Delhi Parallel Ring Road: राजधानी में तीसरी रिंग रोड की तैयारी, उत्तर से दक्षिण दिल्ली का सफर घटकर होगा 30 मिनट, समझें ₹7000 करोड़ की योजना का पूरा प्लान
दिल्ली में इनर और आउटर रिंग रोड का दबाव घटाने के लिए ₹7000 करोड़ की लागत से पैरेलल रिंग रोड का खाका तैयार किया जा रहा है। जानिए इसका रूट, बजट और कनेक्टिविटी का पूरा विवरण।

- Delhi Parallel Ring Road: राजधानी में तीसरी रिंग रोड की तैयारी, उत्तर से दक्षिण दिल्ली का सफर घटकर होगा 30 मिनट, समझें ₹7000 करोड़ की योजना का पूरा प्लान
- दिल्ली ट्रैफिक से मिलेगी बड़ी राहत: ₹7000 करोड़ की लागत से बनेगी पैरेलल रिंग रोड, जानिए रूट, लागत और पूरा खाका
- Delhi News: इनर और आउटर के बाद दिल्ली को मिलेगी पैरेलल रिंग रोड, सिग्नल फ्री सफर से वजीराबाद से बदरपुर तक आसान होगी राह
- 30 मिनट में नॉर्थ से साउथ दिल्ली: 7000 करोड़ के पैरेलल रिंग रोड प्रोजेक्ट पर मंथन, मुख्य सड़कों से कम होगा गाड़ियों का दबाव
देश की राजधानी दिल्ली में हर दिन सड़कों पर बढ़ते वाहनों के दबाव और घंटों लगने वाले जाम से निपटने की दिशा में एक महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा योजना पर विचार शुरू हुआ है। इनर रिंग रोड (महात्मा गांधी मार्ग) और आउटर रिंग रोड के बाद अब दिल्ली में एक 'पैरेलल रिंग रोड' (समानांतर रिंग रोड) विकसित करने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। प्रारंभिक प्रस्ताव के अनुसार, लगभग ₹7,000 करोड़ के अनुमानित खर्च से तैयार होने वाले इस कॉरिडोर का मुख्य उद्देश्य उत्तर दिल्ली से दक्षिण दिल्ली के बीच की यात्रा को पूरी तरह सिग्नल-मुक्त बनाकर केवल 30 मिनट में समेटना है।
वर्तमान में उत्तरी छोर से दक्षिणी छोर तक जाने वाले यात्रियों को पीक आवर्स के दौरान डेढ़ से दो घंटे तक का समय लग जाता है। खासकर आईटीओ, आश्रम, धौला कुआं, कश्मीरी गेट और सराय काले खां जैसे प्रमुख चौराहों पर वाहनों की गति बेहद धीमी हो जाती है। प्रस्तावित पैरेलल रिंग रोड योजना के तहत मौजूदा जलमार्गों, रेलवे लाइनों और यमुना के तटीय बफर क्षेत्रों के समानांतर एलिवेटेड और भूमिगत पैच का उपयोग कर एक अतिरिक्त बाईपास गलियारा तैयार करने पर मंथन किया जा रहा है।
- परियोजना का प्रस्तावित खाका और संरेखण
शहरी नियोजन से जुड़े प्राथमिक दस्तावेजों और अध्ययनों के मुताबिक, इस परियोजना का मुख्य संरेखण (अलाइनमेंट) उत्तर में वजीराबाद-बुराड़ी क्षेत्र से शुरू होकर यमुना के पश्चिमी तटबंध और रेलवे पटरियों के निकटवर्ती क्षेत्रों से होते हुए दक्षिण-पूर्वी सीमा पर बदरपुर या कालिंदी कुंज की दिशा में जोड़ने का प्रस्ताव रखता है।
वर्तमान व्यवस्था में उत्तर से दक्षिण जाने वाले अधिकांश भारी और मध्यम वाणिज्यिक वाहन, साथ ही अंतरराज्यीय यात्री, मौजूदा रिंग रोड का ही सहारा लेते हैं। जब यह नया गलियारा जमीन पर उतरेगा तो:
उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी, मुकुंदपुर और जीटी करनाल रोड से आने वाला ट्रैफिक बिना शहर के अंदरूनी जाम में फंसे सीधे रिंग रोड के समानांतर निकल सकेगा।
मध्य दिल्ली के व्यस्त इलाकों जैसे कश्मीरी गेट, राजघाट और प्रगति मैदान के आसपास से वाहनों का बड़ा हिस्सा सीधे बाईपास हो जाएगा।
दक्षिण दिल्ली, नोएडा और फरीदाबाद जाने वाले यात्रियों को एक वैकल्पिक और तेज गति वाला रास्ता मिलेगा।
योजना का एक बड़ा हिस्सा एलिवेटेड स्ट्रक्चर पर आधारित रखने का विचार है, ताकि घनी आबादी वाले इलाकों में भूमि अधिग्रहण की जटिल कानूनी और सामाजिक अड़चनों से बचा जा सके।
- जाम और प्रदूषण से दोहरी राहत की उम्मीद
दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या में वाहनों से निकलने वाले धुएं की हिस्सेदारी काफी अधिक रहती है। जब गाड़ियां जाम में 'स्टॉप-एंड-गो' स्थिति में रेंगती हैं, तो ईंधन की खपत और जहरीले धुएं का उत्सर्जन सामान्य ड्राइविंग की तुलना में कई गुना बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि नॉर्थ-साउथ आवागमन को 30 मिनट का निर्बाध सिग्नल-फ्री रास्ता मिल जाता है, तो इससे प्रतिदिन लाखों लीटर ईंधन की बचत होगी। इसके साथ ही इनर और आउटर रिंग रोड पर वाहनों का घनत्व करीब 25 से 30 प्रतिशत तक कम होने की संभावना जताई जा रही है। आश्रम फ्लाईओवर और धौला कुआं जैसे जंक्शनों पर जो दबाव दशकों से बना हुआ है, वह भी इस समानांतर नेटवर्क के सक्रिय होने पर काफी हद तक संतुलित हो सकेगा।
- बजट, फंडिंग और वित्तीय ढांचा
करीब ₹7,000 करोड़ के इस संभावित पूंजीगत व्यय को पूरा करने के लिए विभिन्न वित्तीय मॉडलों का विश्लेषण किया जा रहा है। चूंकि यह परियोजना राजधानी के भीतर अंतरराज्यीय कनेक्टिविटी को भी सीधा लाभ पहुंचाती है (हरियाणा से आने वाला ट्रैफिक सीधे उत्तर प्रदेश या दक्षिण हरियाणा की ओर निकल सकेगा), इसलिए इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकार की संयुक्त सहभागिता अथवा हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (HAM) के विकल्प तलाशे जा सकते हैं।
हालांकि, बुनियादी ढांचा विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े बजट की परियोजना में पर्यावरणीय स्वीकृतियां, यमुना नदी के इको-सेंसिटिव जोन के नियम और विभिन्न विभागों (जैसे पीडब्ल्यूडी, एनएचएआई, रेलवे और डीडीए) के बीच समन्वय सबसे महत्वपूर्ण कारक होंगे। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार होने और उस पर तकनीकी मुहर लगने के बाद ही निर्माण की आधिकारिक समय-सीमा स्पष्ट हो सकेगी।
- मौजूदा रिंग रोड नेटवर्क और तीसरे कॉरिडोर की आवश्यकता
वर्तमान में दिल्ली का प्राथमिक सड़क ढांचा मुख्य रूप से दो प्रमुख वलयों पर टिका हुआ है:
इनर रिंग रोड: लगभग 51 किलोमीटर लंबा यह मार्ग मध्य और दक्षिणी दिल्ली के मुख्य व्यापारिक और आवासीय केंद्रों को जोड़ता है। इस पर कई स्थानों पर ग्रेड सेपरेटर और अंडरपास बनने के बावजूद क्षमता से अधिक ट्रैफिक का दबाव बना रहता है।
आउटर रिंग रोड: करीब 47 किलोमीटर की परिधि वाला यह मार्ग शहर के बाहरी हिस्सों को जोड़ता है, लेकिन पश्चिमी और उत्तरी दिल्ली के विस्तार के साथ यह भी पूरी तरह संतृप्त हो चुका है।
दिल्ली-एनसीआर में ईस्टर्न और वेस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे बनने के बाद उन भारी ट्रकों को तो बाहर कर दिया गया जिन्हें दिल्ली में प्रवेश नहीं करना था, लेकिन दिल्ली के अपने स्थानीय और एनसीआर के दैनिक यात्रियों के लिए आंतरिक रिंग सिस्टम पर दबाव जस का तस रहा। इसी कमी को पाटने के लिए पैरेलल रिंग रोड की यह परिकल्पना सामने आई है। यदि सभी स्वीकृतियां समय पर मिलती हैं और परियोजना धरातल पर उतरती है, तो यह आगामी वर्षों में दिल्ली के शहरी परिवहन इतिहास की सबसे क्रांतिकारी परियोजनाओं में से एक साबित हो सकती है।
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