मुंबई एयरपोर्ट के पास नमाज शेड विवाद: बॉम्बे हाई कोर्ट में सरकार ने सुरक्षा कारण बताए।

मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के घरेलू टर्मिनल के निकट एक लंबे समय से चले आ रहे विवाद ने बॉम्बे हाई कोर्ट

Feb 27, 2026 - 14:54
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मुंबई एयरपोर्ट के पास नमाज शेड विवाद: बॉम्बे हाई कोर्ट में सरकार ने सुरक्षा कारण बताए।
मुंबई एयरपोर्ट के पास नमाज शेड विवाद: बॉम्बे हाई कोर्ट में सरकार ने सुरक्षा कारण बताए।
  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने MMRDA को वैकल्पिक स्थान की तलाश का निर्देश दिया, सुनवाई 5 मार्च तक स्थगित
  • एयरपोर्ट परिसर में नमाज के लिए अस्थायी शेड की मांग, आसपास तीन मस्जिदें होने का हवाला दिया गया

मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के घरेलू टर्मिनल के निकट एक लंबे समय से चले आ रहे विवाद ने बॉम्बे हाई कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया है। यह मामला ऑटोरिक्शा, टैक्सी और ऐप-आधारित कैब चालकों द्वारा रमजान के दौरान नमाज अदा करने के लिए अस्थायी प्रार्थना शेड की मांग से जुड़ा है। याचिकाकर्ता टैक्सी-रिक्शा ओला-उबर मेन्स यूनियन ने दावा किया कि यह सुविधा लगभग तीन दशकों से उपलब्ध थी, लेकिन अप्रैल 2025 में मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण द्वारा इसे अचानक हटा दिया गया। यूनियन का कहना है कि एयरपोर्ट पर लंबे समय तक खड़े रहने वाले हजारों मुस्लिम चालक और यात्री इस सुविधा पर निर्भर थे, और इसकी कमी से उनकी धार्मिक प्रथा प्रभावित हो रही है। मामला जनवरी 2026 में कोर्ट में पहुंचा, जहां यूनियन ने मौलिक अधिकारों की रक्षा की मांग की।

बॉम्बे हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस बर्गेस कोलाबावाला और जस्टिस फिरदोश पूनीवाला शामिल हैं, ने इस मामले की सुनवाई की। शुरुआती सुनवाई में कोर्ट ने मानवीय आधार पर विचार करने की सलाह दी और MMRDA से एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा कि क्या अस्थायी शेड की अनुमति दी जा सकती है। यूनियन ने बताया कि पहले यह शेड एयरपोर्ट की परिधि में स्थित था, जहां रोजाना लगभग 2000 लोग नमाज अदा करते थे। इसे हटाने के बाद कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, जिससे चालकों को असुविधा हो रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाएगा, लेकिन मानवीय पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

26 फरवरी 2026 को हुई नवीनतम सुनवाई में महाराष्ट्र सरकार और MMRDA ने अपना पक्ष रखा। सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कहा कि एयरपोर्ट परिसर में अस्थायी शेड की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यहां वीवीआईपी आवागमन नियमित रूप से होता है और संवेदनशील स्थान होने के कारण कोई जोखिम नहीं उठाया जा सकता। अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चावन ने कोर्ट को बताया कि एयरपोर्ट क्षेत्र के आसपास कम से कम तीन मस्जिदें मौजूद हैं, जो पैदल दूरी में उपलब्ध हैं। गूगल मैप्स के अनुसार, इनमें से कुछ मस्जिदें मात्र 13 मिनट की पैदल दूरी पर हैं और पूरी तरह कार्यरत हैं। इसलिए अलग से प्रार्थना शेड की आवश्यकता नहीं है।

सरकार ने आगे स्पष्ट किया कि पहले मौजूद शेड को सुरक्षा चिंताओं के आधार पर हटाया गया था। एयरपोर्ट परिसर में किसी भी अस्थायी संरचना को अनुमति देने से संभावित जोखिम बढ़ सकता है, खासकर रमजान के दौरान जब भीड़ अधिक होती है। MMRDA ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि आसपास की मस्जिदें न केवल निकट हैं, बल्कि चालकों और यात्रियों के लिए सुविधाजनक विकल्प प्रदान करती हैं। इस आधार पर सरकार ने याचिका का विरोध किया और कहा कि विशेषाधिकार की मांग उचित नहीं है। कोर्ट ने इस दलील को सुना, लेकिन सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार और MMRDA को निर्देश दिया कि वे एयरपोर्ट के आसपास कोई वैकल्पिक स्थान चिह्नित करें, जहां चालक और यात्री रमजान के दौरान नमाज अदा कर सकें। कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए, लेकिन मानवीय आधार पर कोई समाधान निकाला जा सकता है। बेंच ने स्पष्ट किया कि एयरपोर्ट परिसर के भीतर शेड की अनुमति मुश्किल है, लेकिन निकटवर्ती क्षेत्र में कोई व्यवस्था संभव हो सकती है। इस संबंध में MMRDA और राज्य सरकार को सुरक्षा पहलुओं की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया। मामला अब 5 मार्च 2026 को आगे की सुनवाई के लिए स्थगित कर दिया गया है, जब वैकल्पिक साइट की जानकारी दी जाएगी।

यह विवाद धार्मिक स्वतंत्रता, सार्वजनिक सुरक्षा और प्रशासनिक नीतियों के बीच टकराव को दर्शाता है। यूनियन का तर्क है कि लंबे समय तक काम करने वाले चालकों के लिए ऐसी सुविधा आवश्यक है, क्योंकि वे एयरपोर्ट पर घंटों इंतजार करते हैं। वहीं, सरकार का फोकस एयरपोर्ट की संवेदनशीलता पर है, जहां किसी भी अतिरिक्त गतिविधि से खतरा हो सकता है। आसपास की मस्जिदों का उल्लेख करके सरकार ने तर्क दिया कि धार्मिक जरूरतें पूरी की जा सकती हैं बिना परिसर में हस्तक्षेप के। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनते हुए मध्य मार्ग अपनाने की कोशिश की है।

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