कानपुर किडनी रैकेट का बड़ा खुलासा: दो टीमों के जरिए चलता था 'ऑर्गनाइज्ड क्राइम', दलालों से लेकर डॉक्टरों तक फैला था नेटवर्क।
कानपुर के स्वरूपनगर और लाजपतनगर जैसे पॉश इलाकों में स्थित नर्सिंग होम इस अवैध धंधे के मुख्य केंद्र बनकर उभरे हैं। पुलिस की शुरुआती
- स्वरूपनगर और लाजपतनगर के अस्पतालों में होता था अवैध ट्रांसप्लांट
- मददगारों की तलाश में जुटी पुलिस: ओटी तकनीशियन और फर्जी डॉक्टरों ने मिलकर रची मौत की साजिश
कानपुर के स्वरूपनगर और लाजपतनगर जैसे पॉश इलाकों में स्थित नर्सिंग होम इस अवैध धंधे के मुख्य केंद्र बनकर उभरे हैं। पुलिस की शुरुआती जांच में आहूजा हॉस्पिटल और मेडीलाइफ जैसे संस्थानों का नाम प्रमुखता से सामने आया है। यह रैकेट इतना शातिर था कि इसने सुरक्षा और कानूनी जांच से बचने के लिए एक 'थ्री-हॉस्पिटल मॉडल' तैयार किया था। एक अस्पताल में किडनी निकाली जाती थी, दूसरे में डोनर (दाता) को रखा जाता था और तीसरे में प्राप्तकर्ता (Recipient) का इलाज किया जाता था। इस तरह किसी भी एक अस्पताल के पास पूरी जानकारी नहीं होती थी, जिससे पकड़े जाने का खतरा कम रहता था।
पुलिस की जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि इस पूरे खेल को दो विशेष टीमें संचालित कर रही थीं। पहली टीम का काम था सोशल मीडिया (विशेषकर टेलीग्राम के 'किडनी डोनर' ग्रुप) और व्यक्तिगत संपर्कों के जरिए उन लोगों को ढूंढना जो आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। इनमें बिहार और झारखंड के छात्र और बेरोजगार युवा प्रमुख रूप से शामिल थे। दूसरी टीम का काम था मेडिकल प्रक्रियाओं को अंजाम देना। हैरानी की बात यह है कि इस टीम में शामिल कई लोग असल में डॉक्टर नहीं, बल्कि ओटी तकनीशियन (OT Technicians) थे, जो खुद को विशेषज्ञ बताकर ऑपरेशन करते थे। दिल्ली के उत्तम नगर का रहने वाला मुदस्सिर अली सिद्दीकी, जो एक तकनीशियन है, कथित तौर पर 40 से अधिक अवैध ट्रांसप्लांट कर चुका है।
इस 'खूनी खेल' में शामिल लोग डोनर को महज 5 से 7 लाख रुपये का लालच देते थे, जबकि उसी किडनी को जरूरतमंद मरीजों को 70 से 90 लाख रुपये में बेचा जाता था। इस भारी मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा दलालों, अस्पताल संचालकों और उन फर्जी डॉक्टरों के बीच बंटता था। पुलिस ने अब तक आहूजा अस्पताल के संचालक डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा, उनकी पत्नी डॉ. प्रीति आहूजा और मुख्य दलाल शिवम अग्रवाल समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया है। जांच में यह भी पता चला है कि दस्तावेजों में हेरफेर कर डोनर और प्राप्तकर्ता के बीच फर्जी पारिवारिक रिश्ते दिखाए जाते थे ताकि कानूनी अड़चनों को दूर किया जा सके।
रू.50,000 के विवाद ने खोला राज
इस अंतरराष्ट्रीय स्तर के रैकेट का पर्दाफाश केवल 50,000 रुपये के विवाद के कारण हुआ। उत्तराखंड के एक डोनर को वादे के मुताबिक पूरी रकम नहीं मिली थी, जिससे नाराज होकर वह पुलिस के पास पहुँच गया। उसकी शिकायत ने एक ऐसी कड़ी का काम किया जिससे कानपुर से लेकर दिल्ली और नेपाल तक फैला यह पूरा नेटवर्क ध्वस्त हो गया।
पुलिस अब उन 'मददगारों' की तलाश में है जो इन अस्पतालों को अवैध तरीके से संचालित करने में मदद कर रहे थे। जांच के दायरे में स्वास्थ्य विभाग के कुछ निचले स्तर के कर्मचारी और स्थानीय रसूखदार लोग भी हैं, जो इन नर्सिंग होम के खिलाफ होने वाली शिकायतों को दबा देते थे। स्वरूपनगर के एक नर्सिंग होम में तो बिना पंजीकरण के ही ऑपरेशन थिएटर चलाया जा रहा था। पुलिस को संदेह है कि इस रैकेट ने केवल कानपुर ही नहीं, बल्कि लखनऊ, गाजियाबाद और दिल्ली के कई अस्पतालों में भी अपनी पैठ बना रखी थी। मेरठ के भी एक अस्पताल के तार इस गिरोह से जुड़े मिले हैं, जिसकी जांच जारी है। इस रैकेट की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गलत तरीके से किए गए ट्रांसप्लांट के कारण कई मरीजों की जान को खतरा पैदा हो गया है। एक ऑडियो रिकॉर्डिंग से खुलासा हुआ है कि एक महिला की अवैध ट्रांसप्लांट के बाद दिल्ली के एक अस्पताल में मौत हो गई थी। पुलिस उन सभी मरीजों की सूची तैयार कर रही है जिन्होंने पिछले दो वर्षों में इन संदिग्ध अस्पतालों में ट्रांसप्लांट कराया था। फरार चल रहे डॉ. रोहित और अन्य सहयोगियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की कई टीमें दिल्ली, गाजियाबाद और मेरठ में छापेमारी कर रही हैं।
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