UPI MDR Charges: यूपीआई पर एमडीआर को लेकर वित्त मंत्री का बड़ा बयान, बोलीं- 'यह न तो कोई टैक्स है और न ही सेस'

UPI पर एमडीआर (MDR) को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई टैक्स या सेस नहीं है और इसका पैसा सरकारी खजाने में नहीं जाता।

Sep 22, 2026 - 10:39
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UPI MDR Charges: यूपीआई पर एमडीआर को लेकर वित्त मंत्री का बड़ा बयान, बोलीं- 'यह न तो कोई टैक्स है और न ही सेस'

नई दिल्ली। देश में डिजिटल भुगतान की रीढ़ बन चुके यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाए जाने की चर्चाओं और सोशल मीडिया पर फैल रही विभिन्न आशंकाओं के बीच केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। वित्त मंत्री ने जोर देकर कहा है कि एमडीआर को लेकर आम जनता और व्यापारियों के बीच फैलाई जा रही भ्रांतियां पूरी तरह निराधार हैं। उन्होंने साफ शब्दों में स्पष्ट किया कि एमडीआर न तो सरकार द्वारा लगाया जाने वाला कोई नया टैक्स है और न ही यह किसी प्रकार का सेस (उपकर) है। इसका एक भी पैसा केंद्र या राज्य सरकार के खजाने में नहीं जाता है।

वित्त मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब उद्योग जगत और बैंकिंग विश्लेषकों के बीच यूपीआई के बुनियादी ढांचे की भारी लागत, सर्वर मेंटेनेंस और बैंकों के परिचालन घाटे को पूरा करने के लिए वाणिज्यिक लेनदेन पर सेवा शुल्क की बहाली को लेकर बहस तेज थी। कई हलकों में यह दावा किया जा रहा था कि सरकार राजस्व जुटाने के लिए डिजिटल लेन-देन पर कर लगाने की तैयारी कर रही है। वित्त मंत्री ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए एमडीआर के वित्तीय चक्र और इसकी वास्तविक उपयोगिता को विस्तार से समझाया।

क्या होता है एमडीआर और कहां जाता है इसका पैसा?

मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर वह तकनीकी और प्रशासनिक लागत होती है जो डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले व्यापारी (मर्चेंट) द्वारा सेवा प्रदाताओं को दी जाती है। वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि जब भी किसी डिजिटल माध्यम पर एमडीआर की बात होती है, तो उसका सीधा संबंध तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) के रखरखाव से होता है।

उन्होंने बताया कि इस शुल्क का एक-एक पैसा उन संस्थाओं के पास जाता है जो चौबीसों घंटे बिना किसी रुकावट के डिजिटल भुगतान नेटवर्क को सुरक्षित और सुचारू बनाए रखती हैं। इसमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

  1. अधिग्रहणकर्ता बैंक (Acquirer Banks): जो मर्चेंट के खाते और क्यूआर कोड का प्रबंधन करते हैं।

  2. भुगतान सेवा प्रदाता (Fintech PSOs): फोनपे, गूगल पे, पेटीएम जैसे तकनीकी एग्रीगेटर जो यूजर इंटरफेस उपलब्ध कराते हैं।

  3. एनपीसीआई और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर: नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और स्विचिंग नेटवर्क, जो सेकंडों में एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में फंड ट्रांसफर को सत्यापित करते हैं।

  4. साइबर सुरक्षा और सर्वर अपग्रेडेशन: डेटा एन्क्रिप्शन, फ्रॉड डिटेक्शन और भारी ट्रैफिक लोड को संभालने के लिए डेटा सेंटर्स का विस्तार।

वित्त मंत्री के अनुसार, यह पूरी तरह एक सेवा-आधारित लागत पुनर्प्राप्ति (Cost Recovery) प्रणाली है, जिसे टैक्स का रूप देकर जनता को भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए।

आम उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों के लिए राहत बरकरार

आम नागरिकों और सड़क किनारे ठेले-खोमचे लगाने वाले छोटे दुकानदारों की चिंताओं को दूर करते हुए सरकार ने दोहराया है कि सामान्य नागरिक-से-नागरिक (P2P) ट्रांसफर पूरी तरह निःशुल्क है और उस पर किसी भी प्रकार का अधिभार लगाने का कोई विचार नहीं है।

वर्तमान व्यवस्था के तहत सामान्य किराना दुकानों और छोटे रिटेलर्स पर लगने वाले शून्य-एमडीआर (Zero-MDR) के कारण होने वाले वित्तीय नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार अपने बजटीय समर्थन (सब्सिडी) के माध्यम से बैंकों को करती रही है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) और नकदी रहित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए आम उपभोक्ता पर कोई अतिरिक्त वित्तीय भार नहीं डाला जाना चाहिए।

डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिरता पर क्यों हो रही है बहस?

देश में हर महीने यूपीआई के जरिए अरबों लेन-देन हो रहे हैं और यह आंकड़ा निरंतर बढ़ता जा रहा है। इतने विशाल डेटा ट्रैफिक को संभालने के लिए बैंकों और फिनटेक कंपनियों को लगातार अपने कोर बैंकिंग सॉल्यूशंस (CBS), सर्वर बैंडविड्थ और साइबर सुरक्षा तंत्र पर भारी पूंजीगत खर्च (Capex) करना पड़ रहा है।

बैंकिंग जगत लंबे समय से यह मांग उठाता रहा है कि बड़े कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों, सुपरमार्केट्स और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर होने वाले बड़े वित्तीय लेन-देन के लिए एक तर्कसंगत एमडीआर मॉडल तय किया जाना चाहिए, ताकि निजी निवेश को बनाए रखा जा सके। वित्त मंत्री ने रेखांकित किया कि सरकार इस बात से भली-भांति अवगत है कि बुनियादी ढांचे को टिकाऊ (सस्टेनेबल) बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन इसके लिए कोई भी नीतिगत निर्णय सभी हितधारकों के हितों और डिजिटल लेनदेन की गति को बाधित किए बिना ही लिया जाएगा।

पारदर्शी और सुरक्षित डिजिटल व्यवस्था की प्रतिबद्धता

वित्त मंत्री ने जोर देकर कहा कि भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) आज पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बन चुकी है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी वैश्विक संस्थाएं भारत के यूपीआई मॉडल की सराहना कर चुकी हैं। ऐसे में सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाएगी जिससे आम लोगों का डिजिटल व्यवस्था पर से विश्वास डगमगाए।

उन्होंने दोहराया कि जब भी प्रणाली में किसी तकनीकी शुल्क या वाणिज्यिक संशोधन की आवश्यकता होगी, तो उसकी घोषणा पूरी पारदर्शिता के साथ की जाएगी। उपभोक्ताओं को किसी भी अनौपचारिक अफवाह या भ्रामक प्रचार से विचलित होने की आवश्यकता नहीं है; भारत का डिजिटल भुगतान तंत्र पूरी तरह सुरक्षित, भरोसेमंद और जनसुलभ बना रहेगा।

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