पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में नया सियासी समीकरण, ओवैसी की पार्टी और आम जनता उन्नयन पार्टी ने मिलाया हाथ
हुमायूं कबीर, जो पहले सत्ताधारी दल के प्रमुख चेहरा रहे हैं, उन्होंने अपनी अलग राह चुनते हुए राज्य की 294 सीटों में से 182 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की है। इस गठबंधन के तहत मजलिस प्रमुख का मानना है कि उनकी उपस्थिति से राज्य में अल्पसंख्य
- बंगाल चुनाव 2026: असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और हुमायूं कबीर के बीच गठबंधन का औपचारिक ऐलान
- मुसलमानों की हिस्सेदारी और ओबीसी प्रमाणपत्रों के मुद्दे पर ममता सरकार को घेरा, 25 मार्च को कोलकाता में साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस
पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर राजनीतिक सरगर्मी काफी तेज हो गई है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए बंगाल के चुनावी रण में उतरने की घोषणा की है। ओवैसी ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी बंगाल के पूर्व कद्दावर नेता हुमायूं कबीर की नवनिर्मित पार्टी 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (AJUP) के साथ गठबंधन करेगी। हैदराबाद में पार्टी मुख्यालय से इस गठबंधन की जानकारी देते हुए ओवैसी ने कहा कि विधानसभा चुनाव करीब हैं और हमने पश्चिम बंगाल में हुमायूं कबीर के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। इस रणनीतिक साझेदारी का मुख्य उद्देश्य बंगाल की राजनीति में एक मजबूत वैकल्पिक आवाज तैयार करना है ताकि वहां के दबे-कुचले और अल्पसंख्यक समाज की समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाया जा सके।
हुमायूं कबीर, जो पहले सत्ताधारी दल के प्रमुख चेहरा रहे हैं, उन्होंने अपनी अलग राह चुनते हुए राज्य की 294 सीटों में से 182 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की है। इस गठबंधन के तहत मजलिस प्रमुख का मानना है कि उनकी उपस्थिति से राज्य में अल्पसंख्यक राजनीति का स्वरूप बदलेगा। ओवैसी ने अपने संबोधन में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की जनसांख्यिकी का उल्लेख करते हुए बताया कि वहां लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी निवास करती है। उन्होंने राज्य की वर्तमान सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि लंबे समय से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इस आबादी का वोट हासिल किया जाता रहा है, लेकिन जब वास्तविक हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व देने का समय आता है, तो सत्ताधारी दलों को इससे असहजता होने लगती है। यह गठबंधन राज्य के उन क्षेत्रों में अधिक सक्रिय रहेगा जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका में है।
गठबंधन के विस्तृत विवरण और सीटों के बंटवारे पर चर्चा करने के लिए असदुद्दीन ओवैसी ने घोषणा की है कि वह 25 मार्च को कोलकाता का दौरा करेंगे। वहां वह हुमायूं कबीर के साथ एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे, जिसमें चुनाव लड़ने वाली सीटों की सटीक संख्या और उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया साझा की जाएगी। अभी तक की जानकारी के अनुसार, हुमायूं कबीर की पार्टी ने अपने 149 उम्मीदवारों के नामों की सूची पहले ही जारी कर दी है, जिसमें भवानीपुर और नंदीग्राम जैसी हाई-प्रोफाइल सीटें भी शामिल हैं। हुमायूं कबीर स्वयं मुर्शिदाबाद जिले की दो विधानसभा सीटों, रेजीनगर और नौदा से चुनाव मैदान में उतरने जा रहे हैं। ओवैसी की पार्टी को गठबंधन के तहत करीब 8 से 10 सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है, जो मुख्य रूप से मुर्शिदाबाद, मालदा और बीरभूम जैसे जिलों में केंद्रित हो सकती हैं। हुमायूं कबीर ने भवानीपुर विधानसभा सीट से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ पूनम बेगम को चुनावी मैदान में उतारने का फैसला किया है, जो इस चुनाव को काफी दिलचस्प बना सकता है।
असदुद्दीन ओवैसी ने बंगाल सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए पिछड़ा वर्ग (OBC) प्रमाणपत्रों के निरस्त होने के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। उन्होंने दावा किया कि राज्य में लगभग 5 लाख पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया गया है, जिनमें एक बहुत बड़ी संख्या मुस्लिम समुदाय के लोगों की है। ओवैसी का तर्क है कि यह न केवल प्रशासनिक विफलता है बल्कि एक विशेष समुदाय के अधिकारों पर चोट है। वह इस मुद्दे को चुनाव में एक बड़ा हथियार बनाने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि जो पार्टियां खुद को धर्मनिरपेक्ष कहती हैं, उन्हें इस पर जवाब देना चाहिए कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में लोगों के जाति प्रमाण पत्र क्यों रद्द हुए और उनके भविष्य के साथ यह खिलवाड़ क्यों किया गया। यह मुद्दा विशेष रूप से ग्रामीण बंगाल के मतदाताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
बंगाल के राजनीतिक इतिहास में मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिले हमेशा से सत्ता की चाबी माने जाते रहे हैं। हुमायूं कबीर का इन क्षेत्रों में अपना व्यक्तिगत प्रभाव है और अब मजलिस के साथ आने से वे एक नए 'अल्पसंख्यक मोर्चे' के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं। कबीर ने हाल ही में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक मस्जिद बनाने के संकल्प की बात भी कही थी, जिसे उन्होंने एक भावनात्मक मुद्दा करार दिया है। ओवैसी के साथ उनकी जुगलबंदी ने राज्य के स्थापित राजनीतिक दलों, विशेष रूप से सत्ताधारी पार्टी के लिए चिंता पैदा कर दी है, क्योंकि यह गठबंधन सीधे तौर पर उस वोट बैंक में सेंध लगाने की क्षमता रखता है जो अब तक एकतरफा समर्थन देता आया है। ओवैसी का कहना है कि उनकी लड़ाई केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि विधानसभा के भीतर अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए है।
राज्य में चुनावी कार्यक्रम की घोषणा भी हो चुकी है, जिसके तहत 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होना है। चुनाव आयोग के अनुसार, पहले चरण में 152 सीटों पर और दूसरे चरण में 142 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। ओवैसी ने कार्यकर्ताओं को अभी से जमीन पर उतरने का निर्देश दिया है। उनका मानना है कि बंगाल में मुस्लिम समाज अब केवल वोट बैंक बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग कर रहा है। जब मजलिस इस हिस्सेदारी की बात करती है, तो धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़े दलों को तकलीफ होती है। ओवैसी ने यह भी साफ किया कि उनका गठबंधन किसी को हराने या जिताने के लिए नहीं, बल्कि खुद की पहचान और हक की लड़ाई लड़ने के लिए बना है।
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