सिस्टम की बेरुखी: 83 साल की बुजुर्ग को ट्रॉली पर खींचकर दफ्तर लाया बेटा, पेंशन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर।

ओडिशा के केंदुझर जिले से सामने आई यह घटना आधुनिक भारत में डिजिटल होते सरकारी तंत्र और जमीनी स्तर पर व्याप्त प्रशासनिक

May 7, 2026 - 11:32
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सिस्टम की बेरुखी: 83 साल की बुजुर्ग को ट्रॉली पर खींचकर दफ्तर लाया बेटा, पेंशन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर।
सिस्टम की बेरुखी: 83 साल की बुजुर्ग को ट्रॉली पर खींचकर दफ्तर लाया बेटा, पेंशन के लिए दर-दर भटकने को मजबूर।
  • ओडिशा में मानवता शर्मसार: पाई-पाई को मोहताज बुजुर्ग महिला का संघर्ष, सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच फंसी जिंदगी
  • वृद्धावस्था भत्ते में कटौती और सरकारी दफ्तरों के चक्कर: आनंदपुर में सिस्टम की लाचारी की मार्मिक कहानी आई सामने

ओडिशा के केंदुझर जिले से सामने आई यह घटना आधुनिक भारत में डिजिटल होते सरकारी तंत्र और जमीनी स्तर पर व्याप्त प्रशासनिक संवेदनहीनता के बीच के गहरे अंतर को दर्शाती है। आनंदपुर नगर पालिका क्षेत्र के वार्ड नंबर-7 की निवासी 83 वर्षीय वृद्धा गुर जेना की स्थिति ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वास्तव में कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उन लोगों तक सुगमता से पहुंच पा रहा है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। चलने-फिरने में पूरी तरह अक्षम और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही यह बुजुर्ग महिला जब कड़कड़ाती धूप और शारीरिक कष्ट के बीच अपने बेटे के साथ कूड़ा ढोने वाली ट्रॉली पर बैठकर नगर पालिका कार्यालय पहुंची, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं। यह दृश्य केवल एक परिवार की मजबूरी का नहीं था, बल्कि उन हजारों बुजुर्गों की व्यथा का प्रतीक था जो अपनी ही मेहनत की कमाई या सरकार द्वारा घोषित हक को पाने के लिए दफ्तरों की चौखट पर दम तोड़ देते हैं। गुर जेना की समस्या केवल दफ्तर तक आने-जाने की नहीं है, बल्कि उस आर्थिक अन्याय की है जो उनके साथ बीते कुछ समय से हो रहा है। सरकारी नियमों और वृद्धों के लिए बनाई गई विशेष पेंशन योजनाओं के अंतर्गत उन्हें प्रतिमाह 3500 रुपये की सहायता राशि मिलनी चाहिए। यह राशि एक बुजुर्ग के लिए उनकी दवाइयों, भोजन और न्यूनतम जरूरतों के लिए जीवनरेखा के समान होती है। हालांकि, आरोप है कि उनके बैंक खाते में पिछले काफी समय से केवल 1000 रुपये ही भेजे जा रहे हैं। जब परिवार ने इस विसंगति को सुधारने की कोशिश की, तो उन्हें मदद के बजाय केवल आश्वासनों का पुलिंदा थमाया गया। पिछले पांच दिनों से वह बुजुर्ग महिला और उनका बेटा बाना जेना नगर पालिका कार्यालय से लेकर उपजिलापाल कार्यालय तक के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन अधिकारियों की फाइलों में दर्ज 'ऑनलाइन प्रक्रिया' का पेंच उनके जीवन की गाड़ी को थामे हुए है।

वृद्धा के बेटे बाना जेना के अनुसार, अधिकारियों का व्यवहार सहायतापूर्ण होने के बजाय टालमटोल वाला रहा है। जब भी वे अपनी शिकायत लेकर दफ्तर पहुंचते हैं, तो उन्हें यह कहकर वापस भेज दिया जाता है कि सिस्टम में कुछ तकनीकी दिक्कत है या ऑनलाइन डेटा अपडेट होने के बाद पैसा स्वतः आ जाएगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि कई महीनों की किश्तें या तो गायब हैं या फिर आधी-अधूरी मिली हैं। स्थिति तब और भी गंभीर हो गई जब शिकायत करने पर कथित तौर पर उन्हें यह धमकी दी गई कि ज्यादा शोर मचाने पर उनका बैंक खाता या पेंशन की सुविधा पूरी तरह बंद कर दी जाएगी। एक तरफ सरकारें घर-द्वार तक सेवाएं पहुंचाने का दावा करती हैं, वहीं दूसरी तरफ एक बेबस बेटा अपनी मां को लकड़ी की एक पुरानी ट्रॉली पर खींचकर ले जाने को मजबूर है क्योंकि उनके पास निजी वाहन या एम्बुलेंस के लिए पैसे नहीं हैं और सरकारी तंत्र ने उनकी पुकार सुनने से इनकार कर दिया। जब एक 83 वर्षीय नागरिक को अपने जीवित होने का प्रमाण देने या अपने हक की राशि मांगने के लिए शारीरिक रूप से दफ्तर में उपस्थित होने को बाध्य किया जाता है, तो यह प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। तकनीक का उद्देश्य लोगों के जीवन को सरल बनाना था, न कि उन्हें ट्रॉली पर बैठकर दफ्तरों के चक्कर कटवाना।

इस पूरे प्रकरण में सबसे दुखद पहलू गुर जेना की अपनी आपबीती है। उन्होंने अत्यंत क्षीण स्वर में अपनी मजबूरी व्यक्त की कि वे खुद दफ्तर आने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन घर में राशन और अपनी दवाइयों के लिए उन्हें इस उम्र में भी अधिकारियों के सामने हाथ फैलाने पड़ रहे हैं। उनके शरीर की कमजोरी और आंखों में बेबसी साफ देखी जा सकती थी। उनका बेटा दिहाड़ी मजदूरी करके किसी तरह घर चलाता है, ऐसे में पेंशन की राशि में 2500 रुपये की कटौती उनके परिवार के लिए किसी बड़े वित्तीय झटके से कम नहीं है। सरकारी बाबू यह समझने में विफल रहे कि एक बुजुर्ग के लिए रू.2500 की कीमत क्या होती है। यह उस व्यवस्था पर कड़ा प्रहार है जो कागजों पर तो बहुत मजबूत दिखती है, लेकिन जब बात धरातल पर क्रियान्वयन की आती है, तो वह पूरी तरह खोखली नजर आती है।

जैसे ही यह मामला स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना और मीडिया व समाज के अन्य वर्गों के माध्यम से उच्चाधिकारियों तक पहुंचा, प्रशासन की नींद टूटी। आनंदपुर के उपजिलापाल ने आनन-फानन में मामले का संज्ञान लिया और इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने आश्वासन दिया है कि बुजुर्ग महिला की पेंशन संबंधी समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाएगा और जो भी राशि बकाया है, उसे जल्द से जल्द उनके खाते में हस्तांतरित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके साथ ही, उन्होंने इस बात की जांच के आदेश भी दिए हैं कि आखिर किस स्तर पर लापरवाही हुई और किन परिस्थितियों में एक बुजुर्ग महिला को इस तरह की शारीरिक यातना झेलते हुए सरकारी दफ्तर तक आना पड़ा। प्रशासन अब यह सुनिश्चित करने की बात कह रहा है कि भविष्य में किसी भी बुजुर्ग के साथ इस तरह का व्यवहार न हो। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली इस प्रकार की बाधाएं अक्सर 'डिजिटल डिवाइड' और ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त सूचना के अभाव के कारण होती हैं। अक्सर पोर्टल पर डेटा गलत दर्ज होने या बैंक और सरकारी सर्वर के बीच तालमेल न होने का खामियाजा गरीब जनता को भुगतना पड़ता है। इस मामले ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि केवल योजनाएं बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी निगरानी और फीडबैक तंत्र का होना भी उतना ही आवश्यक है। यदि समय रहते गुर जेना की पहली शिकायत पर कार्रवाई हो गई होती, तो उन्हें वह दिन नहीं देखना पड़ता जब उन्हें सार्वजनिक रूप से अपनी लाचारी का प्रदर्शन करना पड़ा। प्रशासन को चाहिए कि वह ऐसे मामलों में 'डोरस्टेप डिलीवरी' या घर जाकर सत्यापन करने की प्रक्रिया को अनिवार्य बनाए ताकि दिव्यांग और अति-वृद्ध नागरिकों को कार्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें।

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