सुप्रीम कोर्ट में 'जिन्दा' होने का सुबूत लेकर पहुंची मरे आदमी की आत्मा, बिहार का कारनामा देख सब हुए सन्न।

Bihar: बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले भारत निर्वाचन आयोग द्वारा शुरू किया गया विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान विवादों के घेरे में है। इस अभियान...

Aug 14, 2025 - 12:22
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सुप्रीम कोर्ट में 'जिन्दा' होने का सुबूत लेकर पहुंची मरे आदमी की आत्मा, बिहार का कारनामा देख सब हुए सन्न।
सुप्रीम कोर्ट में 'जिन्दा' होने का सुबूत लेकर पहुंची मरे आदमी की आत्मा, बिहार का कारनामा देख सब हुए सन्न।

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले भारत निर्वाचन आयोग द्वारा शुरू किया गया विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान विवादों के घेरे में है। इस अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को साफ करना और गलत प्रविष्टियों को हटाना था, लेकिन इसकी प्रक्रिया पर विपक्षी दल और कई नागरिक संगठन लगातार सवाल उठा रहे हैं। इस बीच, एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें बिहार के एक मतदाता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दावा किया कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) ने उसे ‘मृत’ घोषित कर मतदाता सूची से उसका नाम हटा दिया, जबकि वह जीवित है और मतदान का अधिकार रखता है। इस घटना ने न केवल निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि बिहार में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर भी बहस छेड़ दी है।

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान बिहार में 25 जून से शुरू हुआ और 26 जुलाई तक चला। इसका मकसद मतदाता सूची से डुप्लिकेट नाम, मृत व्यक्तियों, स्थानांतरित हो चुके लोगों और गैर-कानूनी प्रविष्टियों को हटाना था। आयोग के अनुसार, इस प्रक्रिया में 65 लाख नाम हटाए गए, जिनमें 22 लाख मृतक, 36 लाख स्थानांतरित और 7 लाख डुप्लिकेट प्रविष्टियां शामिल थीं। इस अभियान के तहत बिहार में मतदाता संख्या 7.89 करोड़ से घटकर 7.24 करोड़ हो गई। हालांकि, इस प्रक्रिया पर विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने सवाल उठाए, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) शामिल हैं। इनका कहना है कि यह प्रक्रिया जल्दबाजी में और गैर-पारदर्शी तरीके से की गई, जिससे लाखों पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हटने का खतरा है। इस विवाद का सबसे गंभीर पहलू तब सामने आया, जब बिहार के एक मतदाता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर बताया कि उसे गलती से ‘मृत’ घोषित कर उसका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि वह जीवित है और उसने पहले कई बार मतदान किया था, लेकिन BLO ने बिना किसी सत्यापन के उसे मृत मान लिया। इस तरह की गलती ने न केवल उस व्यक्ति के मतदान के अधिकार को प्रभावित किया, बल्कि यह भी दिखाया कि SIR प्रक्रिया में कितनी लापरवाही बरती गई। याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि इस प्रक्रिया की जांच की जाए और गलत तरीके से हटाए गए नामों को वापस जोड़ा जाए। यह मामला उन कई शिकायतों का हिस्सा है, जिनमें लोगों ने दावा किया कि उनके नाम बिना किसी सूचना या सत्यापन के सूची से हटाए गए।

विपक्षी दलों ने इस अभियान को ‘वोटबंदी’ का नाम दिया और इसे लोकतंत्र के खिलाफ बताया। RJD नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि यह प्रक्रिया गरीब, प्रवासी और हाशिए पर रहने वाले लोगों को मतदान से वंचित करने की साजिश है। उन्होंने दावा किया कि BLO ने कई मामलों में मतदाताओं से संपर्क किए बिना ही उनके नाम हटा दिए। तेजस्वी ने यह भी आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग NDA सरकार के दबाव में काम कर रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को उठाते हुए कई उदाहरण साझा किए, जिनमें लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए। एक अन्य विपक्षी नेता मनोज झा ने कहा कि BLO ने कई जगह फर्जी हस्ताक्षर करके फॉर्म अपलोड किए, जिससे प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान कई गंभीर सवाल उठे। याचिकाकर्ताओं के वकील, जिनमें गोपाल शंकरनारायणन, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी शामिल थे, ने दलील दी कि SIR प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21, 325 और 326 का उल्लंघन करती है। उन्होंने कहा कि आयोग ने ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ नाम से एक नया शब्द गढ़ा, जो कानून में नहीं है। वकीलों ने यह भी सवाल उठाया कि जब आधार कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेजों को देशभर में पहचान के लिए स्वीकार किया जाता है, तो SIR में इन्हें क्यों खारिज किया गया। उन्होंने दावा किया कि यह प्रक्रिया जल्दबाजी में शुरू की गई, खासकर तब जब विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, जिससे लाखों मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है। आयोग के वकीलों, केके वेणुगोपाल, राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह ने कोर्ट में दलील दी कि यह प्रक्रिया संवैधानिक दायित्व का हिस्सा है और 2003 की मतदाता सूची को आधार बनाकर की गई है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों का नाम 2003 की सूची में था, उन्हें कोई दस्तावेज जमा करने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा, जिनके माता-पिता का नाम सूची में है, उन्हें केवल जन्म प्रमाण देना होगा। आयोग ने दावा किया कि कोई भी पात्र मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जाएगा और प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है। सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन आयोग को सुझाव दिया कि वह आधार कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेजों को स्वीकार करने पर विचार करे। कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इस प्रक्रिया की समयसीमा कानून में तय है और क्या यह वास्तव में पारदर्शी है। जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा कि मतदाता सूची स्थिर नहीं रह सकती और इसका समय-समय पर पुनरीक्षण जरूरी है, लेकिन प्रक्रिया को निष्पक्ष और व्यावहारिक होना चाहिए। इस मामले ने बिहार में राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक विरोध किया। पटना में RJD, कांग्रेस और भाकपा माले ने चक्का जाम किया और इसे जनविरोधी प्रक्रिया बताया। तेजस्वी यादव ने 35 दलों को पत्र लिखकर इस अभियान का विरोध करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया गरीबों और प्रवासियों के लिए दस्तावेज जमा करना मुश्किल बनाती है, जिससे उनके मतदान के अधिकार छिन सकते हैं।

सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस छिड़ी हुई है। कई लोगों ने आयोग की प्रक्रिया को जरूरी बताया, ताकि फर्जी मतदाताओं को हटाया जा सके। एक यूजर ने लिखा, “मतदाता सूची में डुप्लिकेट और मृत लोगों के नाम हटाना जरूरी है, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि पात्र लोगों का नाम न हटे।” वहीं, कुछ लोगों ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया। एक अन्य यूजर ने लिखा, “जीवित व्यक्ति को मृत घोषित करना शर्मनाक है। आयोग को अपनी गलतियां सुधारनी होंगी।” यह मामला कई बड़े सवाल उठाता है। पहला, BLO की कार्यप्रणाली पर सवाल। अगर जीवित व्यक्ति को मृत घोषित किया जा सकता है, तो यह प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। दूसरा, दस्तावेजों की स्वीकार्यता। आधार और वोटर आईडी जैसे सामान्य दस्तावेजों को खारिज करना कई लोगों के लिए परेशानी का कारण बना। तीसरा, समयसीमा। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इतनी बड़ी प्रक्रिया शुरू करना कई लोगों को अव्यावहारिक लगा। निर्वाचन आयोग ने कहा कि 1 अगस्त को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की गई और 1 सितंबर तक दावे-आपत्तियां दर्ज की जा सकती हैं। आयोग ने यह भी भरोसा दिया कि बिना कारण कोई नाम नहीं हटाया जाएगा। हालांकि, इस मामले ने मतदाताओं में संदेह पैदा किया है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आयोग की कार्रवाई इस विवाद को हल करने में महत्वपूर्ण होगी।

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