Kamala Sohonie: विज्ञान में पीएचडी करने वाली देश की पहली महिला, जिन्होंने महज 14 महीने में कैंब्रिज से पूरी की रिसर्च
डॉ. कमला सोहोनी विज्ञान में पीएचडी करने वाली पहली भारतीय महिला थीं। उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से मात्र 14 महीने में अपनी शोध पूरी कर वैश्विक कीर्तिमान बनाया था।

भारतीय विज्ञान और उच्च शिक्षा के इतिहास में जब भी लैंगिक समानता और अकादमिक उत्कृष्टता की बात होती है, तो डॉ. कमला सोहोनी का नाम सबसे अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है। वे किसी वैज्ञानिक विषय (जैव रसायन यानी बायोकेमिस्ट्री) में डॉक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक थीं। इसके साथ ही उनके नाम एक ऐसा असाधारण अकादमिक रिकॉर्ड भी दर्ज है, जिसकी मिसाल आज भी मिलना कठिन है—उन्होंने दुनिया के प्रतिष्ठित कैंब्रिज विश्वविद्यालय से अपना शोध कार्य और पीएचडी थीसिस महज 14 महीने की रिकॉर्ड अवधि में पूरा कर लिया था।
1930 और 1940 के उस दौर में जब महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा की राहें बेहद सीमित और सामाजिक रूढ़ियों से भरी हुई थीं, कमला सोहोनी ने न केवल देश की शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाओं के दरवाजे महिला शोधकर्ताओं के लिए खुलवाए, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय मेधा का लोहा मनवाया। उनका जीवन केवल एक वैज्ञानिक की अकादमिक यात्रा नहीं है, बल्कि पितृसत्तात्मक मान्यताओं के खिलाफ एक अनुकरणीय और शांतिपूर्ण सत्याग्रह की दास्तान भी है।
बॉम्बे यूनिवर्सिटी में अव्वल रहने के बाद आईआईएससी का कड़ा संघर्ष
कमला सोहोनी (विवाह पूर्व कमला भागवत) का जन्म वर्ष 1911 में मध्य प्रदेश के इंदौर में एक शिक्षित और बौद्धिक परिवार में हुआ था। उनके पिता और चाचा दोनों ही प्रतिष्ठित रसायनशास्त्री थे और उन्होंने तत्कालीन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेज (वर्तमान में भारतीय विज्ञान संस्थान - IISc, बेंगलुरु) से अध्ययन किया था। पारिवारिक माहौल से प्रेरित होकर कमला ने बॉम्बे विश्वविद्यालय से भौतिकी और रसायन विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और पूरे विश्वविद्यालय में शीर्ष स्थान हासिल किया।
प्रथम श्रेणी में शीर्ष स्थान प्राप्त करने के बाद कमला ने उच्च शोध के लिए वर्ष 1933 में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु में परास्नातक अनुसंधान के लिए आवेदन किया। उस समय संस्थान के निदेशक नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक प्रोफेसर सी.वी. रमन थे। उस दौर में आईआईएससी में महिला विद्यार्थियों को नियमित शोध छात्र के रूप में प्रवेश नहीं दिया जाता था। प्रोफेसर रमन का मानना था कि महिलाएं वैज्ञानिक शोध की कठोर प्रयोगशाला परिस्थितियों और लंबे समय तक चलने वाले अनुसंधानों के प्रति पूरी तरह समर्पित नहीं हो पाएंगी। अत: उन्होंने कमला के प्रथम श्रेणी अकादमिक रिकॉर्ड के बावजूद उनके आवेदन को सीधे तौर पर खारिज कर दिया।
गांधीवादी तरीके से सत्याग्रह और मिली सशर्त अनुमति
अपने आवेदन के इस अनुचित और गैर-बराबरी वाले अस्वीकरण से कमला सोहोनी विचलित नहीं हुईं। वे प्रोफेसर रमन के कार्यालय के बाहर धरने पर बैठ गईं और उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अपने प्रवेश की मांग रखी। कमला का तर्क था कि जब उनके अंक और योग्यता पुरुषों से बेहतर हैं, तो केवल महिला होने के आधार पर उन्हें अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।
कमला के दृढ़ संकल्प और नैतिक साहस के सामने संस्थान को अपना निर्णय बदलना पड़ा। प्रोफेसर रमन ने उन्हें संस्थान में प्रवेश तो दिया, लेकिन उसके साथ कुछ अत्यंत कठोर शर्तें जोड़ दीं:
-
उन्हें एक वर्ष के लिए पूर्णकालिक नियमित शोधार्थी नहीं, बल्कि परिवीक्षा (प्रोबेशन) पर रखा जाएगा।
-
प्रयोगशाला में उनका कार्य संतोषजनक पाए जाने पर ही उनके कार्यकाल को आगे बढ़ाया जाएगा।
-
वे देर रात तक प्रयोगशाला में काम नहीं करेंगी और साथी पुरुष शोधकर्ताओं का ध्यान नहीं भटकाएंगी।
कमला ने इन अपमानजनक शर्तों को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने अपनी मेहनत, अनुशासन और उत्कृष्ट शोध परिणामों से खुद को साबित किया। उनके असाधारण प्रदर्शन को देखकर प्रोफेसर रमन इतने प्रभावित हुए कि एक वर्ष बाद न केवल कमला का नियमित प्रवेश सुनिश्चित किया गया, बल्कि आईआईएससी के दरवाजे हमेशा के लिए अन्य महिला शोधकर्ताओं के लिए भी औपचारिक रूप से खोल दिए गए।
कैंब्रिज विश्वविद्यालय और 14 महीने में पीएचडी का ऐतिहासिक कीर्तिमान
आईआईएससी से उत्कृष्ट शोध के साथ परास्नातक डिग्री पूरी करने के बाद कमला सोहोनी को ब्रिटेन के कैंब्रिज विश्वविद्यालय में शोध के लिए स्प्रिंगर रिसर्च स्कॉलरशिप मिली। कैंब्रिज में उन्होंने प्रख्यात जैव रसायनविद् डॉ. डेरेक रिक्टर और बाद में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर फ्रेडरिक गॉलैंड हॉपकिन्स के मार्गदर्शन में शोध कार्य शुरू किया।
कैंब्रिज की सर विलियम डन प्रयोगशाला में काम करते हुए कमला ने पौधों के ऊतकों (प्लांट टिशूज) पर गहरा अनुसंधान किया। इस शोध के दौरान उन्होंने यह ऐतिहासिक खोज की कि पौधों की प्रत्येक कोशिका में 'साइटोक्रोम सी' (Cytochrome C) नामक श्वसन एंजाइम मौजूद होता है। यह एंजाइम पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों में कोशिकीय ऊर्जा उत्पादन और ऑक्सीकरण प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पौधों में इस एंजाइम की उपस्थिति की पुष्टि ने वैश्विक वनस्पति और जैव रासायनिक अनुसंधान को एक नई दिशा दी।
कमला का शोध कार्य इतना गहन, केंद्रित और सटीक था कि उन्होंने अपना पूरा डॉक्टरेट शोध प्रबंध (थीसिस) महज 14 महीने में पूरा कर लिया। जब उन्होंने अपनी थीसिस परीक्षक मंडल को सौंपी, तो वे उनके काम की गुणवत्ता और गति देखकर हैरान रह गए। वर्ष 1939 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने उन्हें पीएचडी की उपाधि से सम्मानित किया, और इस तरह वे विज्ञान में डॉक्टरेट हासिल करने वाली भारत की पहली महिला बन गईं।
स्वदेश वापसी और 'नीरा' पर शोध से कुपोषण के खिलाफ लड़ाई
पीएचडी पूरी करने के बाद उनके पास विदेशों में काम करने के कई आकर्षक प्रस्ताव थे, लेकिन महात्मा गांधी के विचारों और स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना से प्रेरित होकर उन्होंने स्वदेश लौटने का निर्णय लिया। वे चाहती थीं कि उनके वैज्ञानिक ज्ञान का लाभ सीधे भारत के आम और वंचित नागरिकों को मिले।
भारत लौटकर उन्होंने लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली में जैव रसायन विभाग के प्रमुख के रूप में कार्य किया। बाद में वे कुन्नूर स्थित पोषण अनुसंधान प्रयोगशाला (न्यूट्रिशन रिसर्च लैबोरेटरी) से जुड़ीं और फिर मुंबई के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (अब इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस) में प्रोफेसर और बाद में निदेशक बनीं।
मुंबई में उनके शोध का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव ताड़ के पेड़ के रस से बनने वाले प्राकृतिक पेय 'नीरा' पर उनका अध्ययन था। डॉ. कमला सोहोनी ने गहन विश्लेषण के जरिए यह सिद्ध किया कि 'नीरा' विटामिन 'सी' और बी-कॉम्प्लेक्स से भरपूर है। इसमें लौह तत्व और आवश्यक पोषक घटक प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं। उन्होंने पाया कि यह गरीब, गर्भवती महिलाओं और कुपोषित बच्चों के लिए एक बेहद सस्ता और अत्यंत प्रभावी प्राकृतिक पूरक आहार बन सकता है।
उनके इस व्यावहारिक अनुसंधान को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रीय स्तर पर सराहा और उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। डॉ. सोहोनी ने ताड़ के रस से पौष्टिक गुड़ और खाद्य उत्पाद बनाने की तकनीक भी विकसित की, जिससे ग्रामीण कुटीर उद्योगों को भी बड़ा संबल मिला।
महिलाओं के लिए प्रेरणा
डॉ. कमला सोहोनी ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक विज्ञान और लोक स्वास्थ्य की सेवा जारी रखी। वर्ष 1998 में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक सम्मान समारोह के दौरान मंच पर ही वे अचानक अस्वस्थ हो गईं और कुछ समय बाद उनका निधन हो गया।
उनका जीवन इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान के मार्ग में आने वाली कोई भी सामाजिक या संस्थागत बाधा अटूट इच्छाशक्ति के सामने टिक नहीं सकती। आज जब भारत स्टेम (STEM - साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमेटिक्स) के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दे रहा है, डॉ. कमला सोहोनी की विरासत हर उस युवा विद्यार्थी और शोधकर्ता के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ है, जो चुनौतियों के आगे झुकने से इनकार करता है।
What's Your Reaction?

