अमोल मजूमदार: घरेलू क्रिकेट के रनों के पहाड़ से महिला विश्व कप की ऐतिहासिक जीत तक, कोचिंग में रचा इतिहास।
मुंबई के शिवाजी पार्क में क्रिकेट का जुनून हमेशा से ही सांस लेता रहा है। इसी मैदान पर 1974 में जन्मे अमोल मजूमदार ने बचपन से ही बल्ले को अपना साथी बनाया। रामकांत
मुंबई के शिवाजी पार्क में क्रिकेट का जुनून हमेशा से ही सांस लेता रहा है। इसी मैदान पर 1974 में जन्मे अमोल मजूमदार ने बचपन से ही बल्ले को अपना साथी बनाया। रामकांत आचरेकर के मार्गदर्शन में उन्होंने शारदा विद्यामंदिर स्कूल में सच्चिन तेंदुलकर और विनोद कांबली जैसे साथियों के साथ नेट प्रैक्टिस की। लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कभी जगह न मिलने के बावजूद, अमोल ने कभी हार नहीं मानी। 21 साल के लंबे घरेलू करियर में उन्होंने 11,167 फर्स्ट क्लास रन बनाए, जिसमें 30 शतक शामिल हैं। रणजी ट्रॉफी में दूसरे सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ी बने। फिर 2014 में संन्यास लेने के बाद कोचिंग की दुनिया में कदम रखा। अक्टूबर 2023 में बीसीसीआई ने उन्हें भारतीय महिला टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया। और 2 नवंबर 2025 को डीवाई पाटिल स्टेडियम, नवी मुंबई में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 52 रनों से जीतकर आईसीसी महिला वनडे विश्व कप का खिताब दिलाकर उन्होंने अपना सपना पूरा किया। यह भारत की पहली महिला वनडे विश्व कप जीत थी। अमोल ने कहा कि यह जीत एक जल विभाजक क्षण है, जो भारतीय क्रिकेट को नई दिशा देगी।
अमोल मजूमदार का जन्म 11 नवंबर 1974 को मुंबई में हुआ। बचपन से ही क्रिकेट उनके जीवन का केंद्र था। बीपीएम हाई स्कूल से पढ़ाई शुरू की, लेकिन आचरेकर सर की सलाह पर शारदा विद्यामंदिर चले गए। वहां सच्चिन और कांबली के साथ नेट्स शेयर किए। 1988 के हैरिस शील्ड मैच में सच्चिन-कांबली की 664 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी के दौरान अमोल पैड लगाए इंतजार करते रहे, लेकिन बल्लेबाजी का मौका न मिला। यह प्रतीकात्मक था उनकी जिंदगी का। 1993-94 में फर्स्ट क्लास डेब्यू पर हरियाणा के खिलाफ 260 रन बनाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड स्थापित किया। मुंबई के लिए खेलते हुए कई रणजी ट्रॉफी जीते। 2006-07 में कप्तान बने और रणजी जीत दिलाई। लेकिन अंतरराष्ट्रीय टीम में जगह न मिली। मिडिल ऑर्डर में सच्चिन, द्रविड, गांगुली और लक्ष्मण जैसे दिग्गज थे। 2002 में क्रिकेट छोड़ने का मन हुआ, लेकिन मुंबई के लिए जारी रखा। 2009 में असम, फिर 2012 में आंध्र प्रदेश के लिए खेले। 2014 में संन्यास लिया।
अमोल की कोचिंग यात्रा भी अनोखी रही। संन्यास के बाद इंडिया अंडर-19 और अंडर-23 टीमों के बैटिंग कोच बने। राजस्थान रॉयल्स के लिए आईपीएल में काम किया। 2019 में दक्षिण अफ्रीका के भारत दौरे पर बैटिंग कंसल्टेंट रहे। नीदरलैंड्स टीम को भी कोचिंग दी। मुंबई टीम के मुख्य कोच भी बने। उनकी शैली शांत और प्रेरणादायक है। खिलाड़ियों को सशक्त बनाना उनका मंत्र है। वे कहते हैं कि बड़े भाषणों की बजाय विश्वास जगाना जरूरी है। टेड लैसो फिल्म की तरह दयालुता और विश्वास पर जोर देते हैं। जटिल स्थितियों को सरल बनाते हैं। फिटनेस और फील्डिंग पर खास ध्यान देते हैं।
2023 में मुख्य कोच बनने पर सवाल उठे। अंतरराष्ट्रीय खेलने का अनुभव न होने से। लेकिन अमोल ने साबित कर दिया। टीम में हार्मनप्रीत कौर, स्मृति मंधाना, दीप्ति शर्मा, शेफाली वर्मा जैसी सितारें थे। अमोल ने उन्हें बदला नहीं, बल्कि सशक्त किया। ड्रेसिंग रूम में शांति और ऊर्जा का मिश्रण बनाया। 37 मैचों में 22 जीत दिलाई। 2025 विश्व कप में शुरुआत कठिन रही। लीग स्टेज में हार हुईं। लेकिन अमोल ने हार को सबक बनाया। कहा कि हम अच्छी शुरुआत करते हैं, लेकिन फिनिशिंग सुधारनी है। सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 339 रनों का पीछा करते हुए जेमिमाह रोड्रिग्स की 127 नॉट आउट और हार्मनप्रीत की 89 रनों की पारी से जीत। व्हाइटबोर्ड पर लिखा, बस एक रन ज्यादा चाहिए फाइनल के लिए। फाइनल में 284 रन बनाकर दक्षिण अफ्रीका को 232 पर रोका। दीप्ति की 4 विकेट हॉल से प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट बनीं।
अमोल की कोचिंग ने टीम को नया आत्मविश्वास दिया। वे युवाओं पर भरोसा करते हैं। क्रांति गौड़ और श्री चरणी जैसे खिलाड़ियों को मौका दिया। फिटनेस पर फोकस से फील्डिंग मजबूत हुई। ड्रेसिंग रूम में ऊर्जा बढ़ी। अमोल कहते हैं कि हम हार को हार नहीं मानते, बल्कि उन मैचों को देखते हैं जहां लाइन क्रॉस न कर सके। विश्व कप में टीम जीवित रही और चैंपियन बनी। अमोल ने भावुक होकर कहा कि खिलाड़ियों ने कड़ी मेहनत की। यह जीत पीढ़ियों को प्रभावित करेगी। हार्मनप्रीत ने जीत के बाद उनके पैर छुए और गले लगीं। यह पल वायरल हो गया।
यह जीत अमोल के लिए व्यक्तिगत मोक्ष है। जो कभी भारत के लिए न खेल सके, अब कोच के रूप में विश्व कप जिता। सच्चिन के क्लासमेट से विश्व कप विजेता कोच तक। अमोल कहते हैं कि यह सपना था। खिलाड़ियों का श्रेय है। बीसीसीआई ने 5 करोड़ का पुरस्कार दिया। प्रधानमंत्री ने बधाई दी। अमोल ने कहा कि यह महिला क्रिकेट का टर्निंग पॉइंट है। युवा लड़कियां प्रेरित होंगी।
अमोल की कहानी प्रेरणा है। घरेलू क्रिकेट में रनों का पहाड़ खड़ा किया, लेकिन इंतजार किया। अब कोचिंग में सफलता। वे कहते हैं कि क्रिकेट में मान्यता हमेशा नहीं मिलती, लेकिन प्रभाव पड़ता है। शांत स्वभाव से टीम को एकजुट किया। फिनिशिंग पर जोर दिया। विश्व कप में साबित हुआ। अमोल ने कहा कि हम अच्छे से शुरू करते हैं, लेकिन अच्छे से खत्म करना सीखा। यह संदेश टीम का आधार बना।
महिला क्रिकेट में यह जीत मील का पत्थर है। 1973 से चले विश्व कप में भारत का पहला खिताब। पहले 1982 में फाइनल हारे थे। अब चौथा विजेता देश। ऑस्ट्रेलिया के 7, इंग्लैंड के 4, न्यूजीलैंड के 1 के बाद भारत। अमोल ने झूलन गोस्वामी जैसी पूर्व खिलाड़ियों को श्रेय दिया। जीत के बाद भावुक मुलाकात हुई। अमोल कहते हैं कि सीनियरों ने आधार दिया। अब नई पीढ़ी आगे बढ़ेगी।
अमोल की जिंदगी क्रिकेट से भरी है। परिवार के साथ समय कम बिताया। जन्मदिन भी न मनाया। लेकिन क्रिकेट को प्राथमिकता दी। अब कोच के रूप में पहचान मिली। सोशल मीडिया पर तारीफें हो रही हैं। पूर्व खिलाड़ी कहते हैं कि यह पुरुष विश्व कप से बड़ी उपलब्धि। अमोल का सफर दिखाता है कि धैर्य और मेहनत रंग लाती है।
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