राजस्थान के टोंक में कंबल वितरण में मुस्लिम महिलाओं से भेदभाव, पूर्व BJP MP सुखबीर सिंह जौनपुरिया पर आरोप। 

राजस्थान के टोंक जिले के करेड़ा बुजुर्ग गांव में 22 फरवरी 2026 को सीता-राम मंदिर परिसर में आयोजित एक कंबल वितरण कार्यक्रम ने बड़ा

Feb 24, 2026 - 14:24
Feb 24, 2026 - 14:31
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राजस्थान के टोंक में कंबल वितरण में मुस्लिम महिलाओं से भेदभाव, पूर्व BJP MP सुखबीर सिंह जौनपुरिया पर आरोप। 
राजस्थान के टोंक में कंबल वितरण में मुस्लिम महिलाओं से भेदभाव, पूर्व BJP MP सुखबीर सिंह जौनपुरिया पर आरोप। 
  • ग्रामीणों ने लौटाए कंबल और मिठाई, कहा नफरत फैलाने वाली मदद नहीं चाहिए
  • विपक्ष का तीखा हमला, घटना को सामाजिक सौहार्द पर हमला बताया, जांच की मांग

राजस्थान के टोंक जिले के करेड़ा बुजुर्ग गांव में 22 फरवरी 2026 को सीता-राम मंदिर परिसर में आयोजित एक कंबल वितरण कार्यक्रम ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है, जहां पूर्व भाजपा सांसद सुखबीर सिंह जौनपुरिया पर मुस्लिम महिलाओं से भेदभाव करने का आरोप लगा है। कार्यक्रम में गरीबों और जरूरतमंदों को कंबल बांटे जा रहे थे, लेकिन जब कुछ महिलाएं कतार में खड़ी होकर अपनी बारी का इंतजार कर रही थीं, तो आयोजकों ने उनसे नाम पूछा। नाम सुनते ही उनकी धार्मिक पहचान पता चलने पर कंबल देने से इनकार कर दिया गया और जो कंबल पहले दिए गए थे, उन्हें वापस ले लिया गया। जौनपुरिया, जो 2014 से 2024 तक टोंक-सवाई माधोपुर से सांसद रहे हैं, ने खुद माइक पर कहा कि जो लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली देते हैं, उन्हें कंबल लेने का कोई हक नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर कोई बुरा लगे तो लगे, लेकिन ऐसी सच्चाई है। यह बयान और कार्रवाई कैमरे में कैद हो गई और सोशल मीडिया पर वीडियो तेजी से वायरल हो गया, जिससे पूरे इलाके में हंगामा मच गया। जौनपुरिया ने बाद में सफाई दी कि यह कार्यक्रम पूरी तरह से निजी था, कोई सरकारी फंड या योजना इसमें शामिल नहीं थी, इसलिए वितरण का फैसला उनका व्यक्तिगत था। लेकिन इस स्पष्टीकरण के बावजूद विवाद बढ़ता गया, क्योंकि ग्रामीणों ने इसे साम्प्रदायिक भेदभाव का स्पष्ट उदाहरण माना। कार्यक्रम का मकसद गरीबों की मदद करना था, लेकिन धार्मिक आधार पर भेदभाव ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया।

इस घटना के बाद गांव में सभी धर्मों के लोग एकजुट होकर विरोध में उतर आए, और उन्होंने सामूहिक रूप से फैसला लिया कि कार्यक्रम में बांटे गए कंबल और मिठाई को वापस लौटा देंगे। ग्रामीणों का कहना है कि जब कार्यक्रम में मुस्लिम महिलाओं को अपमानित कर बाहर जाने के लिए कहा गया, तो यह सिर्फ उनके साथ अन्याय नहीं था, बल्कि पूरे गांव की एकता पर हमला था। महिलाओं में से कुछ जैसे रजिया और जुबैदा ने बताया कि वे कतार में लगी थीं और कंबल मिल भी गया था, लेकिन नाम पूछने के बाद आयोजकों ने उसे छीन लिया। ग्रामीणों ने एक वीडियो बयान में कहा कि वे महात्मा गांधी के देश में रहते हैं और उसकी मूल्यों को बनाए रखना चाहते हैं, जहां भाईचारा और समानता सबसे ऊपर है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे कंबल जो समाज में वैमनस्य फैलाते हैं, उन्हें नहीं चाहिए, चाहे जरूरत कितनी भी हो। गांववासियों ने ऐलान किया कि अगर जरूरी हुआ तो वे भीख मांग लेंगे, लेकिन नफरत बांटने वाली कोई भी चीज स्वीकार नहीं करेंगे। इस विरोध में हिंदू, मुस्लिम और अन्य समुदायों के लोग शामिल हुए, जो दर्शाता है कि घटना ने स्थानीय स्तर पर सामाजिक सौहार्द को झकझोर दिया है। आयोजकों पर आरोप है कि उन्होंने जानबूझकर धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव किया, जिससे गांव में तनाव फैल गया।

विपक्षी दलों ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया दी है और इसे मानवता पर धब्बा बताते हुए जांच की मांग की है। कांग्रेस के विधानसभा में विपक्ष के नेता टीकाराम जूली ने इसे शर्मनाक करार दिया और कहा कि यह घटना देश की सामाजिक संरचना को नुकसान पहुंचाने वाली है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व सांसद ने गरीबी राहत के नाम पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की और धार्मिक आधार पर भेदभाव किया। टोंक-सवाई माधोपुर से कांग्रेस सांसद हरीश चंद्र मीणा ने भी वीडियो साझा करते हुए निंदा की और कहा कि ऐसी सोच देश को तोड़ने वाली है। विपक्ष का कहना है कि यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री मोदी की अजमेर यात्रा के निमंत्रण के साथ जुड़ा था, इसलिए इसमें राजनीतिक एजेंडा साफ दिखता है। उन्होंने मांग की कि प्रशासन इसकी जांच करे और दोषियों पर कार्रवाई करे, क्योंकि गरीबों की मदद में भेदभाव अस्वीकार्य है। इस मुद्दे पर राजनीतिक विरोध तेज हो गया है, और कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रभावित महिलाओं को अलग से कंबल वितरित करके समर्थन दिखाया। विपक्ष ने इसे भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति का उदाहरण बताते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है।

जौनपुरिया की सफाई में उन्होंने जोर दिया कि कार्यक्रम पूरी तरह से व्यक्तिगत था और इसमें कोई सरकारी सहायता या फंड शामिल नहीं था, इसलिए वितरण का फैसला उनका अधिकार था। उन्होंने कहा कि वे गरीबों की मदद कर रहे थे, लेकिन उन लोगों को नहीं जो उनके विचारों के खिलाफ हैं। पूर्व सांसद ने दावा किया कि गांव में कोई तनाव नहीं है और यह सिर्फ राजनीतिक विरोधी द्वारा फैलाया जा रहा है। लेकिन ग्रामीणों के बयानों से साफ है कि घटना ने स्थानीय स्तर पर गुस्सा पैदा किया है। कुछ ग्रामीणों ने कहा कि वे लंबे समय से भाईचारे में रहते हैं और ऐसी घटनाएं उनकी एकता को प्रभावित नहीं करने देंगी। जौनपुरिया ने यह भी कहा कि अगर कोई बुरा लगता है तो लगे, लेकिन उनकी बात सीधी है। इस सफाई के बावजूद, सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना हो रही है और लोग इसे धार्मिक विभेद का प्रतीक मान रहे हैं। पूर्व सांसद का यह बयान उनके राजनीतिक करियर पर भी सवाल उठा रहा है, क्योंकि वे टोंक-सवाई माधोपुर से दो बार सांसद रह चुके हैं।

इस घटना ने राजस्थान में साम्प्रदायिक सौहार्द के मुद्दे को फिर से सामने ला दिया है, जहां त्योहारों और राहत कार्यक्रमों में अक्सर राजनीतिक रंग घुल जाता है। टोंक जिला, जो अपनी धार्मिक विविधता के लिए जाना जाता है, में ऐसी घटनाएं दुर्लभ हैं, लेकिन जब होती हैं तो बड़ा प्रभाव डालती हैं। ग्रामीणों का एकजुट विरोध दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर लोग विभेद को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने कहा कि वे वोट बढ़ाने के लिए संघर्ष पैदा करने की कोशिश को बर्दाश्त नहीं करेंगे। इस मामले में प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगर जांच नहीं हुई तो तनाव बढ़ सकता है। कुछ स्थानीय लोगों ने कहा कि वे टोंक-सवाई माधोपुर से सीट लड़ने की सोच रहे पूर्व सांसद को सबक सिखाएंगे। घटना से साफ है कि गरीबों की मदद में राजनीति या धार्मिक भेदभाव घोलना समाज को तोड़ सकता है।

कार्यक्रम के दौरान मुस्लिम महिलाओं को अपमानित महसूस हुआ, और उन्होंने बताया कि वे पहले बुलाई गई थीं, लेकिन नाम पता चलने पर बाहर कर दिया गया। यह सिर्फ कंबल का मामला नहीं था, बल्कि सम्मान का सवाल था। ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से विरोध दर्ज कराया और कंबल लौटाकर अपना स्टैंड लिया। इस विरोध में महिलाओं की भूमिका प्रमुख थी, जो दर्शाता है कि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रही हैं। घटना के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रभावित परिवारों को सहायता प्रदान की, जो राजनीतिक स्तर पर मुद्दे को और गर्म कर रहा है।

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