Russian Oil Imports: रूसी तेल पर भड़की ट्रंप की टीम, भारत और चीन को चेतावनी; जानिए क्या पड़ेगा असर
रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में तल्खी बढ़ गई है। ट्रंप से जुड़े रणनीतिकारों द्वारा भारत और चीन को दी गई चेतावनी और उसके असर का पूरा विश्लेषण।

- Russian Oil Imports: रूसी तेल पर भड़की ट्रंप की टीम, भारत और चीन को चेतावनी; जानिए क्या पड़ेगा असर
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वॉशिंगटन/नई दिल्ली। रूस और यूक्रेन के बीच जारी गतिरोध के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत और चीन द्वारा रूसी कच्चे तेल की निरंतर खरीद को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनीतिक हलकों में एक बार फिर तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टीम और रिपब्लिकन रणनीतिकारों से जुड़े प्रमुख चेहरों ने रूसी तेल के बड़े खरीदारों पर कड़े शब्दों में निशाना साधते हुए चेताया है कि वे अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं की समीक्षा करें। अमेरिकी खेमे की ओर से दिए गए बयानों में आरोप लगाया गया है कि भारत और चीन द्वारा रियायती दरों पर रूसी क्रूड की बड़े पैमाने पर खरीद से मास्को को अपनी अर्थव्यवस्था और युद्ध प्रयासों को गति देने का वित्तीय आधार मिल रहा है।
इस आक्रामक बयानबाजी के बाद अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा गलियारों और कूटनीतिक मंचों पर यह सवाल एक बार फिर गहरा गया है कि क्या अमेरिकी राजनीतिक समीकरण बदलने पर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और तेल आपूर्ति श्रृंखला पर प्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है। भारत शुरू से ही यह स्पष्ट करता रहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद किसी राजनीतिक धड़े के समर्थन या विरोध से प्रेरित नहीं है, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों की ऊर्जा जरूरतों को वहन करने योग्य (अफोर्डेबल) लागत पर पूरा करने का एक संप्रभु निर्णय है।
- अमेरिकी रुख और तीखी चेतावनियों के मायने
अमेरिकी राजनीतिक मंचों पर ट्रंप खेमे से जुड़े नीति विशेषज्ञों और ऊर्जा सलाहकारों का यह दृष्टिकोण रहा है कि जो बाइडन प्रशासन रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को सख्ती से लागू कराने में विफल रहा है। इसी संदर्भ में चेतावनी भरे लहजे में यह दलील दी जा रही है कि यदि आने वाले समय में अमेरिकी विदेश नीति में कड़ा रुख अपनाया जाता है, तो रूसी हाइड्रोकार्बन का व्यापार करने वाले विदेशी जहाजों, रिफाइनरियों और वित्तीय लेन-देन पर 'सेकेंडरी सैंक्शंस' (द्वितीयक प्रतिबंध) का दायरा अत्यंत कड़ा किया जा सकता है।
अमेरिकी रणनीतिकारों का मुख्य तर्क है कि रियायती कच्चा तेल खरीदकर भारतीय रिफाइनरियां उसे प्रसंस्कृत पेट्रोलियम उत्पादों (जैसे डीजल और जेट फ्यूल) में तब्दील कर यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों में भी आपूर्ति कर रही हैं, जिससे प्रत्यक्ष प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कमजोर पड़ती है। यही कारण है कि वे इसे पश्चिमी प्रतिबंधों के उद्देश्य के विपरीत बता रहे हैं और खरीदार देशों से अपनी नीतियां बदलने का आह्वान कर रहे हैं।
- भारत की स्थिति: संप्रभु ऊर्जा नीति और राष्ट्रीय हित
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस तरह के पश्चिमी दबावों का हमेशा सुदृढ़ और तार्किक उत्तर दिया है। भारतीय कूटनीति का स्पष्ट पक्ष रहा है:
घरेलू जरूरतों की अनिवार्यता: भारत अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है। किसी भी जिम्मेदार राष्ट्र के लिए यह जरूरी है कि वह बाजार में जहां सबसे किफायती और स्थिर आपूर्ति उपलब्ध हो, वहां से ईंधन जुटाए ताकि आम जनता को मुद्रास्फीति के झटके से बचाया जा सके।
वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता: भारतीय अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि यदि भारत और चीन जैसे विशाल आयातक देश अचानक रूसी आपूर्ति से पूरी तरह किनारा कर लें और केवल मध्य पूर्व या पश्चिमी स्रोतों पर निर्भर हो जाएं, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 130 से 150 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर को छू सकती हैं, जिसका सबसे गंभीर नुकसान पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को ही झेलना पड़ेगा।
- रूसी कच्चे तेल का भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
फरवरी 2022 से पहले भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से भी कम हुआ करती थी। हालांकि, पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस द्वारा दिए गए भारी डिस्काउंट के चलते यह हिस्सेदारी बढ़कर 35 से 40 प्रतिशत तक पहुंच गई, जिससे रूस भारत का सबसे बड़ा एकल कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया।
इस रियायती आपूर्ति ने भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों (सरकारी और निजी दोनों) के मार्जिन को मजबूत किया और देश में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों को वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद नियंत्रित रखने में बड़ी भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त, डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए रुपए-रूबल और यूएई दिरहम जैसी वैकल्पिक मुद्राओं में आंशिक लेन-देन के तंत्र भी विकसित किए गए।
- क्या वास्तव में भारत पर पड़ सकता है कोई बड़ा असर?
कूटनीतिक और रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बयानों और चेतावनियों के बावजूद भारत के खिलाफ कठोर आर्थिक दंडात्मक कदम उठाना वाशिंगटन के लिए व्यावहारिक रूप से आसान नहीं है।
इंडो-पैसिफिक में भारत की केंद्रीय भूमिका: क्वाड (QUAD) और व्यापक इंडो-पैसिफिक रणनीति में भारत अमेरिका का अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका को भारत के साथ गहरे रक्षा और भू-राजनीतिक सहयोग की आवश्यकता है।
व्यापारिक और निवेश संबंध: भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड ऊंचाई पर है। ऐसे में किसी ऊर्जा विवाद को लेकर भारत पर प्रतिबंध लगाने से दोनों देशों के बीच तकनीकी, रक्षा और व्यापारिक साझेदारियों को भारी नुकसान पहुंच सकता है।
सप्लाई चेन का विविधीकरण: भारत ने कभी भी केवल एक स्रोत पर निर्भर रहने की नीति नहीं अपनाई है। भारत लगातार इराक, सऊदी अरब, यूएई और स्वयं अमेरिका से भी तेल आयात कर रहा है। अमेरिका भारत के लिए कच्चे तेल और एलएनजी के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है, जो व्यापारिक संतुलन को बनाए रखने का कार्य करता है।
आने वाले समय में अमेरिकी चुनावी और राजनीतिक विमर्श के कारण इस प्रकार की बयानबाजी में उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है, लेकिन यथार्थवादी कूटनीति के आधार पर यह स्पष्ट है कि भारत अपनी राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और संप्रभु हितों के साथ कोई समझौता करने के मूड में नहीं है।
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