Tata Power Struggle: टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच टकराव खुलकर सामने आया, एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल और लिस्टिंग पर विवाद
टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल और संभावित लिस्टिंग को लेकर कानूनी विवाद गरमाया। ग्रुप शेयरों को ₹40,000 करोड़ का नुकसान।

देश के सबसे प्रतिष्ठित और पुराने औद्योगिक घरानों में शुमार टाटा समूह एक बार फिर बड़े कॉर्पोरेट और कानूनी विवाद के केंद्र में आ गया है। समूह की होल्डिंग कंपनी 'टाटा संस' और इसमें 66 प्रतिशत की नियंत्रक हिस्सेदारी रखने वाले परोपकारी 'टाटा ट्रस्ट्स' के बीच अधिकार क्षेत्र, नेतृत्व और संभावित सार्वजनिक लिस्टिंग (आईपीओ) को लेकर खींचतान खुलकर सार्वजनिक हो गई है। टाटा संस के कार्यकारी चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के दूसरे कार्यकाल से जुड़े प्रशासनिक फैसलों और आरबीआई के नियमों के तहत कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने के प्रस्तावों पर दोनों पक्षों के बीच गंभीर मतभेद पैदा हो गए हैं।
विवाद के कानूनी रूप लेते ही इसका सीधा असर दलाल स्ट्रीट पर देखने को मिला। अनिश्चितता के माहौल के बीच समूह की प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली दर्ज की गई, जिससे टाटा समूह के कुल बाजार पूंजीकरण (मार्केट कैप) में करीब 40,000 करोड़ रुपये का तेज क्षरण हुआ है। 66 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ मालिकाना हक रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स ने प्रशासनिक स्तर पर लिए गए कुछ प्रमुख निर्णयों को कॉर्पोरेट नियमों के प्रतिकूल करार देते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को अपना कानूनी पक्ष रखने के लिए अधिकृत किया है।
विवाद की मुख्य जड़: लिस्टिंग और प्रशासनिक अधिकार
पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा एनबीएफसी (अपर लेयर) के लिए तय किए गए वे नियम हैं, जिसके तहत बड़े आकार की मुख्य निवेश कंपनियों (सीआईसी) को अनिवार्य रूप से शेयर बाजार में लिस्ट होना पड़ता है। टाटा संस को आरबीआई द्वारा अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया गया था, जिसके अनुसार सितंबर 2025 तक कंपनी की लिस्टिंग प्रक्रिया पूरी करने की समयसीमा निर्धारित थी।
होल्डिंग कंपनी के स्तर पर लिस्टिंग की तैयारी और उसके वित्तीय ढांचे को लेकर चर्चाएं चल रही थीं, लेकिन ट्रस्ट्स की ओर से हमेशा से इस बात पर चिंता जताई जाती रही है कि सार्वजनिक लिस्टिंग से टाटा समूह की मूल परोपकारी संरचना और नियंत्रण का स्वरूप प्रभावित हो सकता है। टाटा ट्रस्ट्स के न्यासियों का मानना है कि सूचीबद्ध होने के बाद कंपनी पर सार्वजनिक शेयरधारकों, तिमाही वित्तीय नतीजों और विनियामक अनुपालन का अत्यधिक दबाव बढ़ेगा, जिससे ट्रस्ट्स के ऐतिहासिक अधिकारों और परोपकारी प्राथमिकताओं में दखलअंदाजी बढ़ सकती है। इसी विषय पर चेयरमैन के तौर-तरीकों और बोर्ड स्तर पर हुई सहमतियों को लेकर असंतोष गहराता गया।
चेयरमैन के कार्यकाल और निर्णय प्रक्रिया पर आपत्तियां
एन चंद्रशेखरन वर्ष 2017 में साइरस मिस्त्री विवाद के बाद टाटा संस के चेयरमैन बने थे और वर्ष 2022 में उनके कार्यकाल को पांच वर्षों के लिए दोबारा बढ़ाया गया था। उनके नेतृत्व में समूह ने एयर इंडिया का अधिग्रहण, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का विस्तार, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण जैसे आधुनिक क्षेत्रों में आक्रामक विस्तार किया।
हालांकि, अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक हाल के समय में लिए गए कुछ महत्वपूर्ण रणनीतिक निर्णयों, पूंजी आवंटन और कॉर्पोरेट पुनर्गठन को लेकर ट्रस्ट्स के प्रतिनिधियों को पूरी तरह विश्वास में न लिए जाने के आरोप सामने आ रहे हैं। ट्रस्ट्स का तर्क है कि आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन (AoA) के तहत किसी भी बड़े नीतिगत या संरचनात्मक बदलाव के लिए ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों की पूर्व सहमति अनिवार्य है। इस प्रक्रियात्मक टकराव ने प्रशासनिक असहमति को एक खुले विवाद में तब्दील कर दिया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की एंट्री
कानूनी मोर्चे पर स्थिति उस समय बेहद संवेदनशील हो गई जब टाटा ट्रस्ट्स ने इस पूरे घटनाक्रम में देश के वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की सेवाएं लेने का निर्णय लिया। गौरतलब है कि अभिषेक मनु सिंघवी ने 2016 के चर्चित मिस्त्री बनाम टाटा कानूनी संघर्ष में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
ट्रस्ट्स की ओर से कानूनी सलाहकारों की नियुक्ति यह स्पष्ट संकेत देती है कि मामला केवल बोर्ड रूम की चर्चाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) या उच्चतर विनियामक प्राधिकरणों के समक्ष जाने की तैयारी की जा रही है। ट्रस्ट्स अपने अधिकारों की रक्षा और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की धाराओं की वैधानिकता को लेकर किसी भी स्तर पर झुकने के मूड में नहीं दिख रहा है।
बाजार पर असर: निवेशकों के ₹40,000 करोड़ डूबे
टाटा समूह की कंपनियों को भारतीय कॉरपोरेट जगत में सुशासन (कॉर्पोरेट गवर्नेंस) का मानक माना जाता रहा है। ऐसे में जब समूह के शीर्ष स्तर पर टकराव की खबरें आईं, तो घरेलू और विदेशी संस्थागत निवेशकों में घबराहट फैल गई।
कारोबारी सत्र के दौरान समूह की प्रमुख दिग्गज कंपनियों जैसे टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर और टाइटन कंपनी के शेयरों में 2 से 4 प्रतिशत तक की बिकवाली दर्ज की गई। बाजार विश्लेषकों का आकलन है कि एक ही कारोबारी दिन में समूह की सूचीबद्ध कंपनियों के कुल बाजार मूल्यांकन में लगभग 40,000 करोड़ रुपये की कमी आई। बाजार जानकारों का कहना है कि जब तक शीर्ष स्तर पर प्रशासनिक स्पष्टता नहीं आती, तब तक इन शेयरों में अस्थिरता बनी रह सकती है।
2016 के साए
यह स्थिति समूह के इतिहास के उस दौर की याद दिलाती है जब अक्टूबर 2016 में तत्कालीन चेयरमैन साइरस मिस्त्री को पद से हटाए जाने के बाद वर्षों तक कानूनी और सार्वजनिक लड़ाई चली थी। उस समय भी नियंत्रण बनाम प्रबंधन की स्वतंत्रता का सवाल सबसे बड़ा था।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब आगे के घटनाक्रम मुख्य रूप से तीन संभावनाओं पर निर्भर करेंगे:
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आपसी सुलह और बोर्ड रूम समाधान: दोनों पक्षों के शीर्ष प्रतिनिधि बैठकर आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के अनुपालन और निर्णय प्रक्रिया के लिए एक नया आंतरिक फ्रेमवर्क तय करें।
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आरबीआई के समक्ष छूट की अर्जी: टाटा संस अपनी एनबीएफसी संरचना में इस तरह बदलाव करे कि उसे अनिवार्य लिस्टिंग से कानूनी छूट मिल सके, जिससे लिस्टिंग को लेकर उपजा मुख्य तनाव शांत हो सके।
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औपचारिक कानूनी जंग: यदि ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों और मौजूदा प्रबंधन के बीच सहमति नहीं बनती, तो मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) तक जा सकता है, जो समूह की साख और निवेशकों की धारणा के लिए लंबे समय तक चुनौतीपूर्ण रहेगा।
फिलहाल देश के उद्योग जगत की निगाहें बॉम्बे हाउस पर टिकी हैं कि क्या यह टकराव जल्द बातचीत के जरिए थमेगा या फिर देश की सबसे बड़ी व्यापारिक संस्था को एक और लंबी विधिक लड़ाई का सामना करना पड़ेगा।
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