CJP Protest Lathi Charge: सुप्रीम कोर्ट में पुलिस का हलफनामा, कहा- 'प्रदर्शन में असामाजिक तत्व थे शामिल'
CJP Protest Lathi Charge: सुप्रीम कोर्ट में पुलिस ने हलफनामा दायर कर कहा कि प्रदर्शन में असामाजिक तत्व शामिल थे, जिसके चलते कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा।

- Police Affidavit in Supreme Court: सीजेपी प्रदर्शन पर लाठीचार्ज मामले में पुलिस की सफाई, भीड़ में उपद्रवी तत्वों की मौजूदगी का दावा
- सुप्रीम कोर्ट में पुलिस का बड़ा दावा: CJP प्रदर्शन के दौरान घुसे थे असामाजिक तत्व, लाठीचार्ज पर दाखिल किया हलफनामा
- CJP Protest Case: लाठीचार्ज को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पुलिस का हलफनामा, उपद्रवी तत्वों की संलिप्तता का दिया हवाला
नागरिक अधिकार संगठन (CJP) से जुड़े प्रदर्शन के दौरान हुए लाठीचार्ज और पुलिस कार्रवाई के मामले में पुलिस प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में अपना आधिकारिक हलफनामा दाखिल कर दिया है। शीर्ष अदालत में प्रस्तुत जवाब में पुलिस ने अपने कदम का बचाव करते हुए स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आड़ में कुछ असामाजिक और उपद्रवी तत्व भीड़ में शामिल हो गए थे। पुलिस के अनुसार, इन तत्वों द्वारा सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डालने और बैरिकेड्स तोड़ने के प्रयास के बाद ही न्यूनतम बल प्रयोग किया गया। अब सुप्रीम कोर्ट इस हलफनामे के आधार पर याचिकाकर्ताओं की दलीलों और पुलिस के साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए आगे की कानूनी दिशा तय करेगा।
सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) और अन्य नागरिक संगठनों द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा किए गए लाठीचार्ज के मामले में पुलिस विभाग ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपनी स्थिति स्पष्ट की है। शीर्ष अदालत द्वारा मांगी गई रिपोर्ट के जवाब में दायर किए गए विस्तृत हलफनामे में पुलिस ने कहा है कि बल प्रयोग किसी पूर्व नियोजित मंशा का हिस्सा नहीं था, बल्कि कानून-व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाने के लिए उठाया गया एक तात्कालिक सुरक्षात्मक कदम था। पुलिस ने अदालत को बताया कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ में बाहरी और असामाजिक तत्वों की मौजूदगी के कारण मौके पर हालात अचानक तनावपूर्ण और अनियंत्रित हो गए थे।
याचिकाकर्ताओं ने शीर्ष अदालत में गुहार लगाते हुए आरोप लगाया था कि लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रख रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने अकारण और अत्यधिक बल प्रयोग किया, जिससे कई लोग चोटिल हुए। इस याचिका पर संज्ञान लेते हुए अदालत ने संबंधित पुलिस प्राधिकरण को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था।
अदालत में दाखिल हलफनामे में पुलिस ने सिलसिलेवार ब्योरा देते हुए बताया कि प्रदर्शन के लिए निर्धारित अनुमति की सीमाओं का उल्लंघन किया गया था। सुरक्षा बलों ने शुरुआत में लाउडस्पीकर के जरिए शांति बनाए रखने और प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर न बढ़ने की लगातार अपील की थी। हलफनामे में दावा किया गया है कि प्रदर्शन के दौरान कुछ शरारती और अज्ञात उपद्रवियों ने सुरक्षा घेरा तोड़कर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तथा पुलिसकर्मियों को उकसाने की कोशिश की। भीड़ की आड़ में हुई इस अप्रत्याशित धक्का-मुक्की और पथराव जैसी परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के तहत लाठीचार्ज और हल्का बल प्रयोग करने का निर्णय लिया गया ताकि बड़ी दुर्घटना को टाला जा सके।
पुलिस प्रशासन का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार सभी को है, लेकिन इसकी आड़ में सुरक्षा मानकों का उल्लंघन और हिंसा को बढ़ावा देना कानूनन गलत है। हलफनामे में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि पुलिस की प्राथमिकता आम जनता और सार्वजनिक संपत्तियों की हिफाजत करना थी।
दूसरी तरफ, याचिकाकर्ताओं और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि पुलिस प्रशासन अपनी अत्यधिक कठोर कार्रवाई को छिपाने के लिए 'असामाजिक तत्वों' की मौजूदगी की सामान्य दलील दे रहा है। प्रदर्शनकारी संगठनों का दावा है कि मार्च पूरी तरह शांतिपूर्ण था और पुलिस द्वारा बिना पर्याप्त पूर्व चेतावनी के लाठीचार्ज किया गया। उनका कहना है कि वे अदालत के सामने वीडियो साक्ष्य और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान रखकर पुलिस के दावों को चुनौती देंगे।
शीर्ष अदालत में दाखिल यह हलफनामा इस बात पर एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस को जन्म देता है कि सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की जवाबदेही और प्रदर्शनकारियों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे साधा जाए। कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले में अदालत का फैसला भविष्य में सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शनों, भीड़ नियंत्रण के नियमों और पुलिस द्वारा बल प्रयोग की सीमाओं को परिभाषित करने में नजीर बन सकता है। इसके अलावा, यह मामला सुरक्षा एजेंसियों को संवेदनशील मौकों पर वीडियोग्राफी और डिजिटल साक्ष्य जुटाने की अनिवार्यता के प्रति भी सजग करेगा।
सुप्रीम कोर्ट की संबंधित पीठ अब पुलिस द्वारा प्रस्तुत हलफनामे और याचिकाकर्ता पक्ष के प्रत्युत्तर का विस्तृत अध्ययन करेगी। अदालत आगामी सुनवाई के दौरान घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन रिकॉर्डिंग और मेडिकल रिपोर्टों की समीक्षा कर सकती है। यदि अदालत पुलिस के जवाब से संतुष्ट नहीं होती है, तो वह स्वतंत्र जांच या दिशा-निर्देशों के उल्लंघन पर उचित आदेश पारित कर सकती है। मामले की अगली तारीख पर दोनों पक्षों की ओर से जोरदार जिरह होने की संभावना है।
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