मुंह के कैंसर का सबसे बड़ा कारण बना गुटखा और खैनी का सेवन, शरीर के भीतर धीरे-धीरे स्थायी नुकसान पहुंचाते हैं ये हानिकारक पदार्थ

उत्तराखंड के हल्द्वानी में स्थित स्वामी राम कैंसर संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर एवं वरिष्ठ कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉक्टर ललित मोहन ने इस जानलेवा बीमारी के शुरुआती संकेतों और पहचान के तरीकों पर अत्यंत महत्वपूर्ण चिकित्सीय जानकारियां साझा की हैं। उन्होंने विस्तार से बताया कि यदि कि

May 31, 2026 - 11:42
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मुंह के कैंसर का सबसे बड़ा कारण बना गुटखा और खैनी का सेवन, शरीर के भीतर धीरे-धीरे स्थायी नुकसान पहुंचाते हैं ये हानिकारक पदार्थ
मुंह के कैंसर का सबसे बड़ा कारण बना गुटखा और खैनी का सेवन, शरीर के भीतर धीरे-धीरे स्थायी नुकसान पहुंचाते हैं ये हानिकारक पदार्थ
  • विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर स्वास्थ्य चिकित्सा अधिकारियों की बड़ी अपील, जानलेवा तंबाकू उत्पादों से पूरी तरह दूरी बनाने की आवश्यकता
  • हल्द्वानी के राज्य कैंसर संस्थान में विशेष प्रिवेंटिव ऑन्कोलॉजी ओपीडी शुरू, शुरुआती लक्षणों को पहचानकर तुरंत परामर्श लेने की सलाह

वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए तंबाकू का सेवन एक अत्यंत गंभीर और जानलेवा चुनौती बन चुका है। प्रतिवर्ष लाखों लोग तंबाकू जनित गंभीर बीमारियों के कारण अपनी असमय जान गंवा देते हैं। आधुनिक जीवनशैली में धूम्रपान, गुटखा, खैनी, जर्दा और विभिन्न प्रकार के पान मसालों का सेवन तेजी से बढ़ा है, जो मानव शरीर के भीतर अत्यंत विनाशकारी प्रभाव पैदा कर रहा है। चिकित्सा क्षेत्र में लगातार हो रहे शोध बताते हैं कि इन जहरीले उत्पादों का निरंतर सेवन न केवल व्यक्ति के फेफड़ों को नष्ट करता है, बल्कि शरीर के हर एक महत्वपूर्ण अंग को कैंसर जैसी असाध्य बीमारी की ओर धकेलता है। इसी वैश्विक स्वास्थ्य संकट को ध्यान में रखते हुए समाज को इस धीमे जहर के प्रति सचेत करने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। तंबाकू और उससे निर्मित होने वाले सभी प्रकार के नशीले उत्पादों से पूरी तरह दूर रहने के लिए चिकित्सा जगत के अग्रणी अधिकारियों ने एक बेहद महत्वपूर्ण और व्यापक जनहित अपील जारी की है। विश्व तंबाकू निषेध दिवस की पूर्व संध्या पर देश और प्रदेश के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि शौक या लत के रूप में शुरू किया गया तंबाकू का सेवन किस तरह जीवन का अंत कर देता है। धूम्रपान, सिगरेट, बीड़ी, जर्दा, खैनी और पान मसाला केवल एक लत नहीं हैं, बल्कि ये सीधे तौर पर कैंसर जैसी भयानक और जानलेवा बीमारियों के सबसे बड़े जन्मदाता हैं। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, तंबाकू में पाए जाने वाले अत्यधिक विषैले और कार्सिनोजेनिक तत्व मानव कोशिकाओं की सामान्य संरचना को पूरी तरह से विकृत कर देते हैं, जिससे शरीर के भीतर अनियंत्रित रूप से ट्यूमर बनने लगते हैं।

इस जानलेवा लत के कारण होने वाले शारीरिक नुकसानों का दायरा केवल फेफड़ों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मानव शरीर के विभिन्न अंगों को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन करने से मुंह, जीभ, मसूड़ों, गले, फेफड़े, भोजन नली, अग्न्याशय, आमाशय, मूत्राशय और गुर्दे समेत शरीर के अनेक आंतरिक हिस्सों में कैंसर होने का जोखिम कई सौ गुना अधिक बढ़ जाता है। विशेष रूप से जो लोग चबाने वाले तंबाकू जैसे गुटखा और खैनी का इस्तेमाल करते हैं, उनके मुंह की आंतरिक परतें लगातार रासायनिक घर्षण और विषैले रसायनों के संपर्क में रहती हैं। यह स्थिति धीरे-धीरे कोशिकाओं के डीएनए को स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त कर देती है, जिसके परिणामस्वरूप एक स्वस्थ व्यक्ति बहुत ही कम समय में मुंह के लाइलाज कैंसर की दर्दनाक गिरफ्त में आ जाता है।

उत्तराखंड के हल्द्वानी में स्थित स्वामी राम कैंसर संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर एवं वरिष्ठ कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉक्टर ललित मोहन ने इस जानलेवा बीमारी के शुरुआती संकेतों और पहचान के तरीकों पर अत्यंत महत्वपूर्ण चिकित्सीय जानकारियां साझा की हैं। उन्होंने विस्तार से बताया कि यदि किसी व्यक्ति के मुंह के भीतर सफेद, लाल या मिश्रित रंग के अजीब से चकत्ते दिखाई देने लगें, तो इसे बेहद गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, मुंह के भीतर बार-बार छालों का होना, भोजन या पानी निगलने में लगातार कठिनाई महसूस होना, बिना किसी ठंडे-गर्म के भी लगातार सूखी या बलगम वाली खांसी बने रहना और आवाज में अचानक भारीपन या बदलाव आना भी इस खतरनाक बीमारी के प्रारंभिक लक्षण हो सकते हैं। एक और अत्यंत सामान्य लक्षण यह है कि व्यक्ति का मुंह पूरी तरह से खुलना बंद हो जाता है, जिसे चिकित्सा की भाषा में सबम्यूकस फाइब्रोसिस कहा जाता है, और बिना किसी स्पष्ट कारण के शरीर का वजन बहुत तेजी से घटने लगता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, आम जनता में सबसे बड़ी समस्या यह देखी जाती है कि लोग इन शुरुआती और स्पष्ट चेतावनी संकेतों को सामान्य छाला या सामान्य कमजोरी मानकर पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हैं। इस लापरवाही के कारण जब तक मरीज किसी विशेषज्ञ चिकित्सक के पास पहुंचता है, तब तक बीमारी अपने तीसरे या चौथे चरण में प्रवेश कर चुकी होती है, जहां इलाज अत्यंत जटिल, खर्चीला और कई बार निष्प्रभावी हो जाता है। डॉक्टर ललित मोहन ने दृढ़ता से सलाह दी है कि इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई देने पर घरेलू नुस्खों या साधारण डॉक्टरों के चक्कर में समय बर्बाद करने के बजाय तुरंत किसी मान्यता प्राप्त कैंसर संस्थान या विशेषज्ञ ऑन्कोलॉजिस्ट से मिलकर बायोप्सी और अन्य जरूरी जांचें करानी चाहिए ताकि समय रहते जीवन को बचाया जा सके। हल्द्वानी के राज्य कैंसर संस्थान में आम नागरिकों की सुविधा और कैंसर की समय पूर्व रोकथाम के लिए प्रत्येक बुधवार को एक विशेष 'प्रिवेंटिव ऑन्कोलॉजी' (कैंसर रोकथाम) ओपीडी का विधिवत संचालन किया जा रहा है। इस विशेष ओपीडी के माध्यम से आम लोगों को कैंसर से बचने के उपाय, तंबाकू की लत को वैज्ञानिक तरीके से छोड़ने की थेरेपी, बीमारी की प्रारंभिक पहचान के लिए स्क्रीनिंग और एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के संबंध में पूरी तरह से निःशुल्क और सटीक चिकित्सीय परामर्श उपलब्ध कराया जाता है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में यदि कैंसर के मामलों का सांख्यिकीय अध्ययन किया जाए, तो यह बेहद डरावनी सच्चाई सामने आती है कि देश में मुंह के कैंसर के जितने भी मामले दर्ज किए जाते हैं, उनमें से अधिकांश के पीछे तंबाकू उत्पादों का प्रत्यक्ष सेवन ही एकमात्र सबसे मुख्य कारण पाया गया है। हमारे समाज में एक बहुत ही भ्रामक और गलत धारणा फैली हुई है कि कई लोग बरसों से तंबाकू खा रहे हैं और उन्हें कोई परेशानी नहीं हो रही है, इसलिए यह सुरक्षित है। चिकित्सा विज्ञान इस भ्रामक सोच को पूरी तरह से खारिज करता है क्योंकि तंबाकू के भीतर मौजूद धीमा जहर शरीर के आंतरिक अंगों, धमनियों और प्रतिरोधी क्षमता को धीरे-धीरे और चुपचाप इस कदर खोखला कर देता है कि व्यक्ति को लंबे समय तक किसी बाहरी दर्द का अहसास ही नहीं होता। जब यह नुकसान अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाता है, तब अचानक बीमारी एक विकराल रूप में सामने आती है और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

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