर्ष अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए और आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी से लोकतांत्रिक ढांचे पर असर पड़ रहा है। ठाकरे बंधुओं के एक साथ आने से इस आंदोलन को न केवल व्यापक मीडिया कवरेज मिला, बल्कि विपक्षी खेमे में नए शक्ति संतुलन की चर्चाएं भी शुरू हो गईं।
ईवीएम और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर तीखे आरोप
रैली के दौरान वक्ताओं ने मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम), वीवीपीएटी (VVPAT) पर्चियों के मिलान और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। मंच से बोलते हुए नेताओं ने मांग की कि चुनावी प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिस पर हर नागरिक और राजनीतिक दल का पूर्ण विश्वास हो।
मोर्चे में चुनाव आयोग द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए गए। वक्ताओं का कहना था कि जब तक चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह संदेह से परे नहीं होगी, तब तक जनादेश की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहेंगे। प्रदर्शनकारियों ने तख्तियों और नारों के जरिए मतपत्रों (बैलेट पेपर) की वापसी या कम से कम सभी वीवीपीएटी पर्चियों की सौ प्रतिशत गिनती की मांग दोहराई।
ठाकरे बंधुओं का एक मंच पर आना क्यों है अहम?
महाराष्ट्र की राजनीति में बाल ठाकरे की विरासत को आगे बढ़ाने वाले दोनों चचेरे भाइयों उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक साथ आना हमेशा से बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम माना जाता रहा है। साल 2006 में राज ठाकरे द्वारा शिवसेना छोड़कर अपनी अलग पार्टी (मनसे) बनाने के बाद से दोनों नेता राजनीतिक रूप से अलग-अलग राहों पर चले हैं।
हालाँकि पारिवारिक आयोजनों में दोनों कई बार आमने-सामने आ चुके हैं, लेकिन किसी सार्वजनिक धरने या राजनीतिक मोर्चे के लिए एक ही मंच साझा करना दुर्लभ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव आयोग के विरोध के बहाने दोनों नेताओं का एक साथ आना आने वाले स्थानीय निकाय और राज्य स्तरीय चुनावों से पहले मतदाताओं, विशेषकर मराठी मतदाताओं, को एक मजबूत संदेश देने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के व्यापक इंतजाम
इस विशाल प्रदर्शन और भारी भीड़ को देखते हुए मुंबई पुलिस और यातायात प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा प्रबंध किए थे। रैली मार्ग और सभा स्थल के आसपास अतिरिक्त पुलिस बल, राज्य रिजर्व पुलिस बल (एसआरपीएफ) और दंगा नियंत्रण दस्ते तैनात किए गए थे।
मोर्चे के चलते कई प्रमुख सड़कों पर यातायात को परिवर्तित किया गया, ताकि सामान्य नागरिकों और दैनिक यात्रियों को कम से कम असुविधा का सामना करना पड़े। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, पूरा प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा और सुरक्षा व्यवस्था के तहत सीसीटीवी तथा ड्रोन कैमरों से निगरानी की गई।
गर्जना मोर्चे में लगाए गए आरोपों पर सत्ताधारी महायुति गठबंधन के नेताओं ने भी तुरंत पलटवार किया है। सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं ने विपक्ष के इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जब भी विपक्षी दल चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाते, वे संवैधानिक संस्थाओं और ईवीएम पर दोष मढ़ना शुरू कर देते हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था है और भारतीय चुनावी प्रक्रिया विश्व स्तर पर अपनी साख के लिए जानी जाती है।
इसके बावजूद, मुंबई की सड़कों पर हुए इस शक्ति प्रदर्शन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विपक्षी खेमा चुनावी शुचिता के मुद्दे को आने वाले दिनों में और अधिक आक्रामक तरीके से उठाने जा रहा है। उद्धव और राज ठाकरे की यह साझा मौजूदगी राज्य की राजनीति में नए गठबंधनों और ध्रुवीकरण की संभावनाओं को हवा दे रही है।
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