उत्तर प्रदेश सरकार का नया आदेश: आधार कार्ड अब जन्मतिथि प्रमाण के रूप में मान्य नहीं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए सभी सरकारी विभागों को निर्देश जारी किए हैं कि अब आधार कार्ड को जन्म तिथि

Nov 28, 2025 - 11:23
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उत्तर प्रदेश सरकार का नया आदेश: आधार कार्ड अब जन्मतिथि प्रमाण के रूप में मान्य नहीं।
उत्तर प्रदेश सरकार का नया आदेश: आधार कार्ड अब जन्मतिथि प्रमाण के रूप में मान्य नहीं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए सभी सरकारी विभागों को निर्देश जारी किए हैं कि अब आधार कार्ड को जन्म तिथि का प्रमाण पत्र के रूप में स्वीकार न किया जाए। यह निर्णय भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) की हालिया स्पष्टीकरण पर आधारित है, जिसमें कहा गया है कि आधार कार्ड केवल पहचान स्थापित करने के लिए है, न कि जन्म तिथि या नागरिकता साबित करने के लिए। नियोजन विभाग ने 27 नवंबर 2025 को एक कार्यकारी आदेश जारी किया, जिसमें सभी विभागों के प्रमुख सचिवों और निदेशकों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि जन्म तिथि संबंधी सभी मामलों में आधार का उपयोग न हो। यह कदम धोखाधड़ी रोकने और सटीक दस्तावेजीकरण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

आधार कार्ड को 2010 में शुरू किया गया था, जो भारत के प्रत्येक निवासी को एक अद्वितीय 12 अंकीय पहचान संख्या प्रदान करता है। इसका मुख्य उद्देश्य सब्सिडी, कल्याण योजनाओं और सरकारी सेवाओं में लाभार्थियों की पहचान करना है। लेकिन वर्षों से इसकी सीमाओं पर बहस चल रही है। यूआईडीएआई ने 31 अक्टूबर 2023 को एक पत्र जारी किया था, जिसमें स्पष्ट किया गया कि आधार में दर्ज जन्म तिथि सत्यापित नहीं होती। यह जानकारी आवेदक द्वारा घोषित या अनुमानित हो सकती है, यदि कोई आधिकारिक प्रमाण न हो। इसी आधार पर, मंत्रालय ने 20 दिसंबर 2018 के एक कार्यालय ज्ञापन में कहा था कि आधार जन्म तिथि का प्रमाण नहीं है। हाल ही में, 29 अक्टूबर 2025 को यूआईडीएआई ने एक और स्पष्टीकरण जारी किया, जिसमें दोहराया गया कि आधार को नागरिकता या जन्म तिथि के प्रमाण के रूप में इस्तेमाल न किया जाए।

उत्तर प्रदेश का यह आदेश इसी केंद्रीय निर्देशानुसार है। राज्य सरकार ने सभी विभागों को पत्र लिखा है कि भविष्य में नौकरियों, पेंशन, शैक्षणिक प्रवेश, विवाह पंजीकरण और अन्य सेवाओं में जन्म तिथि सत्यापन के लिए आधार पर निर्भर न रहें। इसके बजाय, मान्य दस्तावेज जैसे जन्म प्रमाण पत्र, स्कूल छोड़ प्रमाण पत्र (10वीं या 12वीं का), पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस या चिकित्सा प्रमाण पत्र का उपयोग करें। नियोजन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि यह बदलाव इसलिए जरूरी है क्योंकि आधार में जन्म तिथि में अक्सर त्रुटियां होती हैं, जो लाभार्थियों को गलत लाभ या असुविधा पहुंचा सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति आधार में गलत तिथि दर्ज करा लेता है, तो यह सरकारी योजनाओं में धोखा दे सकता है।

यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों से भी प्रेरित है। 24 अक्टूबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाया कि आधार कार्ड जन्म तिथि या आयु का आधिकारिक प्रमाण नहीं हो सकता। यह मामला एक मोटर दुर्घटना क्षतिपूर्ति से जुड़ा था, जहां पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने आधार के आधार पर मृतक की आयु तय की थी। कोर्ट ने इसे रद्द करते हुए कहा कि स्कूल छोड़ प्रमाण पत्र अधिक विश्वसनीय है। जस्टिस संजय करोल और उज्जल भuyan की बेंच ने यूआईडीएआई के 2023 के सर्कुलर का हवाला देते हुए कहा कि आधार केवल पहचान के लिए है। इसी तरह, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मनोज कुमार यादव बनाम राज्य मामले में कहा कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 94 के तहत आधार आयु साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी राज्य बनाम यूआईडीएआई मामले में यही राय दी। ये निर्णय पूरे देश में एक समान नीति बनाने में मदद करेंगे।

उत्तर प्रदेश में इस आदेश का प्रभाव व्यापक होगा। राज्य की आबादी 24 करोड़ से अधिक है, और आधार कार्ड के 23 करोड़ से ज्यादा जारी हो चुके हैं। सरकारी नौकरियों में आयु सीमा तय करने से लेकर पेंशन वितरण तक, जन्म तिथि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अब विभागों को वैकल्पिक दस्तावेजों की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य विभाग को जन्म पंजीकरण को अनिवार्य बनाने पर जोर देना होगा। जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 के तहत, जन्म के एक वर्ष के अंदर प्रमाण पत्र जारी होता है, लेकिन देरी से भी प्राप्त किया जा सकता है। 2025 में नागपुर में भाजपा नेता किरीट सोमैया ने विलंबित जन्म प्रमाण पत्रों की जांच के लिए एक विशेष टीम गठित करने की मांग की थी, जो अवैध प्रवासियों से जुड़ी थी। उत्तर प्रदेश में भी ऐसी शिकायतें बढ़ी हैं, जहां लोग आधार में मनमानी तिथि दर्ज कराते हैं।

सरकार ने इस बदलाव को लागू करने के लिए जागरूकता अभियान शुरू करने का निर्देश दिया है। जिला मजिस्ट्रेटों को स्थानीय स्तर पर कार्यशालाएं आयोजित करने को कहा गया है, ताकि लोग वैकल्पिक दस्तावेजों के बारे में जान सकें। यदि किसी के पास कोई प्रमाण नहीं है, तो यूआईडीएआई के अनुसार, आधार में जन्म तिथि को घोषित या अनुमानित दर्ज किया जा सकता है, लेकिन इसे प्रमाण के रूप में उपयोग न करें। पुनरीक्षण के लिए, आधार केंद्रों पर जन्म प्रमाण पत्र या अन्य दस्तावेज जमा करने पड़ेंगे। हाल ही में यूआईडीएआई ने आधार अपडेट शुल्क भी बढ़ाया है, जो 1 अक्टूबर 2025 से लागू हुआ, ताकि सत्यापन प्रक्रिया मजबूत हो।

यह फैसला अन्य राज्यों के लिए भी मार्गदर्शक बनेगा। दिल्ली, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों ने पहले ही आधार को जन्म तिथि प्रमाण से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने 2024 में ही आधार को आयु प्रमाण के रूप में अस्वीकार कर दिया। चुनाव आयोग अभी भी मतदाता सूची में आधार को जन्म तिथि के लिए स्वीकार करता है, लेकिन नए स्पष्टीकरण से यह बदल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम डिजिटल इंडिया को मजबूत करेगा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में दस्तावेजों की कमी से परेशानी हो सकती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, उत्तर प्रदेश के 40 प्रतिशत ग्रामीण निवासियों के पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। सरकार को मोबाइल पंजीकरण इकाइयों के माध्यम से सहायता प्रदान करनी होगी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कैबिनेट बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की और कहा कि सटीक दस्तावेजीकरण से भ्रष्टाचार रुकेगा। विपक्ष ने स्वागत किया है, लेकिन लागू करने में देरी न होने की चेतावनी दी। एक विपक्षी नेता ने कहा कि ग्रामीणों को मुफ्त प्रमाण पत्र जारी करने की योजना होनी चाहिए। कुल मिलाकर, यह फैसला आधार प्रणाली की सीमाओं को रेखांकित करता है और अधिक विश्वसनीय सिस्टम की ओर इशारा करता है। भविष्य में, डिजिटल लॉकर में सभी प्रमाण पत्रों को एकीकृत करने की योजना है, जो सत्यापन को आसान बनाएगी। लेकिन फिलहाल, लोगों को अपने दस्तावेजों को अपडेट करने की सलाह दी जाती है।

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