Pakistan Saudi Arabia Relations: यमन संकट और हूती विद्रोहियों के मुद्दे पर पाकिस्तान की सैन्य हिचक, सऊदी अरब के साथ रिश्तों में आई तल्खी को पाटने में जुटे शहबाज शरीफ

यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य मोर्चे पर पाकिस्तान की दूरी के बाद सऊदी अरब के साथ रिश्तों में पैदा हुई असहजता को दूर करने के लिए शहबाज शरीफ सरकार ने कूटनीतिक प्रयास तेज किए।

Sep 14, 2026 - 13:44
 0  0
Pakistan Saudi Arabia Relations: यमन संकट और हूती विद्रोहियों के मुद्दे पर पाकिस्तान की सैन्य हिचक, सऊदी अरब के साथ रिश्तों में आई तल्खी को पाटने में जुटे शहबाज शरीफ
  • Pakistan Saudi Arabia Relations: यमन संकट और हूती विद्रोहियों के मुद्दे पर पाकिस्तान की सैन्य हिचक, सऊदी अरब के साथ रिश्तों में आई तल्खी को पाटने में जुटे शहबाज शरीफ
  • Diplomatic Crisis: क्या यमन युद्ध से दूरी बनाकर फंसा पाकिस्तान? सऊदी अरब की नाराजगी दूर करने के लिए इस्लामाबाद की कूटनीतिक सक्रियता तेज
  • Pakistan Foreign Policy: खाड़ी देशों की उम्मीदों और घरेलू सियासी दबाव के बीच असमंजस में पाकिस्तान, शहबाज सरकार के सामने वित्तीय साख बचाने की चुनौती
  • शहबाज शरीफ की कूटनीतिक परीक्षा: हूती विरोधी मोर्चे पर दूरी बनाने के बाद सऊदी अरब से बिगड़े समीकरण, डैमेज कंट्रोल में जुटा विदेश मंत्रालय

पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक उथल-पुथल और लाल सागर में जहाजों की आवाजाही पर मंडराते सुरक्षा खतरों के बीच पाकिस्तान और सऊदी अरब के पारंपरिक कूटनीतिक रिश्तों में एक बार फिर गंभीर असहजता उभरकर सामने आई है। यमन में सक्रिय हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में सक्रिय सैन्य भूमिका निभाने को लेकर पाकिस्तान की हिचक ने रियाद के सत्ता गलियारों में नाराजगी बढ़ा दी है। इस स्थिति के चलते इस्लामाबाद में शहबाज शरीफ की गठबंधन सरकार गहरे राजनयिक दबाव में आ गई है, और दोनों देशों के बीच उपजी दूरी को पाटने के लिए उच्चस्तरीय डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू कर दी गई है।

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच दशकों पुराना रक्षा और वित्तीय सहयोग का इतिहास रहा है। जब भी पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट, भुगतान संतुलन की कमी या विदेशी मुद्रा भंडार के क्षरण से जूझता है, तो सऊदी अरब ने केंद्रीय बैंक में अरबों डॉलर के सुरक्षित डिपॉजिट रखकर या विलंबित भुगतान पर तेल आपूर्ति देकर उसे राहत पहुंचाई है। इसके बदले में सऊदी अरब पारंपरिक रूप से यह अपेक्षा रखता रहा है कि जब भी उसकी क्षेत्रीय सीमाओं या रणनीतिक हितों पर कोई गंभीर संकट आए, तो पाकिस्तानी सेना उसकी सुरक्षा छतरी को मजबूत करने के लिए आगे आए।

  • हूती संघर्ष और पाकिस्तान की ऐतिहासिक अनिच्छा

ताजा गतिरोध का केंद्र यमन और लाल सागर क्षेत्र में हूती विद्रोहियों की आक्रामक गतिविधियां हैं। रियाद की ओर से सुरक्षा साझेदारी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने और सहयोगी देशों से सीधी मदद की अपेक्षा के संकेत मिलते रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तानी प्रतिष्ठान सीधे तौर पर खाड़ी में किसी सैन्य अभियान का हिस्सा बनने से बचता रहा है।

यह स्थिति वर्ष 2015 के घटनाक्रम की याद दिलाती है, जब यमन संकट के समय सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने पाकिस्तान से सैनिकों, लड़ाकू विमानों और युद्धपोतों की मांग की थी। उस समय पाकिस्तान की संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर इस अंतर-अरब संघर्ष में तटस्थ रहने का निर्णय लिया था। हालांकि तत्कालीन सरकार ने पवित्र हरमैन-शरीफैन (मक्का और मदीना) की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्धता जताई थी, लेकिन यमन में सैनिकों को झोंकने से इनकार कर दिया था। उस फैसले ने सऊदी राजघराने और पाकिस्तानी नेतृत्व के बीच गहरे विश्वास के संकट को जन्म दिया था। मौजूदा दौर में भी जब पश्चिम एशिया में समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय तेल रिफाइनरियों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं चरम पर हैं, पाकिस्तान की इसी रक्षात्मक नीति ने सऊदी नेतृत्व को निराश किया है।

  • पाकिस्तान की घरेलू मजबूरियां और शिया-सुन्नी संतुलन

कूटनीतिक जानकारों के अनुसार, हूती विद्रोहियों के खिलाफ किसी भी सैन्य गठबंधन में कूदने से पाकिस्तान की घरेलू स्थिरता पर सीधा असर पड़ सकता है। पाकिस्तान की सीमा ईरान से मिलती है, और दोनों देशों के बीच 900 किलोमीटर से अधिक लंबी संवेदनशील सीमा रेखा है। ईरान खुले तौर पर हूती विद्रोहियों का वैचारिक और सैन्य समर्थक माना जाता है। यदि पाकिस्तान सऊदी अरब के सैन्य अभियानों में खुलकर भाग लेता है, तो इससे तेहरान के साथ उसके रिश्ते अत्यधिक तनावपूर्ण हो सकते हैं।

इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान के भीतर पर्याप्त संख्या में शिया मुस्लिम आबादी निवास करती है। किसी भी ऐसे विदेशी संघर्ष में भाग लेना, जिसे मध्य पूर्व में शिया-सुन्नी छद्म युद्ध के रूप में देखा जाता है, पाकिस्तान के आंतरिक सांप्रदायिक माहौल को बिगाड़ सकता है। देश पहले से ही खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूच अलगाववादी संगठनों के हिंसक हमलों से जूझ रहा है। ऐसे दोहरे मोर्चे पर पाकिस्तानी सेना अपने सैनिकों को एक नए अंतरराष्ट्रीय युद्धक्षेत्र में तैनात करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती।

  • शहबाज शरीफ का डैमेज कंट्रोल और कूटनीतिक चैनल

सऊदी अरब की नाराजगी पाकिस्तान के लिए केवल एक कूटनीतिक झटका नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक वजूद के लिए सीधा खतरा बन सकती है। इसी गंभीरता को भांपते हुए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और सैन्य नेतृत्व के साथ कई दौर की आपातकालीन बैठकें की हैं।

इस डैमेज कंट्रोल रणनीति के तहत इस्लामाबाद निम्नलिखित कदम उठाने पर विचार कर रहा है:

राजनयिक दूतों की सक्रियता: वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारियों और विशेष दूतों को रियाद भेजकर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है कि पाकिस्तान सऊदी अरब की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, भले ही वह सीधे आक्रामक अभियानों में भाग लेने की स्थिति में न हो।

सऊदी अरब के भीतर रक्षा सहयोग जारी रखना: पाकिस्तान यह रेखांकित कर रहा है कि सऊदी अरब की धरती पर पहले से मौजूद पाकिस्तानी सैन्य प्रशिक्षक और सलाहकार अपनी सेवाएं देते रहेंगे और देश की सीमाओं की किसी भी सीधी रक्षा में पीछे नहीं हटेंगे।

बैकचैनल कूटनीति: संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के प्रभाव का उपयोग करते हुए सऊदी राजघराने को आश्वस्त करने का प्रयास किया जा रहा है कि पाकिस्तान की तटस्थता का अर्थ विश्वासघात नहीं, बल्कि उसकी जटिल क्षेत्रीय व घरेलू मजबूरियां हैं।

  • आर्थिक मोर्चे पर गहरा सकता है संकट

यदि शहबाज शरीफ की सरकार सऊदी अरब की चिंताओं को समय रहते शांत करने में विफल रहती है, तो पाकिस्तान की पहले से लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से मिलने वाले बेलआउट पैकेज भी अक्सर खाड़ी देशों की वित्तीय गारंटी और रोल-ओवर प्रतिबद्धताओं पर टिके होते हैं।

इसके अतिरिक्त, सऊदी अरब में 25 लाख से अधिक पाकिस्तानी कामगार कार्यरत हैं, जो हर साल अरबों डॉलर का विदेशी प्रेषण (रेमिटेंस) अपने घर भेजते हैं। यह प्रेषण पाकिस्तान के कुल चालू खाता घाटे को पाटने में सबसे बड़ा सहारा बनता है। यदि राजनयिक रिश्तों में कड़वाहट बढ़ती है, तो कार्य वीजा के नियमों में सख्ती या वित्तीय सहायता रोके जाने का सीधा असर पाकिस्तान की आम जनता और राजकोषीय स्थिति पर पड़ेगा। आने वाले दिन शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी विदेश नीति के लिए बेहद नाजुक साबित होने वाले हैं। इस्लामाबाद को एक ऐसी संतुलित रणनीति अपनानी होगी, जिससे न केवल रियाद के साथ रणनीतिक और वित्तीय साझेदारी बची रहे, बल्कि ईरान के साथ सीमा विवाद और देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव का नया मोर्चा भी न खुले।

Also Read- Kangana Ranaut Statement: 'हिमाचल में बीजेपी सरकार बनते ही खुलेंगे RSS के स्कूल', कंगना रनौत का टीएमसी पर तीखा हमला

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow