Allahabad High Court Verdict - भरण-पोषण पति का 'पवित्र और नैतिक कर्तव्य', हाईकोर्ट ने किया मनुस्मृति का उल्लेख
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण को पवित्र व नैतिक कर्तव्य बताते हुए मनुस्मृति के श्लोक और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख किया है।

- Maintenance Plea High Court - पत्नी, बच्चों और वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण कानूनी दायित्व भी: इलाहाबाद हाईकोर्ट
- Justice Praveen Kumar Giri Ruling - मनुस्मृति के श्लोक का हवाला देकर हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता याचिका पर दिया अहम आदेश
- Allahabad HC Maintenance Case - सुप्रीम कोर्ट के अंजू गर्ग फैसले का संदर्भ, पिंकी वर्मा की याचिका पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पारिवारिक भरण-पोषण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र के ग्रंथ मनुस्मृति का उल्लेख किया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि अपनी पत्नी, नाबालिग बच्चों और वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण करना किसी भी व्यक्ति का केवल वैधानिक दायित्व ही नहीं, बल्कि उसका एक ‘पवित्र और नैतिक कर्तव्य’ भी है।
- जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि ने किया मनुस्मृति के श्लोक का उल्लेख
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकल पीठ ने कानपुर नगर की एक परिवार अदालत (फैमिली कोर्ट) द्वारा निर्धारित किए गए भरण-पोषण भत्ते की राशि को बढ़ाने की मांग वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए की। यह याचिका पिंकी वर्मा नामक महिला द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने निचली अदालत द्वारा तय की गई गुजारा भत्ता राशि को अपर्याप्त बताते हुए इसे बढ़ाने का अनुरोध किया था। याचिका पर विस्तृत विचार करते हुए न्यायमूर्ति गिरि ने मनुस्मृति के अध्याय 11 के श्लोक 10 का उल्लेख किया, जिसमें परिवार के आश्रित सदस्यों के संरक्षण और पोषण को प्राथमिक धर्म माना गया है।
- कानूनी और नैतिक दोनों स्तरों पर उत्तरदायित्व
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि सामाजिक और विधिक व्यवस्था के तहत पुरुष का यह प्राथमिक दायित्व है कि वह अपने वैवाहिक और पारिवारिक बंधनों का सम्मान करे। कोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति विवाह के बंधन में बंधता है और उसके आश्रित होते हैं, तो वह अपनी वित्तीय या व्यक्तिगत व्यस्तताओं का बहाना बनाकर उनके भरण-पोषण से मुंह नहीं मोड़ सकता। पत्नी, अल्पवयस्क संतानों और असहाय वृद्ध माता-पिता को सम्मानजनक जीवन यापन के साधन उपलब्ध कराना उसका स्वाभाविक कर्तव्य है।
- सुप्रीम कोर्ट के अंजू गर्ग फैसले का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में केवल धार्मिक-नैतिक ग्रंथों का ही संदर्भ नहीं लिया, बल्कि देश की शीर्ष अदालत की स्थापित न्याय प्रणाली का भी उल्लेख किया। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में चर्चित 'अंजू गर्ग एवं अन्य बनाम दीपक कुमार गर्ग' मामले में प्रतिपादित किए गए सिद्धांतों का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में व्यवस्था दी थी कि सक्षम पति पर यह बाध्यकारी दायित्व होता है कि वह अलग रह रही पत्नी और बच्चों को भरण-पोषण प्रदान करे, ताकि वे आर्थिक तंगी या भुखमरी की स्थिति में न पहुंचें। हाईकोर्ट के इस न्यायिक दृष्टिकोण को पारिवारिक विवादों और भरण-पोषण के मामलों में उत्तरदायित्व तय करने की दिशा में एक अहम नजीर माना जा रहा है।
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