US-Iran Talks: अमेरिका के साथ 'तीन घंटे' की गुप्त वार्ता पर बोला ईरान, परमाणु मुद्दे और प्रतिबंधों पर रखा अपना रुख
अमेरिका के साथ हुई तीन घंटे की कूटनीतिक बातचीत को लेकर ईरान ने आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। तेहरान ने स्पष्ट किया है कि संवाद प्रतिबंध हटाने और परमाणु मुद्दे तक सीमित रहा।

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तेहरान। पश्चिम एशिया में जारी कूटनीतिक और सामरिक तनाव के बीच ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिनिधियों के बीच लगभग तीन घंटे तक चली महत्वपूर्ण बातचीत को लेकर तेहरान ने औपचारिक प्रतिक्रिया दी है। ईरानी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में इस विस्तृत संवाद की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया गया है कि बातचीत का मुख्य केंद्र बिंदु आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने, परमाणु कार्यक्रम से जुड़े विवादों और क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं पर केंद्रित था।
ईरानी अधिकारियों के अनुसार, यह बातचीत किसी प्रत्यक्ष द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के बीच गलतफहमियों को कम करने और एक-दूसरे के कड़े रुख को समझने के उद्देश्य से आयोजित की गई थी।
- मध्यस्थों के माध्यम से हुआ संवाद
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ताओं और संबंधित अधिकारियों ने यह साफ किया है कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से औपचारिक राजनयिक संबंध न होने के कारण यह चर्चा तीसरे पक्ष (मध्यस्थ देशों) की उपस्थिति या संदेश वाहक प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ाई गई। सामान्यतः ओमान या कतर जैसे खाड़ी देश इस तरह के अप्रत्यक्ष संवादों में प्रमुख भूमिका निभाते रहे हैं।
ईरान ने इस बात पर जोर दिया कि बातचीत की मेज पर उसका रुख पूरी तरह से स्पष्ट और दृढ़ था। तेहरान की प्रमुख मांग है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों को तुरंत और प्रभावी तरीके से हटाया जाए, जिससे ईरानी अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से तेल निर्यात और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली, सामान्य रूप से संचालित हो सके।
- परमाणु कार्यक्रम और संप्रभुता पर तेहरान का स्पष्ट रुख
इस तीन घंटे की मैराथन बैठक के संदर्भ में ईरान की ओर से कहा गया कि देश का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण नागरिक उद्देश्यों के लिए है। यूरेनियम संवर्धन और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के साथ सहयोग को लेकर वाशिंगटन की ओर से जताई जा रही चिंताओं पर ईरान ने अपना पारंपरिक रुख दोहराया कि जब तक अमेरिका 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) के तहत किए गए वादों का सम्मान नहीं करता, तब तक ईरान से एकतरफा रियायतों की उम्मीद नहीं की जा सकती।
ईरानी पक्ष ने यह भी साफ किया कि उसकी रक्षात्मक मिसाइल क्षमताएं और क्षेत्रीय रणनीतियां किसी भी वार्ता का हिस्सा नहीं हैं और इन पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। बैठक के दौरान मानवाधिकारों और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों को लेकर पश्चिमी देशों द्वारा लगाए जाने वाले आरोपों को भी ईरान ने खारिज किया।
दूसरी ओर, वाशिंगटन की ओर से इस संवाद को तनाव कम करने (De-escalation) और लाल सागर, इराक व सीरिया जैसे संवेदनशील इलाकों में अमेरिकी ठिकानों पर हमलों को रोकने के एक कूटनीतिक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की सीमा रेखा को पार न करे और क्षेत्र में सक्रिय सहयोगी समूहों पर नियंत्रण रखे।
कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि तीन घंटे तक चले इस गहन संवाद से यह संकेत मिलता है कि भारी बयानबाजी और सैन्य तनातनी के बावजूद दोनों देशों के बीच कूटनीति के चैनल पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। हालांकि, दशकों के गहरे अविश्वास को देखते हुए किसी ठोस और बड़े समझौते तक पहुंचना फिलहाल आसान नहीं दिखता।
ईरान ने अपने बयान के अंत में यह रेखांकित किया कि वह परिणामोन्मुखी बातचीत का कभी विरोधी नहीं रहा है, लेकिन बातचीत तभी सार्थक हो सकती है जब दूसरा पक्ष व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाए और दबाव की रणनीति को छोड़े। आने वाले हफ्तों में मध्यस्थ देशों के माध्यम से इस संवाद के अगले दौर की रूपरेखा तय किए जाने की संभावना है।
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