राजधानी के 'हॉटस्पॉट' में हाहाकार: मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर के छात्रों के लिए पढ़ाई से बड़ी हुई गैस की तलाश।

दिल्ली के मुखर्जी नगर, ओल्ड राजेंद्र नगर और लक्ष्मी नगर जैसे इलाके, जिन्हें देश के भविष्य यानी सिविल सेवा के 'एस्पिरेंट्स' का गढ़ माना जाता

Apr 7, 2026 - 11:51
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राजधानी के 'हॉटस्पॉट' में हाहाकार: मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर के छात्रों के लिए पढ़ाई से बड़ी हुई गैस की तलाश।
राजधानी के 'हॉटस्पॉट' में हाहाकार: मुखर्जी नगर और राजेंद्र नगर के छात्रों के लिए पढ़ाई से बड़ी हुई गैस की तलाश।
  • सपनों के शहर में 'सर्वाइवल' की जंग: दिल्ली में गहराया एलपीजी संकट, एस्पिरेंट्स के मेस और हॉस्टल में ताले लगने की नौबत
  • कलम छोड़ कतारों में खड़े होने को मजबूर युवा: पश्चिम एशिया के तनाव ने बिगाड़ा दिल्ली के छात्रों का बजट और भविष्य का गणित

दिल्ली के मुखर्जी नगर, ओल्ड राजेंद्र नगर और लक्ष्मी नगर जैसे इलाके, जिन्हें देश के भविष्य यानी सिविल सेवा के 'एस्पिरेंट्स' का गढ़ माना जाता है, इस समय एक अभूतपूर्व संकट की चपेट में हैं। यह संकट किसी कठिन परीक्षा पत्र का नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरत यानी रसोई गैस (एलपीजी) की भारी किल्लत का है। अप्रैल 2026 की शुरुआत के साथ ही इन इलाकों में रहने वाले लाखों छात्रों के लिए सुबह की शुरुआत किताबों के पन्नों से नहीं, बल्कि खाली गैस सिलिंडर और उसकी बुकिंग के स्टेटस चेक करने के साथ हो रही है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बाधित होने के कारण भारत में एलपीजी की आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह चरमरा गई है, जिसका सीधा असर दिल्ली के इन छात्र-केंद्रित इलाकों पर देखने को मिल रहा है।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कई छोटे और मध्यम स्तर के मेस संचालकों ने अपने शटर गिरा दिए हैं या खाने की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि कर दी है। जिन छात्रों के पास खुद का छोटा गैस सेटअप है, वे रिफिल के लिए दर-दर भटक रहे हैं। दिल्ली के इन कोचिंग हब में एक बड़ी आबादी उन छात्रों की है जो पीजी (पेइंग गेस्ट) या छोटे कमरों में रहकर खुद खाना बनाते हैं। एलपीजी की कमी ने उनके न केवल पोषण को प्रभावित किया है, बल्कि उनकी पढ़ाई के कीमती घंटों को भी लंबी कतारों और कालाबाजारी की भेंट चढ़ा दिया है। सूत्रों के अनुसार, घरेलू सिलिंडर की किल्लत का फायदा उठाकर कालाबाजारी करने वाले सक्रिय हो गए हैं और मजबूर छात्रों से एक सिलिंडर के लिए दो से तीन गुना अधिक कीमत वसूली जा रही है।

कई सरकारी और निजी शिक्षण संस्थानों के हॉस्टलों में भी स्थिति विस्फोटक बनी हुई है। हाल ही में दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कृषि अनुसंधान संस्थान ने गैस की कमी के कारण अपने मेस संचालन में असमर्थता जताते हुए छात्रों को घर लौटने या ऑनलाइन कक्षाओं का विकल्प चुनने का नोटिस तक जारी कर दिया है। यह इस बात का प्रमाण है कि ऊर्जा संकट केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह देश के शैक्षणिक ढांचे को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है। मुखर्जी नगर के पुस्तकालयों में जो छात्र देर रात तक सामान्य अध्ययन और वैकल्पिक विषयों पर चर्चा करते थे, अब वे इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि अगले दिन के भोजन के लिए गैस का इंतजाम कैसे होगा।

ब्लैक मार्केट और 'जुगाड़' की संस्कृति

दिल्ली के छात्र इलाकों में एलपीजी संकट ने एक समांतर अर्थव्यवस्था को जन्म दिया है। जहां आधिकारिक रूप से बुकिंग के बाद डिलीवरी के लिए 25 से 35 दिनों का लंबा इंतजार करना पड़ रहा है, वहीं अवैध रूप से छोटे सिलिंडरों में गैस रिफिलिंग का कारोबार फल-फूल रहा है। 5 किलोग्राम वाले छोटे 'छोटू' सिलिंडर जो पहले सुलभ थे, अब वे भी प्रीमियम कीमतों पर मिल रहे हैं। प्रशासन ने हालांकि गोदामों से सीधी बिक्री पर रोक लगा दी है और छापेमारी तेज कर दी है, लेकिन मांग और आपूर्ति के बीच का विशाल अंतर छात्रों को 'जुगाड़' और जोखिम भरे रास्तों को अपनाने पर मजबूर कर रहा है।

इस संकट का असर केवल छात्रों के खान-पान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने उनके मानसिक स्वास्थ्य और परीक्षा की तैयारी के स्तर को भी नीचे गिरा दिया है। यूपीएससी और अन्य राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाओं के करीब होने के समय, जब छात्रों को अपने रिविजन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, तब वे गैस एजेंसियों के चक्कर काट रहे हैं। कई छात्रों ने बताया है कि वे अब दिन में केवल एक बार खाना बनाकर काम चला रहे हैं या बिस्कुट और ब्रेड जैसे ड्राई फूड पर निर्भर हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है, जो अंततः उनकी प्रदर्शन क्षमता को कम कर रहा है। एक पूरा 'इकोसिस्टम' जो छात्रों के इर्द-गिर्द घूमता था चाहे वे टिफिन सर्विस हों या ढाबे सब इस गैस त्रासदी की चपेट में हैं।

प्रशासनिक स्तर पर दिल्ली सरकार और पेट्रोलियम मंत्रालय ने आपूर्ति को सामान्य करने के लिए कई कदम उठाए हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत घरेलू एलपीजी की आपूर्ति को प्राथमिकता दी जा रही है और 5 किलो वाले फ्री-ट्रेड एलपीजी (FTL) सिलिंडरों की बिक्री बढ़ाई गई है ताकि छात्रों और प्रवासियों को तुरंत राहत मिल सके। आंकड़ों के मुताबिक, मार्च के अंतिम सप्ताह से अब तक लाखों छोटे सिलिंडर बेचे जा चुके हैं। दिल्ली पुलिस भी गैस एजेंसियों और गोदामों की सुरक्षा की निगरानी कर रही है ताकि लूट या अफरातफरी की स्थिति न बने। हालांकि, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग मार्गों में जारी अवरोधों के कारण स्थानीय स्तर पर इन प्रयासों का असर धीमी गति से दिख रहा है।

दिल्ली के 'एस्पिरेंट्स' के लिए यह समय किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। जो युवा देश की शासन व्यवस्था का हिस्सा बनने का सपना लेकर यहां आए थे, वे आज खुद एक बुनियादी प्रशासनिक विफलता का शिकार महसूस कर रहे हैं। कमरे का किराया, कोचिंग की फीस और अब गैस की यह किल्लत इन सबने मिलकर दिल्ली को पढ़ाई के लिए एक बेहद खर्चीला और तनावपूर्ण शहर बना दिया है। कई छात्र अब दिल्ली छोड़कर अपने गृह राज्यों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां कम से कम भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित है। यह 'रिवर्स माइग्रेशन' दिल्ली के उन कोचिंग संस्थानों के लिए भी एक चिंता का विषय है जो अपनी साख खोने के डर से अब ऑनलाइन विकल्पों को बढ़ावा देने पर मजबूर हैं।

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