'1, 2 के बाद 3 आता है भाई...' रिजिजू के 'दिमागी नक्सल' वाले पोस्ट पर कांग्रेस ने यूं ली चुटकी, छिड़ी तीखी बहस
किरेन रिजिजू द्वारा 'दिमागी नक्सल' की परिभाषा में 1, 2 के बाद 4 लिखने पर कांग्रेस ने तंज कसा है। पवन खेड़ा और जयराम रमेश ने रिजिजू की पोस्ट पर तीखी प्रतिक्रिया दी।

- 'दिमागी नक्सल' विवाद: किरेन रिजिजू के 1, 2 के बाद 4 वाले पोस्ट पर कांग्रेस का तीखा तंज, जानिए पूरा मामला
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में 'दिमागी नक्सल' शब्द के इस्तेमाल के बाद शुरू हुआ राजनीतिक विवाद अब और गहरा गया है। इस टिप्पणी के बचाव में केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा सोशल मीडिया मंच एक्स पर की गई एक पोस्ट पर कांग्रेस पार्टी ने जोरदार पलटवार किया है। रिजिजू ने स्पष्टीकरण देते हुए उन श्रेणियों को रेखांकित किया था जिन्हें सरकार इस दायरे में रखती है, लेकिन उनकी पोस्ट में 1 और 2 के बाद सीधे 4 नंबर दर्ज होने के कारण यह सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा और जयराम रमेश ने इस तकनीकी चूक पर तंज कसते हुए सरकार की राजनीतिक मंशा और परिभाषाओं पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच शब्दों और विचारधारा को लेकर शुरू हुई यह तकरार अब संसद से लेकर सोशल मीडिया के हर मंच पर तीव्र रूप ले चुकी है।
देश के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन के दौरान 'दिमागी नक्सल' शब्द का उल्लेख किया था। प्रधानमंत्री का कहना था कि देश में हथियारों से लड़ने वाले नक्सलियों पर काफी हद तक काबू पा लिया गया है, लेकिन समाज और नीति निर्माण के विभिन्न स्तरों पर सक्रिय वैचारिक नक्सलियों की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करना जरूरी है।
इस बयान पर जब विपक्षी दलों ने आपत्ति जताई और इसे असहमति की आवाज दबाने का प्रयास करार दिया, तो केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सफाई पेश की। रिजिजू ने एक्स पर पोस्ट करते हुए स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का इशारा विपक्षी दलों के नेताओं की तरफ नहीं था, बल्कि उन तत्वों की ओर था जो माओवादियों का समर्थन करते हैं, संविधान को नहीं मानते, अलगाववादियों का साथ देते हैं या देश की संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने की मंशा रखते हैं। हालांकि, रिजिजू की इस पोस्ट की नंबरिंग में 1 और 2 के बाद सीधे 4 दर्ज होने के कारण कांग्रेस नेताओं ने इसे आड़े हाथों ले लिया।
विवाद की शुरुआत तब हुई जब किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया पर 'दिमागी नक्सल' की अपनी व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने लिखा कि जो लोग माओवाद का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान में आस्था नहीं रखते, जो अलगाववादियों के साथ खड़े होकर अनुच्छेद 370 की वकालत करते हैं और जो चिकन नेक को काटकर पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की बात करते हैं, केवल वही इस श्रेणी में आते हैं। अपनी बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने एक पुराना वीडियो भी साझा किया।
रिजिजू की इस पोस्ट में तीसरे बिंदु की संख्या गायब थी और क्रम संख्या 2 के बाद सीधे संख्या 4 लिखी हुई थी। इस त्रुटि को देखते ही कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने पोस्ट का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए लिखा कि पहले अपनी गिनती दुरुस्त कर लीजिए, उसके बाद जवाब दिया जाएगा, क्योंकि 1 और 2 के बाद 3 आता है, 4 नहीं। इसके तुरंत बाद कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी इस पर चुटकी लेते हुए टिप्पणी की और इसे पूर्व के राजनीतिक संदर्भों से जोड़ते हुए तंज कसा।
इस पूरे मामले पर दोनों पक्षों के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिल रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि उन्हें 'दिमागी नक्सल' होने पर गर्व है।
वहीं जयराम रमेश ने सरकार के रुख की आलोचना करते हुए याद दिलाया कि पूर्व में संसद के भीतर सरकार ने स्पष्ट किया था कि 'अर्बन नक्सल' जैसी कोई वैधानिक परिभाषा गृह मंत्रालय के पास नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों और आलोचकों को पहले बदनाम करने के लिए नए-नए शब्द गढ़ती है और बाद में उन्हीं मुद्दों को अपनी नीतियों में शामिल कर लेती है।
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों ने प्रधानमंत्री और रिजिजू के रुख का मजबूती से समर्थन किया है। सत्तापक्ष का तर्क है कि देश विरोधी ताकतों और राष्ट्रीय अखंडता को चुनौती देने वाले वैचारिक तंत्र के खिलाफ राष्ट्र को आगाह करना आवश्यक है। भाजपा नेताओं ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े गंभीर मुद्दों पर गंभीरता दिखाने के बजाय तकनीकी और मामूली बातों पर ध्यान भटकाने की राजनीति कर रहा है।
'अर्बन नक्सल' के बाद अब 'दिमागी नक्सल' शब्द का भारतीय राजनीति के विमर्श में केंद्र बिंदु बनना यह दर्शाता है कि विचारधारा की लड़ाई आने वाले दिनों में और तीखी होगी। इस विवाद ने राष्ट्रीय सुरक्षा, असहमति के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की रेखा को लेकर एक बार फिर सार्वजनिक बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों का मानना है कि ऐसे शब्दों का उपयोग कर लोकतांत्रिक विरोध को देशविरोधी मानसिकता के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है, जबकि सरकार का कहना है कि यह केवल उन अतिवादी विचारों के खिलाफ एक चेतावनी है जो संस्थागत ढांचे को भीतर से कमजोर करने का काम करते हैं।
आगामी समय में इस वैचारिक टकराव के शांत होने के आसार कम दिखाई दे रहे हैं। संसद के आगामी सत्रों और विभिन्न राज्यों में होने वाले चुनावों के दौरान यह मुद्दा भाषणों और प्रचार अभियानों में प्रमुखता से गूंज सकता है। दोनों ही प्रमुख दल इस मुद्दे के जरिए अपने-अपने समर्थक आधार को लामबंद करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। विपक्ष इसे सत्ता पक्ष की असहिष्णुता और हताशा के रूप में पेश करने की योजना बना रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के प्रति अपनी जीरो-टॉलरेंस नीति के रूप में जनता के सामने रखेगा।
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