ग्रामीण युवाओं और किसानों के लिए स्वरोजगार का सुनहरा मौका, बकरी, भेड़ और मुर्गी पालन व्यवसाय के लिए सरकार दे रही भारी सब्सिडी।
देश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी की समस्या से निपटने और कृषि क्षेत्र को अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में
- बिना भारी-भरकम पूंजी के शुरू करें अपना खुद का पशुपालन बिजनेस, राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत मिल रहा 50 प्रतिशत तक का सरकारी अनुदान
- नौकरी की चिंता छोड़कर अपनाएं कम लागत वाला यह सदाबहार कृषि पूरक व्यवसाय, बैंक लोन और मुफ्त प्रशिक्षण के साथ आत्मनिर्भर बनने की राह हुई आसान
देश के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी की समस्या से निपटने और कृषि क्षेत्र को अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में पशुपालन व्यवसाय एक अत्यंत मजबूत और व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरा है। वर्तमान समय में जहां पारंपरिक नौकरियों के अवसर सीमित हो रहे हैं, वहीं कृषि से जुड़े पूरक व्यवसायों में विकास की असीम संभावनाएं देखी जा रही हैं। भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा संचालित की जा रही 'पशुपालन अवसंरचना विकास कोष' और 'राष्ट्रीय पशुधन मिशन' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं ने इस क्षेत्र की सूरत पूरी तरह से बदल दी है। इन सरकारी पहलों का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण युवाओं, छोटे किसानों, सीमांत भूमिधारकों और महिलाओं को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करना है, जिससे वे बहुत ही न्यूनतम निवेश के साथ अपने ही गांव या घर से एक सफल और दीर्घकालिक स्वरोजगार की शुरुआत कर सकें।
इस पूरी व्यवस्था में सरकार केवल कागजी प्रोत्साहन देने तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर कंक्रीट वित्तीय और तकनीकी सहायता तंत्र उपलब्ध करा रही है। जो युवा या किसान बकरी पालन, भेड़ पालन या उन्नत मुर्गी पालन उद्योग में कदम रखना चाहते हैं, उन्हें केंद्र सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग द्वारा 50 प्रतिशत तक की सीधी कैपिटल सब्सिडी (पूंजीगत अनुदान) प्रदान की जा रही है। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि कोई उद्यमी इन व्यवसायों की स्थापना के लिए किसी बैंक से लोन लेता है, तो परियोजना की कुल लागत का आधा हिस्सा सरकार द्वारा सीधे तौर पर वहन किया जाता है। इसके अतिरिक्त, बची हुई आधी राशि के लिए बैंकों के माध्यम से बेहद सरल और कम ब्याज दरों पर ऋण की सुविधा सुनिश्चित की गई है, ताकि किसी भी इच्छुक व्यक्ति को आर्थिक तंगी के कारण अपना इरादा न बदलना पड़े।
पशुपालन के विभिन्न विकल्पों में बकरी पालन (Goat Farming) को लंबे समय से 'गरीब की गाय' और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का रीढ़ माना जाता रहा है, क्योंकि इसकी शुरुआत के लिए बहुत बड़ी जमीन या महंगे बुनियादी ढांचे की आवश्यकता नहीं होती है। बकरियों के भीतर विषम जलवायु परिस्थितियों को सहन करने की एक अद्भुत प्राकृतिक क्षमता होती है और वे बहुत ही कम एवं सामान्य चारे पर भी आसानी से जीवित रह सकती हैं। बाजार में मटन (बकरे का मांस) और बकरी के दूध की मांग हमेशा उच्च स्तर पर बनी रहती है, जिसके कारण पशुपालकों को अपने उत्पाद बेचने के लिए किसी बिचौलिए या दूर की मंडियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। सरकार विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय नस्लों जैसे कि ब्लैक बंगाल, बारबरी, जमुनापारी और सिरोही के संरक्षण और व्यावसायिक पालन के लिए विशेष रूप से अतिरिक्त अनुदान राशि भी जारी कर रही है। राष्ट्रीय पशुधन मिशन के तहत मिलने वाली 50 प्रतिशत तक की सब्सिडी का लाभ उठाने के लिए आवेदकों के पास स्वयं की या लीज पर ली गई न्यूनतम भूमि, पानी की उचित व्यवस्था और पशुओं के रहने के लिए शेड का बुनियादी लेआउट होना अनिवार्य है। इसके साथ ही, आवेदक को किसी सरकारी मान्यता प्राप्त संस्थान या कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से संबंधित पशुपालन विधा में न्यूनतम एक सप्ताह का प्रशिक्षण प्राप्त होना आवश्यक है, ताकि पशुओं के रखरखाव में किसी भी प्रकार की तकनीकी चूक न हो।
इसी प्रकार, भेड़ पालन (Sheep Farming) भी शुष्क, अर्ध-शुष्क और पहाड़ी क्षेत्रों के निवासियों के लिए एक अत्यंत लाभकारी और नियमित आय का एक ठोस जरिया साबित हो रहा है। भेड़ों से न केवल मांस प्राप्त होता है, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाली ऊन और चमड़े का उत्पादन भी होता है, जिसकी कपड़ा और कालीन उद्योगों में साल भर भारी मांग रहती है। सरकारी योजनाओं के अंतर्गत नस्ल सुधार कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिसके तहत पशुपालकों को उन्नत किस्म के नर भेड़ (मेढ़े) मुफ्त या बेहद रियायती दरों पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। भेड़ों के झुंड को पालने की लागत बकरियों की तुलना में भी कम आती है क्योंकि वे चराई के मैदानों में मिलने वाली सामान्य वनस्पतियों और झाड़ियों को खाकर भी तेजी से अपना वजन बढ़ा सकती हैं, जिससे किसानों का दैनिक फीडिंग खर्च लगभग शून्य हो जाता है।
इन दोनों के समानांतर, पोल्ट्री फार्मिंग यानी मुर्गी पालन व्यवसाय (Poultry Farming) ग्रामीण और अर्ध-शहरी दोनों ही क्षेत्रों के युवाओं के लिए एक तीव्र गति से बढ़ने वाला और अत्यधिक व्यावसायिक रूप से सफल मॉडल बन चुका है। मुर्गी पालन को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- ब्रायलर फार्मिंग (मांस उत्पादन के लिए) और लेयर फार्मिंग (अंडा उत्पादन के लिए)। देश में प्रोटीन की बढ़ती मांग के कारण दैनिक आधार पर अंडों और चिकन की खपत में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जिससे इस व्यवसाय में मंदी आने की संभावना न के बराबर रहती है। सरकारी योजनाएं विशेष रूप से 'बैकयार्ड पोल्ट्री फार्मिंग' को बढ़ावा दे रही हैं, जिसमें कम लागत वाली देसी नस्लों जैसे कि कड़कनाथ, असील और वनराजा की चूजों को पालने के लिए ग्रामीण महिलाओं को शत-प्रतिशत तक की वित्तीय सहायता और मुफ्त दवाएं प्रदान की जाती हैं।
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