Akbar in Textbook Controversy: कक्षा 7 की किताब में अकबर को 'महान' बताने पर विवाद, शिवाजी सेना ने संशोधन की मांग की

Class 7 History Textbook Row: सातवीं कक्षा की इतिहास पुस्तक में अकबर को महान बताए जाने पर शिवाजी सेना ने आपत्ति जताई है और पाठ्यक्रम में बदलाव की मांग की है।

Jul 20, 2026 - 12:59
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Akbar in Textbook Controversy: कक्षा 7 की किताब में अकबर को 'महान' बताने पर विवाद, शिवाजी सेना ने संशोधन की मांग की
Akbar Great Controversy and Shivaji Sena Objection
  • Class 7 History Book Row: इतिहास की पाठ्यपुस्तक में अकबर को महान लिखने पर भड़की शिवाजी सेना, शिक्षा विभाग को दी चेतावनी
  • स्कूल की किताब में अकबर को 'महान' बताने पर छिड़ा विवाद, संगठन ने दी आंदोलन की चेतावनी, जानें क्या है पूरा मामला
  • Textbook Controversy: इतिहास की पुस्तक में अकबर के विशेषण पर शिवाजी सेना की कड़ी आपत्ति, पाठ्यक्रम बदलने की मांग

देश के शैक्षणिक पाठ्यक्रम में इतिहास के प्रस्तुतीकरण को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सातवीं कक्षा की इतिहास की एक पाठ्यपुस्तक में मुगल शासक अकबर को 'महान' (Great) के रूप में संबोधित किए जाने पर दक्षिणपंथी संगठन शिवाजी सेना ने अपनी तीखी आपत्ति दर्ज कराई है। संगठन ने जुलाई 2026 में शिक्षा विभाग और संबंधित पाठ्यपुस्तक मंडल को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपकर इस संदर्भ को तुरंत हटाने तथा पाठ्यक्रम में आवश्यक संशोधन करने की पुरजोर मांग की है। शिवाजी सेना का तर्क है कि भारतीय इतिहास के महानायकों की अनदेखी कर विदेशी आक्रांताओं का महिमामंडन युवाओं को गलत संदेश दे रहा है। इस आपत्ति के बाद अब राज्य के शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है और आने वाले दिनों में इस पर एक उच्च स्तरीय समिति की बैठक बुलाए जाने की संभावना है।

यह पूरा मामला सातवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान (इतिहास) की वर्तमान शैक्षणिक सत्र की पाठ्यपुस्तक से जुड़ा हुआ है। इस पुस्तक के मध्यकालीन भारतीय इतिहास से संबंधित एक अध्याय में मुगल साम्राज्य के विस्तार और प्रशासनिक नीतियों का उल्लेख करते हुए अकबर के नाम के साथ 'महान' विशेषण का प्रयोग किया गया है। शिवाजी सेना के पदाधिकारियों की नजर जब इस पाठ पर पड़ी, तो उन्होंने इसे भारतीय संस्कृति और वास्तविक इतिहास के साथ खिलवाड़ करार दिया। संगठन का कहना है कि किसी भी ऐसे शासक को भारतीय स्कूली बच्चों की किताबों में महान नहीं पढ़ाया जाना चाहिए, जिसके शासनकाल में स्थानीय अस्मिता और संस्कृति को नुकसान पहुँचा हो।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब संगठन के कुछ सदस्यों ने शैक्षणिक सामग्री की समीक्षा के दौरान इस बिंदु को रेखांकित किया। इसके बाद शिवाजी सेना के प्रमुख पदाधिकारियों ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई, जिसमें सर्वसम्मति से इस शब्दावली का विरोध करने का निर्णय लिया गया।

रणनीति के तहत, संगठन के एक प्रतिनिधिमंडल ने शिक्षा निदेशक के कार्यालय का घेराव किया और उन्हें एक विस्तृत शिकायत पत्र सौंपा। शिवाजी सेना ने साफ किया है कि यदि आगामी 15 दिनों के भीतर पुस्तक के विवादित अंशों को संशोधित नहीं किया गया या डिजिटल माध्यमों से सुधार के निर्देश जारी नहीं किए गए, तो वे राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन और स्कूल स्तर पर धरना देने के लिए बाध्य होंगे।

इस संवेदनशील विषय पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं:

शिवाजी सेना का पक्ष: संगठन के मुख्य प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा, "हम अपने बच्चों को यह नहीं सिखा सकते कि हमारी धरती पर आक्रमण करने वाले महान थे। अगर विशेषण देना ही है, तो छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप और राजा चोल जैसे वीर योद्धाओं को दिया जाए। अकबर की नीतियों का निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए, न कि एकतरफा महिमामंडन।"

शिक्षा विभाग और शिक्षाविदों का रुख: मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने तात्कालिक तौर पर इस पर सीधी टिप्पणी करने से परहेज किया है। हालांकि, नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि पाठ्यक्रम का निर्माण विषय विशेषज्ञों और इतिहासकारों की एक स्वतंत्र समिति द्वारा किया जाता है। किसी भी बदलाव से पहले इतिहासकारों की राय और अकादमिक मानदंडों को ध्यान में रखना अनिवार्य होता है।

विपक्षी और अन्य बुद्धिजीवियों की राय: कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इतिहास को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय उसके तत्कालीन प्रशासनिक और सामाजिक सुधारों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

इस विवाद का सीधा असर मौजूदा शैक्षणिक सत्र के सुचारू संचालन पर पड़ सकता है। यदि यह गतिरोध लंबा खिंचता है, तो स्कूलों में मध्यकालीन इतिहास की कक्षाओं के निलंबन या अध्यायों को छोड़ने की नौबत आ सकती है। इसके अतिरिक्त, इस घटना ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर इतिहास के पुनर्लेखन और पाठ्यपुस्तकों के भगवाकरण बनाम धर्मनिरपेक्षता की पुरानी बहस को हवा दे दी है। सोशल मीडिया पर भी इस मांग के समर्थन और विरोध में विभिन्न धड़े सक्रिय हो गए हैं, जिससे सामाजिक विमर्श गरमा गया है।

शिवाजी सेना द्वारा दी गई समय-सीमा को देखते हुए यह स्पष्ट है कि गेंद अब पूरी तरह से शिक्षा मंत्रालय और पाठ्यपुस्तक समीक्षा बोर्ड के पाले में है। सूत्रों के मुताबिक, विभाग एक विशेष समीक्षा समिति (Review Committee) का गठन कर सकता है जो इस बात की जांच करेगी कि क्या पुस्तक में प्रयुक्त भाषा किसी भी तरह से पक्षपातपूर्ण है या तथ्यों से परे है। यदि समिति को लगता है कि जनभावनाओं और ऐतिहासिक संतुलन के लिहाज से बदलाव जरूरी है, तो पूरक निर्देश (Corrigendum) जारी कर इस शब्द को हटाया या बदला जा सकता है।

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