TMC के खाते आखिर कहां से आये 675 करोड़ रुपये, आरोपों के घेरे में राजनीतिक कोष, पुलिसिया कार्रवाई से बढ़ी प्रशासनिक हलचल
इस पुलिसिया कार्रवाई से ठीक एक दिन पहले संगठनात्मक ढांचे के भीतर एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया था, जिसने इस वित्तीय विवाद को कानूनी रूप से अधिक पेचीदा बना दिया। दल के पूर्व राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष अरूप बिस्वास ने संबंधित निजी बैंक की शाखा को एक आधिकारिक पत्र भेजा था। इस पत्र में उन्होंने बैंक प्रबंधन से पु

पूर्वी राज्य की राजनीति में इन दिनों संगठनात्मक वर्चस्व और वित्तीय नियंत्रण को लेकर एक अभूतपूर्व कूटनीतिक युद्ध छिड़ गया है। क्षेत्रीय राजनीति के इतिहास में संभवतः यह पहला मौका है जब किसी सत्तारूढ़ दल के भीतर के अंतर्विरोध खुलकर पुलिस थानों और बैंकों के चौखट तक पहुँच गए हैं। दल से अलग रुख अपनाने वाले बागी विधायकों और जनप्रतिनिधियों के एक धड़े ने संगठन के मुख्य बैंक खाते में जमा छह सौ पचहत्तर करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि के स्रोतों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस संदर्भ में बागी गुट के प्रमुख रणनीतिकारों ने बिधाननगर पुलिस स्टेशन में एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें इस विपुल धनराशि के पीछे के वास्तविक वित्तीय लेन-देन की गहन जांच करने की मांग की गई है। इस कानूनी कदम ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक नया भूचाल ला दिया है, जिससे सत्ताधारी खेमे के भीतर खलबली मची हुई है।
इस पूरे विवाद को हवा तब मिली जब बागी गुट के प्रमुख चेहरे ऋतब्रत बनर्जी ने खुले तौर पर दल के वित्तीय प्रबंधन को कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह प्रश्न उठाया कि संगठन के आधिकारिक खातों में मौजूद इतनी बड़ी धनराशि का वास्तविक जरिया क्या है। उन्होंने संदेह जताया कि यह विशाल कोष कहीं न कहीं अवैध रूप से एकत्र किए गए धन, अनुचित प्रशासनिक प्रभाव या विभिन्न परियोजनाओं से मिलने वाले तथाकथित कमीशन का परिणाम हो सकता है। ऋतब्रत बनर्जी का तर्क है कि जब तक इस राशि के वैध स्रोतों की पूरी तरह से पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक इसे जनता और लोकतंत्र के साथ एक बड़ा छलावा माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि एक स्वच्छ राजनीतिक व्यवस्था के लिए यह बेहद जरूरी है कि हर दल अपनी पाई-पाई का हिसाब पारदर्शी तरीके से देश के सामने रखे। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त का सामना करने के बाद से ही दल के भीतर नेतृत्व परिवर्तन और सांगठनिक फेरबदल को लेकर खींचतान काफी तेज हो गई है।
इस पुलिसिया कार्रवाई से ठीक एक दिन पहले संगठनात्मक ढांचे के भीतर एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया था, जिसने इस वित्तीय विवाद को कानूनी रूप से अधिक पेचीदा बना दिया। दल के पूर्व राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष अरूप बिस्वास ने संबंधित निजी बैंक की शाखा को एक आधिकारिक पत्र भेजा था। इस पत्र में उन्होंने बैंक प्रबंधन से पुरजोर आग्रह किया था कि संगठन के इस विशिष्ट खाते से होने वाले तमाम तरह के लेन-देन, निकासी और नए भुगतानों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी जाए। उनका तर्क था कि चूंकि वर्तमान समय में संगठन के वैध प्रतिनिधित्व और पदाधिकारियों की कमान को लेकर विवाद चल रहा है, इसलिए इस खाते में जमा सार्वजनिक और सांगठनिक धन के दुरुपयोग की पूरी आशंका बनी हुई है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि जब तक नेतृत्व का संकट पूरी तरह सुलझ नहीं जाता, तब तक वित्तीय यथास्थिति बनाए रखी जाए।
इस वित्तीय जंग के पीछे का मुख्य कारण संगठन के भीतर हाल ही में किया गया एक बड़ा फेरबदल भी है। चुनावी पराजय के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने सांगठनिक समीक्षा करते हुए अरूप बिस्वास को कोषाध्यक्ष के पद से हटाकर एक नए चेहरे सुभाशीष चक्रवर्ती को यह जिम्मेदारी सौंप दी थी। हालांकि, अरूप बिस्वास ने कूटनीतिक रूप से इस बदलाव को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया और बैंक को लिखे पत्र में स्वयं को राष्ट्रीय स्तर का वैध पदाधिकारी बताया। इसके विपरीत, नव-नियुक्त पदाधिकारी का दावा है कि सांगठनिक प्रस्तावों के तहत अब वित्तीय फैसलों का अधिकार उनके पास है। इस दोहरे दावे ने बैंकिंग अधिकारियों के सामने भी एक बड़ी वैधानिक दुविधा खड़ी कर दी है कि आखिर किस पदाधिकारी के हस्ताक्षरों को वैध माना जाए और किसे अवैध।
कानूनी मोर्चे पर बागी विधायकों के एक दल ने बिधाननगर के साइबर और आर्थिक अपराध शाखा में जो प्राथमिकी दर्ज कराई है, उसमें धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और संगठित तौर पर किए गए संदिग्ध वित्तीय लेन-देन की धाराएं शामिल की गई हैं। शिकायत में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि डिजिटल बैंकिंग और ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग करके इस बड़ी राशि को अलग-अलग स्रोतों से मुख्य खाते में स्थानांतरित किया गया है। बागी गुट का आरोप है कि इस कोष का उपयोग चुनावों के दौरान चार्टर्ड विमानों की बुकिंग और अन्य विलासिता पूर्ण राजनीतिक गतिविधियों में किया जा रहा था। पुलिस ने इस शिकायत के आधार पर प्राथमिक जांच शुरू कर दी है और बैंक से खाते के पिछले कुछ वर्षों के लेन-देन का पूरा ब्योरा तलब करने की प्रक्रिया शुरू की है। दूसरी तरफ, मुख्य नेतृत्व के प्रति निष्ठा रखने वाले धड़े और आधिकारिक प्रवक्ताओं ने इस पूरे कदम को दल को बदनाम करने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि संगठन का वित्तीय लेखा-जोखा पूरी तरह से पारदर्शी है और इसकी नियमित रूप से ऑडिटिंग की जाती है। केंद्रीय चुनाव आयोग के समक्ष जमा किए गए दस्तावेजों में इस छह सौ पचहत्तर करोड़ रुपये की राशि का पूरा ब्योरा पहले से ही दर्ज है। मुख्य धड़े का तर्क है कि यदि बागी विधायकों को वित्तीय प्रबंधन को लेकर कोई शिकायत थी, तो उन्हें आंतरिक मंचों पर अपनी बात रखनी चाहिए थी, न कि पुलिस स्टेशन जाकर विरोधी ताकतों को दल पर हमला करने का अवसर देना चाहिए था।
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