कलकत्ता हाई कोर्ट ने आफताब आलम की फांसी की सजा को 20 साल की उम्रकैद में बदला, कहा- 'न्याय खून का प्यासा नहीं। 

कलकत्ता हाई कोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में अपने मामा की हत्या के दोषी आफताब आलम की फांसी की सजा को उम्रकैद ....

Aug 8, 2025 - 12:03
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कलकत्ता हाई कोर्ट ने आफताब आलम की फांसी की सजा को 20 साल की उम्रकैद में बदला, कहा- 'न्याय खून का प्यासा नहीं। 
कलकत्ता हाई कोर्ट ने आफताब आलम की फांसी की सजा को 20 साल की उम्रकैद में बदला, कहा- 'न्याय खून का प्यासा नहीं। 

कलकत्ता हाई कोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में अपने मामा की हत्या के दोषी आफताब आलम की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। यह फैसला 1 अगस्त 2025 को सुनाया गया, जिसमें आफताब को 20 साल तक बिना पैरोल के जेल में रहने की सजा दी गई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न्याय का उद्देश्य सुधारात्मक होना चाहिए, न कि खून का प्यासा। यह मामला पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के धूपगुड़ी में 28 जुलाई 2023 को हुई मेहताब आलम की हत्या से जुड़ा है। आफताब ने अपने पांच नाबालिग साथियों के साथ मिलकर अपने मामा के घर में डकैती के दौरान उनकी हत्या की थी।

आफताब आलम (22) को जलपाईगुड़ी सत्र न्यायालय ने 2024 में अपने मामा मेहताब आलम की हत्या और डकैती के आरोप में फांसी की सजा सुनाई थी। यह घटना 28 जुलाई 2023 को धूपगुड़ी में हुई, जब आफताब ने अपने पांच नाबालिग साथियों के साथ मिलकर अपने मामा के घर में लूटपाट की कोशिश की। इस दौरान मेहताब की चाकू मारकर हत्या कर दी गई, जबकि उनकी पत्नी मौमिता हमले में बच गईं। सत्र न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 396 (हत्या के साथ डकैती) के तहत आफताब को दोषी ठहराया और इसे "दुर्लभतम" अपराध की श्रेणी में रखते हुए फांसी की सजा दी। सत्र कोर्ट ने यह भी कहा कि आफताब ने उस व्यक्ति के साथ विश्वासघात किया, जिसने उसके पिता की मृत्यु के बाद उसे पाला-पोसा था।

हाई कोर्ट में अपील के दौरान, जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस उदय कुमार की खंडपीठ ने सत्र न्यायालय के फैसले की समीक्षा की। 47 पन्नों के अपने विस्तृत फैसले में, बेंच ने निचली अदालत के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि यह अपराध "दुर्लभतम" श्रेणी में नहीं आता, जिसके लिए फांसी की सजा जरूरी हो। कोर्ट ने यह भी माना कि निचली अदालत ने तथ्यों से ज्यादा भावनाओं पर ध्यान दिया।

  • हाई कोर्ट का तर्क

जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जोर दिया। सबसे पहले, कोर्ट ने कहा कि आफताब और उसके मामा के बीच विश्वासघात का कोई ठोस सबूत नहीं है। सत्र न्यायालय ने माना था कि मेहताब ने आफताब को अपने बेटे की तरह पाला था, लेकिन हाई कोर्ट ने पाया कि आफताब वर्षों से अपने मामा के साथ नहीं रह रहा था। वह अपराध के समय दिल्ली में था और केवल कुछ समय पहले ही धूपगुड़ी लौटा था। इसलिए, विश्वासघात का दृष्टिकोण लागू नहीं होता।

दूसरा, कोर्ट ने माना कि हत्या सुनियोजित नहीं थी, बल्कि यह एक अचानक हुई प्रतिक्रिया थी। आफताब ने लूटपाट से पहले एक होटल में कमरा बुक किया था और अपना आधार कार्ड दिया था, जो यह दर्शाता है कि उसका इरादा अपराध को छिपाने का नहीं था। तीसरा, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि फांसी की सजा केवल "दुर्लभतम" मामलों में दी जानी चाहिए, और यह मामला उस श्रेणी में नहीं आता।

जस्टिस भट्टाचार्य ने अपने फैसले में कहा, "न्यायाधीशों को कभी भी खून का प्यासा नहीं होना चाहिए। हत्यारों को फांसी देना उनके लिए कभी अच्छा नहीं रहा।" उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि जेलों का नाम "प्रिजन" से बदलकर "सुधार गृह" किया गया है, जो समाज की बदला लेने की प्रवृत्ति से हटकर सुधार की नीति को दर्शाता है। कोर्ट ने कहा, "हमें अपराध से नफरत करनी चाहिए, अपराधी से नहीं।" इस टिप्पणी ने न्याय व्यवस्था में सुधार के सिद्धांत को रेखांकित किया।

  • सजा में बदलाव

हाई कोर्ट ने आफताब की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलते हुए यह शर्त रखी कि वह 20 साल तक बिना पैरोल के जेल में रहेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि समयपूर्व रिहाई का कोई विकल्प तभी संभव होगा, जब असाधारण परिस्थितियां हों और संबंधित अदालत इससे संतुष्ट हो। यह सजा भारतीय दंड संहिता की धारा 396 के तहत दी गई, जो हत्या के साथ डकैती के लिए अधिकतम सजा का प्रावधान करती है।

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि अपराध के समय आफताब के साथ मौजूद पांच अन्य नाबालिगों को किशोर न्याय अधिनियम के तहत अलग से सजा दी गई थी। इन नाबालिगों की संलिप्तता ने भी इस मामले को जटिल बनाया, लेकिन हाई कोर्ट ने केवल आफताब की सजा पर विचार किया, क्योंकि वह इस मामले में मुख्य दोषी था।

इस फैसले ने समाज में मिश्रित प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कीं। सोशल मीडिया मंच X पर कुछ लोगों ने हाई कोर्ट के सुधारात्मक दृष्टिकोण की सराहना की। एक यूजर ने लिखा, "न्याय का मकसद बदला लेना नहीं, बल्कि सुधार करना होना चाहिए। हाई कोर्ट का यह फैसला एक सकारात्मक कदम है।" हालांकि, कुछ लोगों ने इस फैसले की आलोचना की और कहा कि मामा की हत्या जैसे गंभीर अपराध के लिए फांसी की सजा ही उचित थी। एक अन्य यूजर ने लिखा, "अपराधी को इतनी नरमी क्यों? यह समाज के लिए गलत संदेश देता है।"

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भारत में फांसी की सजा पर चल रही बहस को और गहरा करता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले कई मामलों में कहा है कि फांसी की सजा केवल "दुर्लभतम" मामलों में दी जानी चाहिए। इस मामले में हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन करते हुए सजा को कम किया। वकील अमित शर्मा ने कहा, "यह फैसला दर्शाता है कि भारतीय न्याय व्यवस्था सुधार और पुनर्वास पर ध्यान दे रही है, लेकिन गंभीर अपराधों में सजा का संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है।"

  • फांसी की सजा पर बहस

भारत में फांसी की सजा को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 1980 के दशक में "बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य" मामले में "दुर्लभतम" सिद्धांत स्थापित किया था, जिसमें कहा गया था कि फांसी की सजा केवल तभी दी जानी चाहिए, जब कोई अन्य विकल्प न हो। इसके बाद से कई मामलों में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला गया है। उदाहरण के लिए, 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में एक बच्ची से बलात्कार और हत्या के मामले में फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला था, यह कहते हुए कि अपराधी का सुधार संभव है।

हाल के वर्षों में, फांसी की सजा को लेकर आंकड़े भी ध्यान देने योग्य हैं। 2004 से 2024 तक, भारत में 2,543 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन केवल 8 को फांसी दी गई। अधिकांश मामलों में सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया या दया याचिका के कारण रुका हुआ है।

इस मामले ने धूपगुड़ी के स्थानीय समुदाय में भी चर्चा छेड़ दी है। मेहताब आलम के परिवार ने सत्र न्यायालय के फांसी के फैसले का समर्थन किया था, लेकिन हाई कोर्ट के फैसले से वे निराश हैं। मेहताब की पत्नी मौमिता ने कहा, "हमने अपने परिवार का एक महत्वपूर्ण सदस्य खोया। हम चाहते थे कि दोषी को कड़ी सजा मिले।" दूसरी ओर, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हाई कोर्ट के फैसले का स्वागत किया और कहा कि यह युवा अपराधियों को सुधार का मौका देता है।

यह मामला यह भी दर्शाता है कि पारिवारिक रिश्तों में विश्वासघात और आर्थिक लालच अपराध का कारण बन सकते हैं। आफताब के मामा ने उसे अपने परिवार का हिस्सा बनाया था, लेकिन लूटपाट की मंशा ने इस रिश्ते को तोड़ दिया। यह घटना समाज में नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों पर भी सवाल उठाती है।

कलकत्ता हाई कोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच ने आफताब आलम की फांसी की सजा को 20 साल की उम्रकैद में बदलकर यह संदेश दिया कि न्याय का मकसद बदला लेना नहीं, बल्कि सुधार करना है। कोर्ट की टिप्पणी, "न्याय खून का प्यासा नहीं होना चाहिए," भारतीय न्याय व्यवस्था में सुधारात्मक दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। यह फैसला न केवल आफताब के लिए, बल्कि समाज के लिए भी एक संदेश है कि अपराध से नफरत करनी चाहिए, न कि अपराधी से।

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