राजेश खन्ना का गिरता साम्राज्य और अमिताभ का उत्थान: प्रेम चोपड़ा ने बयां किया उस दौर का अनसुना और दर्दनाक सच।
हिंदी सिनेमा के इतिहास में सत्तर का दशक एक ऐसी क्रांति का गवाह बना जिसने रातों-रात सफलता के मायने बदल दिए। प्रेम चोपड़ा, जिन्होंने

- अत्यधिक शराब और अकेलापन: जब सुपरस्टारडम छिनने के गम में खुद को तबाह करने लगे थे काका, करीबी दोस्त ने साझा की यादें।
- सिनेमाई इतिहास का सबसे बड़ा बदलाव: राजेश खन्ना की खामोश पीड़ा और बच्चन युग की शुरुआत की भावुक कहानी।
हिंदी सिनेमा के इतिहास में सत्तर का दशक एक ऐसी क्रांति का गवाह बना जिसने रातों-रात सफलता के मायने बदल दिए। प्रेम चोपड़ा, जिन्होंने राजेश खन्ना के साथ कई सफल फिल्मों में काम किया और उनके बेहद करीबी रहे, उन्होंने उस दौर की कशमकश को बहुत गहराई से महसूस किया था। उनके अनुसार, राजेश खन्ना एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने वह लोकप्रियता देखी थी जिसकी कल्पना भी आज के दौर में करना कठिन है। लड़कियों द्वारा उनकी कार की धूल से अपनी मांग भरना और उन्हें खून से पत्र लिखना एक सामान्य बात थी। लेकिन जब अमिताभ बच्चन की 'जंजीर' और 'दीवार' जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचाना शुरू किया, तो दर्शक वर्ग की पसंद रोमांटिक नायक से बदलकर एक विद्रोही युवा की ओर मुड़ गई। यह बदलाव राजेश खन्ना के लिए न केवल पेशेवर रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी बहुत चुनौतीपूर्ण साबित हुआ क्योंकि वह अपनी बादशाहत को जाते हुए नहीं देख पा रहे थे। राजेश खन्ना की जीवनशैली और उनके काम करने के तौर-तरीके हमेशा से चर्चा में रहे थे। वह अपनी फिल्मों के सेट पर देरी से आने के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनकी प्रतिभा इतनी जबरदस्त थी कि निर्माता-निर्देशक उनका घंटों इंतजार करने को तैयार रहते थे। हालांकि, जैसे ही अमिताभ बच्चन का प्रभाव बढ़ा, उद्योग में अनुशासन और समय की पाबंदी को अधिक महत्व दिया जाने लगा। प्रेम चोपड़ा बताते हैं कि खन्ना इस नए दौर के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थ थे। उन्हें अपनी पुरानी आदतों और अपने इर्द-गिर्द रहने वाले 'जी-हजूर' करने वाले लोगों के घेरे से बाहर निकलना मुश्किल लग रहा था। जब सफलता के ग्राफ में गिरावट आई, तो उनके साथ रहने वाले चापलूसों की भीड़ भी छंटने लगी, जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया।
सफलता की ऊंचाइयों से अचानक नीचे आने का दर्द राजेश खन्ना ने शराब के सहारे कम करने की कोशिश की। प्रेम चोपड़ा ने इस बात की पुष्टि की है कि अपने अंतिम वर्षों और ढलते करियर के दौरान खन्ना अत्यधिक शराब के सेवन में डूब गए थे। वह अक्सर पूरी रात शराब पीते रहते थे और खुद को एक एकांत कमरे में बंद कर लेते थे। यह उनकी 'खामोश पीड़ा' का दौर था, जहां वह किसी से अपनी हार साझा नहीं करना चाहते थे लेकिन उनका स्वास्थ्य और उनकी आंखें सब कुछ बयां कर देती थीं। वह अक्सर पुराने दिनों की यादों में खोए रहते थे और इस बात को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि दर्शक अब एक अलग तरह के सिनेमा की मांग कर रहे हैं। शराब ने न केवल उनके स्वास्थ्य को खराब किया बल्कि उनके पेशेवर रिश्तों पर भी बुरा असर डाला। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन के बीच की यह प्रतिद्वंद्विता केवल दो अभिनेताओं की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह दो अलग-अलग अभिनय शैलियों और सामाजिक विचारधाराओं का टकराव था। खन्ना प्रेम और कोमलता के प्रतीक थे, जबकि बच्चन उस दौर के समाज के गुस्से और कुंठा की आवाज बनकर उभरे थे।
अमिताभ बच्चन के उदय ने फिल्म उद्योग के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया था। प्रेम चोपड़ा के अनुसार, अमिताभ की कार्यक्षमता और समर्पण ने निर्देशकों को अपनी ओर आकर्षित किया। फिल्म 'आनंद' और 'नमक हराम' जैसी फिल्मों में जब दोनों कलाकारों ने साथ काम किया, तो यह साफ दिखने लगा था कि प्रकाश की किरणें अब किस दिशा में मुड़ रही हैं। 'नमक हराम' के बाद तो यह स्पष्ट हो गया था कि दर्शक अब अमिताभ के प्रति अधिक सहानुभूति रख रहे हैं। राजेश खन्ना ने खुद भी स्वीकार किया था कि उनका समय समाप्त हो रहा है, लेकिन एक सुपरस्टार के लिए अपनी आंखों के सामने अपनी चमक को फीका होते देखना एक असहनीय मानसिक प्रताड़ना के समान था। उन्होंने अपनी इस तकलीफ को दुनिया से छिपाने की बहुत कोशिश की, लेकिन शराब की लत ने उनकी इस खामोश पीड़ा को सार्वजनिक कर दिया।
प्रेम चोपड़ा ने उस दौर के एक और महत्वपूर्ण पहलू को स्पष्ट किया कि राजेश खन्ना अपनी असुरक्षाओं को लेकर बहुत संवेदनशील थे। वह अक्सर इस बात से परेशान रहते थे कि नए कलाकार उनकी जगह ले रहे हैं। उन्होंने अपनी पहचान को बनाए रखने के लिए बहुत संघर्ष किया, लेकिन समय का पहिया उनके विपरीत घूम चुका था। खन्ना का व्यक्तित्व ऐसा था कि उन्हें हर समय तारीफ सुनने की आदत थी, और जब आलोचनाएं और असफलताएं मिलने लगीं, तो वह अंदर से टूट गए। उन्होंने खुद को एक ऐसे खोल में बंद कर लिया जहाँ केवल उनकी शराब और उनकी पुरानी यादें ही उनके साथ थीं। यह एक ऐसे महान कलाकार का पतन था जिसने कभी भारतीय सिनेमा पर एकछत्र राज किया था। निजी जीवन में भी राजेश खन्ना को काफी अकेलापन झेलना पड़ा। उनकी शादी का टूटना और फिर एकांतवास में चले जाना उनकी मानसिक स्थिति को और खराब कर गया। प्रेम चोपड़ा याद करते हैं कि कैसे कभी उनके बंगले 'आशीर्वाद' के बाहर लगने वाली भीड़ गायब हो गई थी। खन्ना के लिए यह सब सहन करना बहुत कठिन था क्योंकि वह प्रशंसकों के प्यार के भूखे थे। उन्होंने शराब को अपना हमदर्द बना लिया, जो धीरे-धीरे उन्हें मौत के करीब ले गई। अमिताभ बच्चन के प्रति उनकी भावनाएं मिली-जुली थीं; एक तरफ वह उनकी प्रतिभा का सम्मान करते थे, तो दूसरी तरफ वह उन्हें अपनी असफलता का प्रतीक भी मानते थे। यह एक मानवीय कमजोरी थी जिससे काका कभी पूरी तरह उबर नहीं पाए।
Also Read- दिवंगत अभिनेता की अंतिम विदाई: अक्षय कुमार की 'भूत बंगला' में दिखेगी आखिरी झलक।
What's Your Reaction?







