अहमदाबाद- 89 वर्षीय गुस्ताद बोरजोरजी इंजीनियर ने केयरटेकर की पोती को दी संपत्ति, 10 साल बाद मिला न्याय। 

Ahmedabad: अहमदाबाद में 89 वर्षीय गुस्ताद बोरजोरजी इंजीनियर की वसीयत ने एक अनोखी कहानी को सामने लाया, जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति ....

Aug 8, 2025 - 11:26
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अहमदाबाद- 89 वर्षीय गुस्ताद बोरजोरजी इंजीनियर ने केयरटेकर की पोती को दी संपत्ति, 10 साल बाद मिला न्याय। 
अहमदाबाद- 89 वर्षीय गुस्ताद बोरजोरजी इंजीनियर ने केयरटेकर की पोती को दी संपत्ति, 10 साल बाद मिला न्याय। 

अहमदाबाद में 89 वर्षीय गुस्ताद बोरजोरजी इंजीनियर की वसीयत ने एक अनोखी कहानी को सामने लाया, जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति अपनी केयरटेकर की पोती अमीषा मकवाना को सौंप दी। गुस्ताद का कोई कानूनी वारिस नहीं था, और उन्होंने अपने अंतिम दिनों में अमीषा के प्रति अपने स्नेह को व्यक्त करने के लिए यह निर्णय लिया। हालांकि, इस वसीयत को मंजूरी मिलने में 10 साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। अंततः, 2 अगस्त 2025 को अहमदाबाद की सिविल कोर्ट ने वसीयत को मंजूरी दे दी, और अमीषा को गुस्ताद का 159 वर्ग गज का फ्लैट मिल गया।

गुस्ताद बोरजोरजी इंजीनियर, जो टाटा इंडस्ट्रीज के पूर्व कर्मचारी थे, अहमदाबाद के शाहीबाग इलाके में रहते थे। उनकी पत्नी का निधन 2001 में हो गया था, और उनके कोई संतान नहीं थी। इस वजह से उनके पास कोई कानूनी वारिस नहीं था। गुस्ताद की देखभाल उनकी केयरटेकर, अमीषा मकवाना की दादी, करती थीं, जो उनके लिए खाना बनाती थीं। अमीषा, जो उस समय केवल 13 वर्ष की थी, अपनी दादी के साथ अक्सर गुस्ताद के घर आया करती थी। इस दौरान गुस्ताद और अमीषा के बीच एक गहरा स्नेहपूर्ण रिश्ता बन गया।

गुस्ताद ने अमीषा को अपनी बेटी की तरह माना और उसकी शिक्षा का जिम्मा भी लिया। उन्होंने अमीषा के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अपनी संपत्ति उसके नाम करने का फैसला किया। गुस्ताद ने कहा था कि वह अमीषा को गोद लेना चाहते थे, लेकिन उसका धर्म बदलना नहीं चाहते थे। इसीलिए, उन्होंने 12 जनवरी 2014 को दो गवाहों की मौजूदगी में एक वसीयत लिखी और उसे नोटराइज करवाया। इस वसीयत में उन्होंने अपने 159 वर्ग गज के फ्लैट को अमीषा के नाम कर दिया।

गुस्ताद का निधन 22 फरवरी 2014 को हो गया। उस समय अमीषा नाबालिग थी, इसलिए गुस्ताद ने अपने भतीजे बेहराम इंजीनियर को वसीयत का निष्पादक (एक्जीक्यूटर) नियुक्त किया था। बेहराम को अमीषा की देखभाल करने और वसीयत को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई थी, जब तक कि अमीषा बालिग न हो जाए। 2023 में, जब अमीषा बालिग हो गईं, उन्होंने वकील आदिल सैयद के माध्यम से अहमदाबाद सिविल कोर्ट में वसीयत को मंजूरी (प्रोबेट) के लिए आवेदन किया।

वसीयत को मंजूरी देने से पहले कोर्ट ने एक सार्वजनिक नोटिस जारी किया, जिसमें किसी भी व्यक्ति से आपत्ति दर्ज करने के लिए कहा गया। इस प्रक्रिया में कोई भी आपत्ति नहीं आई। गुस्ताद के भाई ने भी अमीषा के पक्ष में एक नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) दे दिया। इसके बाद, 2 अगस्त 2025 को कोर्ट ने वसीयत को मंजूरी दे दी और अमीषा के नाम उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (सक्सेशन सर्टिफिकेट) जारी किया। इस फैसले ने अमीषा को गुस्ताद की संपत्ति का कानूनी मालिक बना दिया।

हालांकि खबर में बताया गया कि वसीयत को मंजूरी में 7 साल की कानूनी लड़ाई चली, लेकिन विश्वसनीय स्रोतों के अनुसार, यह प्रक्रिया 2014 से 2023 तक यानी करीब 10 साल तक चली। इस दौरान कई कारणों से देरी हुई। पहला, अमीषा उस समय नाबालिग थीं, इसलिए वसीयत को लागू करने के लिए उनकी बालिग होने तक इंतजार करना पड़ा। दूसरा, कोर्ट को यह सुनिश्चित करना था कि वसीयत वैध है और इसमें कोई धोखाधड़ी नहीं हुई। तीसरा, सार्वजनिक नोटिस और आपत्तियों की जांच की प्रक्रिया में समय लगा।

इसके अलावा, भारतीय कानून में संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े मामले अक्सर जटिल हो जाते हैं, खासकर जब कोई कानूनी वारिस न हो। गुस्ताद की वसीयत में यह स्पष्ट था कि वह अपनी संपत्ति अमीषा को देना चाहते थे, लेकिन कोर्ट को यह सुनिश्चित करना था कि सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी हों। इस प्रक्रिया में वसीयत की प्रामाणिकता, गवाहों के बयान, और गुस्ताद के परिवार के अन्य सदस्यों की सहमति की जांच शामिल थी।

अमीषा, जो अब एक निजी कंपनी के मानव संसाधन विभाग में काम करती हैं, गुस्ताद के साथ अपने रिश्ते को बड़े स्नेह से याद करती हैं। उन्होंने बताया, "मैं उन्हें 'ताई' कहकर बुलाती थी। वह मुझे अपनी बेटी की तरह मानते थे।" अमीषा ने कहा कि गुस्ताद ने हमेशा उनकी पढ़ाई और भविष्य की चिंता की। वह चाहते थे कि अमीषा आत्मनिर्भर बने। इसीलिए उन्होंने अपनी संपत्ति उसके नाम कर दी, ताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो।

अमीषा की दादी, जो गुस्ताद के परिवार के लिए लंबे समय तक काम करती थीं, ने भी इस रिश्ते को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी देखभाल और समर्पण ने गुस्ताद के मन में अमीषा के लिए एक खास जगह बनाई। यह रिश्ता खून का नहीं, बल्कि विश्वास और स्नेह का था, जो इस कहानी को और भी खास बनाता है।

यह मामला भारतीय समाज और कानूनी व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। भारत में संपत्ति का उत्तराधिकार आमतौर पर खून के रिश्तों पर आधारित होता है, लेकिन गुस्ताद की वसीयत ने दिखाया कि स्नेह और विश्वास भी उतने ही महत्वपूर्ण हो सकते हैं। कोर्ट के फैसले ने इस बात को मान्यता दी कि एक व्यक्ति अपनी संपत्ति उस व्यक्ति को दे सकता है, जिसे वह अपने परिवार का हिस्सा मानता है, भले ही वह खून का रिश्तेदार न हो।

इसके अलावा, यह मामला वसीयत के महत्व को भी रेखांकित करता है। गुस्ताद ने अपनी मृत्यु से पहले वसीयत लिखकर यह सुनिश्चित किया कि उनकी इच्छा का सम्मान हो। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता, तो उनकी संपत्ति का बंटवारा कानूनी रूप से जटिल हो सकता था। यह कहानी लोगों को यह भी प्रेरित करती है कि वे अपनी संपत्ति के लिए समय रहते वसीयत बनाएं।

गुस्ताद बोरजोरजी इंजीनियर और अमीषा मकवाना की कहानी एक मिसाल है कि स्नेह और विश्वास खून के रिश्तों से बढ़कर हो सकते हैं। 10 साल की कानूनी प्रक्रिया के बाद अमीषा को वह संपत्ति मिली, जो गुस्ताद ने उनके लिए छोड़ी थी। यह मामला न केवल एक व्यक्तिगत कहानी है, बल्कि यह समाज को यह संदेश भी देता है कि मानवीय रिश्तों का आधार विश्वास और प्यार हो सकता है।

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