इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग जांच- कैश एट होम मामले में कार्रवाई तेज।

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ कैश एट होम मामले में महाभियोग की प्रक्रिया ने गति पकड़ ली है। लोकसभा स्पीकर ओम ...

Aug 12, 2025 - 15:47
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग जांच- कैश एट होम मामले में कार्रवाई तेज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग जांच- कैश एट होम मामले में कार्रवाई तेज।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ कैश एट होम मामले में महाभियोग की प्रक्रिया ने गति पकड़ ली है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने संसद में एक तीन सदस्यीय जांच समिति के गठन की घोषणा की है, जो इस मामले की गहन जांच करेगी। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार, मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनिंदर मोहन श्रीवास्तव, और कर्नाटक के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य शामिल हैं। यह समिति जस्टिस वर्मा पर लगे गंभीर आरोपों की जांच करेगी और अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर को सौंपेगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर आग लगने की घटना के दौरान बड़ी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद की गई। यह घटना 30 तुगलक क्रिसेंट, नई दिल्ली में उनके आधिकारिक आवास पर हुई, जहां एक स्टोररूम में आग लगने के बाद दमकलकर्मियों और पुलिस ने 500 रुपये के जले हुए नोटों के ढेर देखे। इस खोज ने न केवल न्यायिक हलकों में हलचल मचा दी, बल्कि यह सवाल भी उठाए कि इतनी बड़ी मात्रा में नकदी उनके आवास पर कैसे और क्यों मौजूद थी। प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार, बरामद नकदी की मात्रा लगभग 15 करोड़ रुपये थी, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। इस घटना ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना को एक आंतरिक जांच समिति गठित करने के लिए प्रेरित किया, जिसका नेतृत्व पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागु ने किया। इस समिति में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जी.एस. संधवालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जज जस्टिस अनु शिवरामन भी शामिल थीं।

इस तीन सदस्यीय आंतरिक जांच समिति ने दस दिनों तक गहन जांच की, जिसमें 55 गवाहों से पूछताछ की गई और घटनास्थल का दौरा किया गया। समिति ने अपने 64 पेज के विस्तृत प्रतिवेदन में निष्कर्ष निकाला कि स्टोररूम, जहां नकदी बरामद हुई, पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण था। समिति ने यह भी पाया कि जले हुए नोटों को अगली सुबह, यानी 15 मार्च को, स्टोररूम से हटाया गया था, जिसमें जस्टिस वर्मा के स्टाफ की संलिप्तता थी। केंद्रीय फॉरेंसिक साइंस प्रयोगशाला (सीएफएसएल) द्वारा सत्यापित वीडियो और तस्वीरों ने इस नकदी की मौजूदगी की पुष्टि की। समिति ने अपने निष्कर्ष में कहा कि यह कदाचार इतना गंभीर है कि जस्टिस वर्मा को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। इसके आधार पर, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश खन्ना ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह सिफारिश भेजी। जस्टिस वर्मा ने इन आरोपों का पुरजोर खंडन किया है।

उन्होंने दावा किया कि स्टोररूम एक सामान्य क्षेत्र था, जो उनके स्टाफ और अन्य लोगों के लिए सुलभ था, और नकदी उनके या उनके परिवार की नहीं थी। उन्होंने इन आरोपों को एक साजिश करार देते हुए जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनके अनुसार, जांच समिति ने उन्हें उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया, न ही सबूतों तक पहुंच प्रदान की। उन्होंने यह भी कहा कि सीसीटीवी फुटेज और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्यों को उनके सामने प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ। जस्टिस वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर इस जांच प्रक्रिया को असंवैधानिक और प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण करार देने की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और जांच के निष्कर्षों को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि जस्टिस वर्मा का आचरण “विश्वास को प्रेरित नहीं करता” और उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया।

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति अब इस मामले की औपचारिक जांच करेगी। इस समिति में शामिल जस्टिस अरविंद कुमार सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज हैं, जिन्हें पहले कर्नाटक हाईकोर्ट के अतिरिक्त जज और फिर गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया था। मुख्य न्यायाधीश मनिंदर मोहन श्रीवास्तव ने छत्तीसगढ़ और राजस्थान हाईकोर्ट में सेवा दी है और 2005 में वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित हुए थे। बी.वी. आचार्य, 88 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता, कर्नाटक हाईकोर्ट में 65 वर्षों से अधिक समय से प्रैक्टिस कर रहे हैं और पांच बार कर्नाटक के महाधिवक्ता रह चुके हैं।

उन्होंने तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में विशेष लोक अभियोजक के रूप में भी काम किया था। यह समिति जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत आरोपों की जांच करेगी और अपनी रिपोर्ट लोकसभा स्पीकर को सौंपेगी। महाभियोग की प्रक्रिया भारत में अत्यंत दुर्लभ और जटिल है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4) और 218 के तहत, सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज को “सिद्ध कदाचार या अक्षमता” के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत के साथ प्रस्ताव पारित करना आवश्यक है, जिसके बाद राष्ट्रपति द्वारा आदेश जारी किया जाता है। इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों या राज्यसभा में 50 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित एक प्रस्ताव की आवश्यकता होती है। इस मामले में, 146 सांसदों, जिसमें सत्तारूढ़ और विपक्षी दलों के सदस्य शामिल हैं, ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। इनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सुप्रिया सुले जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं।

जस्टिस वर्मा का मामला स्वतंत्र भारत में किसी हाईकोर्ट जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया का पहला उदाहरण हो सकता है। इससे पहले, 1993 में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन यह लोकसभा में पारित नहीं हो सका। 2011 में, कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित हुआ था, लेकिन लोकसभा में इसकी चर्चा से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।

जस्टिस वर्मा ने अभी तक इस्तीफा देने से इनकार किया है, जिसके कारण यह मामला संसद में औपचारिक रूप से आगे बढ़ रहा है। इस मामले ने न्यायपालिका की जवाबदेही और पारदर्शिता पर व्यापक बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में “रेस्टेटमेंट ऑफ वैल्यूज ऑफ ज्यूडिशियल लाइफ” को अपनाया था, जिसमें कहा गया है कि जजों से उच्च स्तर की सत्यनिष्ठा और नैतिकता की अपेक्षा की जाती है। जांच समिति ने अपने प्रतिवेदन में इस बात पर जोर दिया कि जनता का विश्वास न्यायपालिका की वैधता का आधार है, और जजों का आचरण इस विश्वास को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जस्टिस वर्मा के मामले में, नकदी की मौजूदगी और उसके बाद की घटनाओं ने इस विश्वास को कमजोर किया है, जिसे समिति ने गंभीर कदाचार माना है।

सोशल मीडिया पर भी इस मामले ने व्यापक चर्चा उत्पन्न की है। कुछ लोगों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है, जबकि अन्य ने जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। उदाहरण के लिए, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि जली हुई नकदी के वीडियो को जांच के दौरान सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए था, क्योंकि इससे जस्टिस वर्मा की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। इस बीच, कई लोगों ने इस मामले को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ा संदेश देने का अवसर माना है।

जांच समिति की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस मामले को संसदीय क्षेत्र में ला दिया है। यदि समिति आरोपों को सही पाती है, तो संसद में महाभियोग प्रस्ताव पर बहस होगी, और इसे दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित करना होगा। यह प्रक्रिया न केवल जटिल है, बल्कि यह न्यायपालिका और संसद के बीच नाजुक संतुलन को भी दर्शाती है। जस्टिस वर्मा के पास अभी भी इस्तीफा देने का विकल्प है, जिससे वे अपने रिटायरमेंट लाभों को बरकरार रख सकते हैं, लेकिन उनकी याचिका और सार्वजनिक बयानों से यह स्पष्ट है कि वे इस मामले में अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए लड़ना चाहते हैं।

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