Bombay High Court: पति से अधिक कमाई करने वाली पत्नी नहीं मांग सकती गुजारा भत्ता, बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाया कि पति से अधिक कमाने वाली महिला तलाक के बाद मेंटेनेंस की हकदार नहीं है। कोर्ट ने पत्नी की याचिका खारिज कर दी।

Jul 26, 2026 - 15:54
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Bombay High Court: पति से अधिक कमाई करने वाली पत्नी नहीं मांग सकती गुजारा भत्ता, बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका
Wife Earning More Than Husband Maintenance

  • पत्नी की कमाई पति से ज्यादा तो मेंटेनेंस का हक नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला, भरण-पोषण की मांग खारिज
  • पति से ज्यादा कमाती थी महिला, तलाक के बाद मांगी मेंटेनेंस; बॉम्बे हाईकोर्ट का सख्त रुख— 'गुजारा भत्ता नहीं मिलेगा'
  • बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पति से अधिक आय वाली महिला गुजारा भत्ते की हकदार नहीं, याचिका खारिज

बॉम्बे हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण (Maintenance) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत रेखांकित करते हुए फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी आत्मनिर्भर है और अपने पति की तुलना में अधिक आय अर्जित कर रही है, तो वह तलाक या अलगाव की स्थिति में पति से अंतरिम गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं है। न्यायमूर्ति की पीठ ने यह आदेश एक पारिवारिक अदालत (Family Court) के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता महिला ने अपने पति से मासिक भरण-पोषण की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने दस्तावेजों और आय के विवरण का अवलोकन करने के बाद पाया कि महिला का वेतन पति से अधिक है, इसलिए उसकी याचिका खारिज कर दी गई।

बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष एक वैवाहिक विवाद का मामला आया, जिसमें पति और पत्नी दोनों अलग रह रहे थे। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी अंतरिम भरण-पोषण की मांग को खारिज कर दिया गया था। महिला का तर्क था कि वैवाहिक संबंधों में आई दरार के बाद उसे अपने सम्मानजनक जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए पति से वित्तीय सहायता की आवश्यकता है।

हालांकि, सुनवाई के दौरान जब दोनों पक्षों के आय प्रमाण-पत्र और वित्तीय विवरण अदालत के सामने प्रस्तुत किए गए, तो तस्वीर बिल्कुल अलग निकली। वित्तीय रिकॉर्ड से साफ हुआ कि महिला पेशेवर रूप से अच्छी स्थिति में है और उसकी मासिक कमाई उसके पति की कुल आय से अधिक है। इस तथ्य को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने माना कि महिला को आर्थिक सहायता की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं है।

पति और पत्नी के बीच विवाद बढ़ने के बाद मामला अदालत तक पहुंचा था। पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 24 या दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) की गुहार लगाई थी।

  • फैमिली कोर्ट का रुख: प्राथमिक सुनवाई के दौरान फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की वित्तीय स्थिति का आकलन किया। फैमिली कोर्ट ने पाया कि पत्नी न केवल नौकरीपेशा है बल्कि उसका आय स्तर पति से काफी बेहतर है। इसलिए फैमिली कोर्ट ने गुजारा भत्ते की अर्जी खारिज कर दी।

  • हाईकोर्ट में चुनौती: फैमिली कोर्ट के निर्णय से असंतुष्ट होकर महिला ने बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील दायर की। महिला की दलील थी कि पति पर भी सामाजिक और वैवाहिक जिम्मेदारी है और उसे अपनी पूर्व स्थिति के अनुसार रखरखाव का भत्ता मिलना चाहिए।

  • हाईकोर्ट की समीक्षा: हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनीं और जमा किए गए टैक्स रिटर्न व सैलरी स्लिप का विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि महिला आर्थिक रूप से पूरी तरह स्वावलंबी (Financially Independent) है और अपनी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है।

सुनवाई के दौरान पति के कानूनी वकील ने अदालत में तर्क दिया कि भरण-पोषण का प्रावधान उन जीवनसाथियों की मदद के लिए बनाया गया है जो वित्तीय रूप से असहाय हैं या जिनके पास आजीविका का कोई जरिया नहीं है। जब पत्नी स्वयं पति से अधिक वेतन प्राप्त कर रही है, तो उस पर आर्थिक बोझ डालना न्यायसंगत नहीं है।

दूसरी ओर, महिला के वकील ने तर्क प्रस्तुत किया था कि पति की अन्य संपत्ति और व्यावसायिक आय का भी आकलन होना चाहिए। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि वर्तमान स्थिति में महिला की स्वयं की आय उसकी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त से भी अधिक है।

बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले का वैवाहिक मुकदमों के निपटारे पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा:

  1. कानून के संतुलन का संदेश: यह फैसला इस बात को दोहराता है कि भरण-पोषण संबंधी कानून किसी पक्ष के शोषण या अनुचित लाभ उठाने के लिए नहीं, बल्कि वित्तीय संतुलन और सहायता के लिए हैं।

  2. आर्थिक स्वावलंबन को मान्यता: कामकाजी और आत्मनिर्भर महिलाओं के मामलों में अदालतों का रुख अब इस बात पर केंद्रित हो रहा है कि वास्तविक आवश्यकता (Financial Need) किसकी और कितनी है।

  3. पुरुषों के अधिकारों का संरक्षण: यह निर्णय उन मामलों में पति पक्ष को कानूनी राहत देता है जहां पत्नी समान या बेहतर आर्थिक स्थिति में होने के बावजूद भारी-भरकम गुजारा भत्ते का दावा करती है।

अदालत के इस फैसले के बाद अंतरिम गुजारा भत्ते से जुड़ा यह विवाद खारिज हो गया है। हालांकि, मुख्य तलाक या वैवाहिक अधिकारों से संबंधित अन्य लंबित याचिकाओं पर फैमिली कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्यवाही जारी रहेगी। यदि किसी पक्ष के पास आय से जुड़े नए और ठोस साक्ष्य आते हैं, तो वे संबंधित फोरम में अपनी बात रख सकते हैं, लेकिन वर्तमान वित्तीय स्थिति के आधार पर महिला को पति से कोई भत्ता नहीं मिलेगा।

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