TMC में टूट का सिलसिला जारी, ममता बनर्जी को बड़ा झटका, 20 बागी सांसदों ने एनडीए (NDA) को दिया समर्थन
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बीते 15 वर्षों से सत्ता की धुरी रही तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट
- दिल्ली में 'खेला' पूरा हुआ, टीएमसी के बागी सांसदों ने त्रिपुरा की 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी' में किया विलय
- लोकसभा स्पीकर से अलग बैठने की मांग, भाजपा सरकार को बहुमत के करीब पहुंचाने की कवायद शुरू
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बीते 15 वर्षों से सत्ता की धुरी रही तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में रविवार का दिन एक बड़ी उथल-पुथल लेकर आया, जब टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के नेतृत्व को सीधे चुनौती देते हुए बगावत का बिगुल फूंक दिया। इन सांसदों ने न केवल पार्टी से अपना नाता तोड़ने का औपचारिक ऐलान किया, बल्कि त्रिपुरा स्थित एक क्षेत्रीय दल, 'नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी' (NCPI) के साथ अपने विलय की घोषणा कर सभी को चौंका दिया। इस कदम के साथ ही उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात कर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था करने और सत्ताधारी एनडीए गठबंधन को अपना समर्थन देने का लिखित प्रस्ताव सौंपा है।
इस राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे की रणनीति बेहद सोची-समझी है। दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) से बचने के लिए किसी भी पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों का एक साथ अलग होना अनिवार्य होता है। टीएमसी के पास लोकसभा में कुल 28 सांसद हैं, जिनमें से 20 सांसदों के बागी होने का दावा किया गया है। यह संख्या पार्टी की कुल संख्या का दो-तिहाई से अधिक है, जिसके कारण इन सांसदों पर अयोग्यता की तलवार नहीं लटकेगी। बागी गुट का नेतृत्व चार बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं। उनके साथ वरिष्ठ नेता सुदीप बंदोपाध्याय सहित कई दिग्गज चेहरे शामिल हैं, जिन्होंने शनिवार को केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई गोपनीय बैठक के बाद अपनी रणनीति को अंतिम रूप दिया। एनडीए खेमे के लिए यह बगावत अत्यंत महत्वपूर्ण है। आगामी मानसून सत्र में सरकार कई अहम संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश करने की तैयारी में है, जिनके लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। टीएमसी के इन 20 सांसदों के आने से एनडीए को संसद के दोनों सदनों में अपनी विधायी ताकत बढ़ाने में बड़ी मदद मिलेगी।
ममता बनर्जी के लिए यह झटका केवल लोकसभा तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल विधानसभा में भी पार्टी की स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई है। हाल ही में संपन्न हुए 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में हार के बाद, टीएमसी के 80 नवनिर्वाचित विधायकों में से करीब 60 विधायकों ने पहले ही बगावत कर दी थी। इन बागी विधायकों ने निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता प्रतिपक्ष नियुक्त कर दिया है। विधानसभा में हुई इस टूट के बाद अब संसद में सांसदों का एनडीए के साथ जाना, ममता बनर्जी की पार्टी के उस 'पतन' को प्रदर्शित करता है, जिसकी चर्चा पिछले कुछ हफ्तों से राजनीतिक हल्कों में तेज थी।
पार्टी के भीतर इस बगावत के पीछे मुख्य कारणों में वंशवाद की राजनीति और आंतरिक असंतोष को जिम्मेदार माना जा रहा है। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का पार्टी में तेजी से बढ़ता कद और उन्हें उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने की कोशिशों ने पुराने वफादार नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया था। इसके अलावा, हालिया विधानसभा चुनावों में करारी हार और पार्टी के भीतर 'हस्ताक्षर जालसाजी' के आरोपों ने नेतृत्व की साख को गहरा नुकसान पहुंचाया। अभिषेक बनर्जी को जब इस मामले में सीआईडी (CID) के समक्ष पेश होने का समन मिला, तो पार्टी के भीतर मची भगदड़ और तेज हो गई, जिससे कई सांसद सुरक्षित भविष्य की तलाश में भाजपा और एनडीए की ओर झुक गए।
दूसरी ओर, टीएमसी नेतृत्व ने इस बगावत को अवैध करार दिया है। अभिषेक बनर्जी की ओर से लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि टीएमसी को एक अखंड पार्टी माना जाए और किसी भी बागी गुट को कोई आधिकारिक मान्यता या अलग बैठने की सुविधा न दी जाए। पार्टी के वफादार सांसदों, कीर्ति आजाद और सागरिका घोष ने स्पीकर से मुलाकात कर यह दलील दी है कि संवैधानिक रूप से ऐसा कोई विभाजन मान्य नहीं है। हालांकि, बागी गुट का कहना है कि वे अभी एक क्षेत्रीय पार्टी में विलय कर रहे हैं, लेकिन जुलाई में शुरू होने वाले संसद सत्र के दौरान वे खुद को ही 'असली टीएमसी' के रूप में मान्यता देने की मांग करेंगे।
दिल्ली में चल रहे इस सियासी खेल के बीच भाजपा की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। बागी सांसदों की केंद्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ भाजपा नेताओं के साथ लगातार बैठकें इस बात का संकेत हैं कि सत्ताधारी दल इस पूरे घटनाक्रम को करीब से मॉनिटर कर रहा है। हालांकि, भाजपा आधिकारिक तौर पर इसे टीएमसी का आंतरिक मामला बता रही है, लेकिन जिस तरह से त्रिपुरा की एक छोटी पार्टी के साथ विलय का 'मैकेनिज्म' अपनाया गया है, उससे यह स्पष्ट है कि इसके पीछे एक सुनियोजित कानूनी और राजनीतिक रणनीति काम कर रही है। अब सबकी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय और आगामी अदालती कार्यवाही पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि 'असली टीएमसी' का झंडा किसके हाथ में होगा।
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