पश्चिम बंगाल में दो शीर्ष राजनेताओं पर हुए हिंसक हमलों के बाद पुलिसिया कार्रवाई तेज, सीसीटीवी और वीडियो फुटेज के आधार पर पांच लोग गिरफ्तार।
पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के बाद पैदा हुए राजनीतिक तनाव के बीच दो बेहद प्रमुख जनप्रतिनिधियों
- सोनारपुर और हुगली में सिलसिलेवार पथराव के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल, स्वतः संज्ञान लेकर दर्ज की गई प्राथमिक रिपोर्ट
- आंतरिक गुटबाजी और राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों के बीच उलझी जांच प्रक्रिया, जख्मी नेताओं को अस्पताल में भर्ती कराने को लेकर भी बढ़ा भारी विवाद
पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के बाद पैदा हुए राजनीतिक तनाव के बीच दो बेहद प्रमुख जनप्रतिनिधियों पर हुए हमलों ने राज्य के कानून-व्यवस्था परिदृश्य को पूरी तरह से गरमा दिया है। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और पार्टी के वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी को अलग-अलग घटनाओं में हिंसक भीड़ और पथराव का सामना करना पड़ा है। इन हाई-प्रोफाइल मामलों की गंभीरता को देखते हुए राज्य पुलिस प्रशासन तुरंत हरकत में आया है और जांच के शुरुआती चरणों में ही बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया गया है। विभिन्न घटनास्थलों से प्राप्त वीडियो साक्ष्यों और डिजिटल तकनीकी इनपुट के आधार पर कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने अब तक पांच स्थानीय निवासियों को आधिकारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया है, जबकि कई अन्य संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ का सिलसिला जारी है।
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर थाना क्षेत्र से हुई, जहां एक पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे काफिले को अचानक हिंसक विरोध का सामना करना पड़ा। चूंकि पीड़ित जनप्रतिनिधि की तरफ से तुरंत कोई औपचारिक लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी, इसलिए स्थानीय सोनारपुर पुलिस स्टेशन ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए एक आपराधिक मामला दर्ज किया। इसके तुरंत बाद पुलिस की विशेष टीमों ने सोशल मीडिया और क्षेत्रीय टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित हो रहे वीडियो फुटेज को खंगालना शुरू किया। तकनीकी विश्लेषण और चश्मदीदों के बयानों के आधार पर पांच मुख्य आरोपियों की पहचान की गई, जिन्हें देर रात चले एक विशेष धरपकड़ अभियान के दौरान उनके आवासीय ठिकानों से दबोच लिया गया।
पकड़े गए आरोपियों की शिनाख्त के बाद इस पूरे मामले में एक बहुत ही पेचीदा और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है, जिसने जांच की दिशा को एक नई बहस में धकेल दिया है। गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों में निर्मल्या सेनगुप्ता उर्फ जॉय, आकाश गायन, काजल दास, देवाशीष दत्ता और तपन मैती शामिल हैं। इसमें सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि गिरफ्तार आरोपी निर्मल्या सेनगुप्ता कथित तौर पर उसी राजनीतिक संगठन की युवा इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष है, जिसके शीर्ष नेता पर हमला हुआ था। इस खुलासे के बाद जहां एक तरफ इसे पार्टी के भीतर की आपसी कलह और आंतरिक गुटबाजी का नतीजा बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ डिजिटल साक्ष्य यह भी दिखाते हैं कि पकड़े गए अन्य आरोपियों के तार विपक्षी राजनीतिक दलों के स्थानीय विधायकों और उनकी रैलियों से जुड़े हुए थे। पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, गिरफ्तार किए गए सभी पांचों आरोपियों को स्थानीय अदालत में पेश कर पुलिस रिमांड पर ले लिया गया है। जांच टीम इस बात का पता लगाने में जुटी है कि क्या इस हमले के पीछे कोई सुनियोजित बड़ी राजनीतिक साजिश थी या यह चुनाव परिणामों के बाद उपजा एक तात्कालिक सार्वजनिक आक्रोश था।
सोनारपुर की इस हिंसक घटना के ठीक अगले ही दिन हुगली जिले के चंडीतल्ला इलाके में भी इसी तरह का एक और दुस्साहसिक हमला देखने को मिला। वहां एक आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे वरिष्ठ सांसद और मुख्य सचेतक कल्याण बनर्जी को एक उग्र भीड़ ने घेर लिया, जो लगातार नारेबाजी कर रही थी। चंडीतल्ला पुलिस स्टेशन से मात्र पंद्रह मीटर की दूरी पर हुए इस हमले में उपद्रवियों ने सीधे उनके सिर को निशाना बनाकर एक भारी और सख्त वस्तु हवा में उछाली। यह अज्ञात वस्तु सीधे उनके सिर पर जाकर लगी, जिसके कारण वे गंभीर रूप से चोटिल होकर वहीं जमीन पर बैठ गए। इस घटना के बाद सुरक्षा बलों को स्थिति पर काबू पाने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा और घायल सांसद को तुरंत प्राथमिक उपचार के लिए ले जाया गया।
इन हमलों के बाद पैदा हुए विवाद ने उस समय एक और गंभीर रूप अख्तियार कर लिया जब घायल नेताओं के इलाज और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने को लेकर गंभीर प्रशासनिक अड़चनों की बातें सामने आईं। कोलकाता के दो बड़े निजी चिकित्सा संस्थानों द्वारा घायल नेता को तुरंत दाखिला देने से मना करने के बाद यह आरोप लगाया गया कि स्थानीय पुलिस प्रशासन और सत्ताधारी तंत्र द्वारा डॉक्टरों तथा अस्पताल प्रबंधन पर अनुचित दबाव बनाया जा रहा था। इस विवाद के बीच चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े नियमों का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि किसी भी मरीज के इलाज, उसकी जांच और उसे अस्पताल में भर्ती करने या न करने का पूर्ण विशेषाधिकार केवल डॉक्टरों के पास होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक या प्रशासनिक बल के पास।
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