Gold Price Outlook: क्या ₹3.47 लाख तक पहुंचेगा 10 ग्राम सोना? वैश्विक ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने बताए तेजी के बड़े कारण

वैश्विक निवेश फर्म जेफरीज के क्रिस वुड के अनुसार सोना अंतरराष्ट्रीय बाजार में $10,000 प्रति औंस और भारत में ₹3.47 लाख प्रति 10 ग्राम तक पहुंच सकता है। जानिए इसके मुख्य कारण।

Sep 17, 2026 - 17:01
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Gold Price Outlook: क्या ₹3.47 लाख तक पहुंचेगा 10 ग्राम सोना? वैश्विक ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने बताए तेजी के बड़े कारण
  • Gold Price Outlook: क्या ₹3.47 लाख तक पहुंचेगा 10 ग्राम सोना? वैश्विक ब्रोकरेज फर्म जेफरीज ने बताए तेजी के बड़े कारण
  • सोने में महा-तेजी का अनुमान: जेफरीज के क्रिस वुड का दावा- $10,000 प्रति औंस तक जा सकता है भाव, भारतीय बाजार पर पड़ेगा सीधा असर
  • Gold Target Price: MCX पर 3 लाख के पार जा सकता है सोना, जानिए ग्लोबल इनवेस्टमेंट फर्म ने क्यों जताया कीमतों के दोगुने होने का भरोसा
  • Bullion Market Forecast: डॉलर का घटता दबदबा और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, जेफरीज की रिपोर्ट में सोने को लेकर हैरान करने वाला अनुमान

वैश्विक वित्तीय और कमोडिटी बाजारों में सोने की कीमतों को लेकर अक्सर दीर्घकालिक अनुमान लगाए जाते रहे हैं, लेकिन प्रमुख अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज एवं निवेश फर्म जेफरीज (Jefferies) के ताजा विश्लेषण ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और सराफा विशेषज्ञों का ध्यान मजबूती से खींचा है। जेफरीज के ग्लोबल इक्विटी स्ट्रैटेजी हेड क्रिस वुड ने अनुमान जताया है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक समीकरणों, डॉलर की स्थिति और मौद्रिक नीतियों के दीर्घकालिक असर के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 10,000 डॉलर प्रति औंस के जादुई आंकड़े तक पहुंच सकता है।

यदि यह वैश्विक अनुमान भारतीय कमोडिटी बाजार और मुद्रा विनिमय दर (रुपया बनाम डॉलर) के धरातल पर सटीक बैठता है, तो मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर 10 ग्राम सोने का भाव उछलकर लगभग 3.47 लाख रुपये के ऐतिहासिक स्तर तक जा सकता है। मौजूदा स्तरों से देखा जाए तो यह संभावित वृद्धि कीमतों के दोगुने से भी अधिक होने की ओर इशारा करती है। क्रिस वुड ने इस भारी तेजी के पीछे किसी तात्कालिक सट्टेबाजी को नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय तंत्र में आ रहे गहरे संरचनात्मक बदलावों को मुख्य आधार बताया है।

  • डॉलर के प्रभुत्व पर सवाल और 'डी-डॉलराइजेशन' का दौर

क्रिस वुड के अनुसार, इस संभावित ऐतिहासिक तेजी का सबसे बड़ा आधार वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर के पारंपरिक एकाधिकार को लग रहा झटका है। पिछले कई दशकों से दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सबसे अधिक हिस्सेदारी अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड और डॉलर के रूप में रखते आए हैं।

हालांकि, भू-राजनीतिक तनावों, आर्थिक प्रतिबंधों के बढ़ते प्रयोग और अमेरिका के तेजी से बढ़ते राष्ट्रीय ऋण ने कई उभरते देशों को अपने संप्रभु कोष (सॉवरेन फंड्स) के विविधीकरण के लिए विवश किया है। रूस-यूक्रेन संकट के बाद पश्चिमी देशों द्वारा विदेशी संपत्तियों को फ्रीज किए जाने की घटनाओं ने कई केंद्रीय बैंकों को सतर्क कर दिया है। परिणामस्वरूप, संप्रभु राष्ट्र अब अपनी वित्तीय सुरक्षा के लिए किसी एक मुद्रा पर निर्भर रहने के बजाय भौतिक सोने की जमाखोरी को प्राथमिकता दे रहे हैं।

  • केंद्रीय बैंकों की अभूतपूर्व खरीदारी बनी बड़ा संबल

रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC), भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), तुर्किये और मध्य पूर्व के कई देशों के केंद्रीय बैंक पिछले कुछ वर्षों से लगातार सोने की शुद्ध खरीदारी कर रहे हैं। केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने का संचय किसी अल्पकालिक मुनाफे के लिए नहीं होता, बल्कि यह रणनीतिक वित्तीय संप्रभुता का हिस्सा है।

सोना एक ऐसी संपत्ति है जिसके पीछे कोई 'काउंटरपार्टी रिस्क' (किसी दूसरे देश के डिफॉल्ट का जोखिम) नहीं होता। जब केंद्रीय बैंक बड़े पैमाने पर बाजार से भौतिक आपूर्ति अपने वॉल्ट में बंद करते हैं, तो वाणिज्यिक बाजार में उपलब्ध लिक्विड सोने की मात्रा सीमित हो जाती है। क्रिस वुड का मानना है कि केंद्रीय बैंकों की यह मांग चक्र आने वाले वर्षों में भी जारी रहेगा, जो कीमतों के लिए एक मजबूत फ्लोर (न्यूनतम आधार) तैयार करता है।

  • फिएट करेंसी की घटती साख और पश्चिमी देशों का कर्ज संकट

विश्लेषण का दूसरा प्रमुख स्तंभ पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका का बढ़ता वित्तीय घाटा और ऋण संकट है। अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुका है। क्रिस वुड के तर्क के अनुसार, इतनी बड़ी ऋण देनदारी को लंबे समय तक सामान्य आर्थिक विकास दर से साधना संभव नहीं दिखता।

ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंकों के पास अंततः ब्याज दरों को कम रखने या मौद्रिक विस्तार (नोट छपाई) का सहारा लेने का विकल्प ही बचता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब कागजी मुद्राओं (फिएट करेंसी) की आपूर्ति अत्यधिक बढ़ती है और उनकी वास्तविक क्रय शक्ति घटती है, तब-तब पूंजी का सबसे बड़ा प्रवाह सोने की ओर होता है, जो हजारों वर्षों से मुद्रास्फीति के खिलाफ सबसे अचूक ढाल रहा है। 1980 के दशक के गोल्ड बुल रन और 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद की तेजी इसी बुनियादी सिद्धांत पर आधारित थी।

  • भारतीय निवेशकों और घरेलू बाजार पर संभावित असर

भारत विश्व में सोने के सबसे बड़े खुदरा उपभोक्ताओं में से एक है। यहां सोने की मांग केवल निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक, सामाजिक और पारिवारिक सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा है।

यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोना 10,000 डॉलर प्रति औंस के स्तर को छूता है, तो इसके घरेलू बाजार पर गहरे प्रभाव पड़ेंगे:

घरेलू मूल्यांकन में भारी उछाल: भारतीय आयातकों को अंतरराष्ट्रीय भाव और डॉलर-रुपया विनिमय दर के हिसाब से भुगतान करना पड़ता है। रुपये में ऐतिहासिक रूप से रहने वाले अवमूल्यन के रुझान को जोड़ दिया जाए, तो 10 ग्राम सोने का भाव 3.47 लाख रुपये के स्तर तक पहुंचना स्वाभाविक गणितीय परिणाम बन सकता है।

पारिवारिक संपत्ति की कीमत में इजाफा: भारतीय परिवारों के पास संचित अनुमानित 25,000 टन से अधिक सोने का समग्र मूल्यांकन अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच जाएगा, जिससे ग्रामीण और शहरी भारत की घरेलू बैलेंस शीट काफी मजबूत होगी।

खरीदारी के तौर-तरीकों में बदलाव: इतने ऊंचे भाव होने पर भौतिक आभूषणों की भारी खरीदारी के बजाय डिजिटल गोल्ड, गोल्ड ईटीएफ (ETF) और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसे वित्तीय उत्पादों में अंशकालिक (फ्रैक्शनल) निवेश का चलन तेजी से बढ़ेगा।

  • क्या यह लक्ष्य रातों-रात हासिल होगा?

क्रिस वुड और वित्तीय जानकारों ने यह भी स्पष्ट किया है कि 10,000 डॉलर या 3.47 लाख रुपये का यह स्तर कोई दो-चार महीनों या एक साल का लक्ष्य नहीं है। यह एक बहु-वर्षीय (मल्टी-ईयर) दीर्घकालिक आर्थिक चक्र का अनुमान है। कमोडिटी बाजारों में सीधे एकतरफा उछाल नहीं आता; बीच-बीच में मुनाफावसूली, अल्पकालिक ब्याज दरों में फेरबदल और वैश्विक जोखिम धारणा में बदलाव के चलते 10 से 15 प्रतिशत तक के करेक्शन (गिरावट) भी देखने को मिलते हैं।

बाजार विशेषज्ञों की सलाह है कि व्यक्तिगत निवेशकों को ऐसे बड़े लक्ष्यों को देखकर अति-उत्साहित होकर अपनी पूरी पूंजी एक ही संपत्ति में नहीं झोंकनी चाहिए। समझदारी इसी में है कि समग्र निवेश पोर्टफोलियो का 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा व्यवस्थित रूप से (एसआईपी या गिरावट के समय खरीदारी के जरिए) सोने में बनाए रखा जाए, ताकि यह अनिश्चित वैश्विक माहौल में हेजिंग का कार्य कर सके।

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