हार के बाद TMC विधायकों की सामूहिक गैरहाजिरी से उपजे गंभीर सवाल, 80 में से सिर्फ 19 से 20 विधायक ही पहुंचे कोलकाता।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित और चौंकाने वाले परिणामों के बाद राज्य की राजनीति में लगातार उथल-पुथल
- पश्चिम बंगाल में करारी शिकस्त के बाद तृणमूल कांग्रेस में बढ़ी हलचल, कालीघाट में ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई समीक्षा बैठक अचानक रद्द
- तनावपूर्ण जमीनी हालातों के बीच स्थगित करनी पड़ी तृणमूल विधायक दल की बैठक, कुणाल घोष ने सुरक्षा कारणों और कार्यकर्ताओं के साथ खड़े रहने को बताया मुख्य वजह
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित और चौंकाने वाले परिणामों के बाद राज्य की राजनीति में लगातार उथल-पुथल का दौर जारी है। चुनावी मैदान में भारी पराजय का सामना करने के बाद तृणमूल कांग्रेस की सर्वोच्च नेता ममता बनर्जी ने रविवार को कोलकाता के कालीघाट स्थित अपने आवास पर एक बेहद महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक बुलाई थी। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य चुनाव में मिली करारी शिकस्त के कारणों की गहन समीक्षा करना और भविष्य की रणनीति तैयार करना था। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में उस समय भारी अचरज देखा गया जब यह हाई-प्रोफाइल बैठक तय समय पर शुरू होने से ठीक पहले अचानक रद्द कर दी गई। इस घटनाक्रम ने राज्य के राजनीतिक तापमान को और बढ़ा दिया है, क्योंकि चुनावी नतीजों के तुरंत बाद इस तरह की महत्वपूर्ण सांगठनिक बैठक का टलना सामान्य नहीं माना जा रहा है।
बैठक रद्द होने के पीछे की सबसे बड़ी वजह नवविर्वाचित विधायकों की बेहद कम उपस्थिति को माना जा रहा है, जिसने पार्टी नेतृत्व के सामने एक असहज स्थिति पैदा कर दी। राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से इस बार तृणमूल कांग्रेस के केवल 80 उम्मीदवार ही जीत दर्ज करने में सफल हो सके हैं, और हैरान करने वाली बात यह रही कि इन 80 विधायकों में से महज 19 से 20 विधायक ही कालीघाट पहुंचे थे। लगभग तीन-चौथाई विधायकों की इस सामूहिक अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर और बाहर कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया है। हालांकि, कमान संभालने वाले वरिष्ठ नेताओं ने इस कम उपस्थिति को लेकर मचे राजनीतिक बवाल को शांत करने की कोशिश की, लेकिन इतने बड़े संकट के समय शीर्ष नेतृत्व के बुलावे पर विधायकों का न पहुंचना अंदरूनी तालमेल पर सवाल खड़े करता है।
इस पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हुए तृणमूल कांग्रेस के विधायक, आधिकारिक प्रवक्ता और राज्य महासचिव कुणाल घोष ने मीडिया के सामने आकर बैठक स्थगित होने की प्रशासनिक वजहों को सामने रखा। उनके अनुसार, यह बैठक किसी अंदरूनी मतभेद के कारण नहीं, बल्कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अचानक पैदा हुए बेहद तनावपूर्ण और आपातकालीन हालातों की वजह से टाली गई है। विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से लगातार आ रही हिंसक झड़पों और हमलों की खबरों के कारण ज्यादातर विधायक अपने-अपने इलाकों से बाहर नहीं निकल पाए और समय पर कोलकाता पहुंचने में असमर्थ रहे। ऐसी विकट परिस्थिति में विधायकों को यह निर्देश दिया गया कि वे राजधानी आने के बजाय अपने निर्वाचन क्षेत्रों में ही मौजूद रहें ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति को संभाला जा सके। अनुपस्थित रहने वाले सभी विधायकों को संगठनात्मक स्तर पर यह स्पष्ट जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे जमीनी स्तर पर अपने क्षेत्रों में डटे रहें। उन्हें अपने-अपने इलाकों में सक्रिय रहकर सुरक्षा व्यवस्था पर नजर रखने, संकट का सामना कर रहे पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के साथ मजबूती से खड़े होने और उनके मनोबल को बनाए रखने के लिए निरंतर काम करने को कहा गया है।
दरअसल, इस बार के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को अपने इतिहास की सबसे करारी और ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा है, जिसने पार्टी के पंद्रह साल पुराने शासन को पूरी तरह उखाड़ फेंका। इस बार के चुनाव में विपक्षी खेमे ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए 208 सीटों पर एकतरफा और प्रचंड जीत हासिल कर स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाने का गौरव प्राप्त किया है। इसके विपरीत, राज्य की सत्ता पर लंबे समय से काबिज रहने वाली तृणमूल कांग्रेस महज 80 सीटों के बेहद संकुचित आंकड़े पर आकर सिमट गई है। इस विशाल राजनीतिक उलटफेर और सत्ता हाथ से खिसक जाने के बाद से ही पार्टी के भीतर हताशा और निराशा का माहौल गहरा गया है, जिससे उबरने के लिए शीर्ष नेतृत्व को काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।
इस अप्रत्याशित पराजय के गहरे सदमे से उबरने और पार्टी संगठन को बिखरने से बचाने के लिए ममता बनर्जी लगातार सक्रिय हैं और हर हफ्ते मैराथन समीक्षा बैठकें आयोजित कर रही हैं। इन साप्ताहिक बैठकों का सिलसिला बेहद कड़े और अनुशासनिक माहौल में चलाया जा रहा है, जिसमें कभी चुनाव जीतकर आए सीमित विधायकों को बुलाया जाता है, तो कभी चुनाव हार चुके दिग्गज नेताओं को आमने-सामने बिठाकर चर्चा की जाती है। इन गंभीर चर्चाओं के दौरान प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के बूथ-स्तरीय आंकड़ों को खंगाला जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि परंपरागत वोट बैंक में इतनी बड़ी सेंधमारी कैसे हुई और पार्टी की नीतियां जनता के बीच निष्प्रभावी क्यों साबित हुईं।
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