Jantar Mantar Internet Shutdown: दिल्ली हाईकोर्ट में इंटरनेट बंदी के खिलाफ याचिका पर आज सुनवाई
Delhi HC Hearing: जंतर-मंतर के आसपास इंटरनेट सेवाएं निलंबित करने के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका पर आज अदालत में अहम सुनवाई होगी।

- दिल्ली: जंतर-मंतर पर इंटरनेट सेवा बंद करने के खिलाफ HC में सुनवाई आज, जानें क्या है पूरा मामला
- जंतर-मंतर पर इंटरनेट क्यों हुआ बंद? दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल, आज होगी अहम सुनवाई
- Delhi High Court: जंतर-मंतर पर इंटरनेट बंदी के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में आज होगी सुनवाई
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में प्रदर्शनों के प्रमुख केंद्र जंतर-मंतर के आसपास इंटरनेट सेवाएं निलंबित किए जाने के मामले ने अब कानूनी रूप ले लिया है। इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से बंद करने के प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) में एक याचिका दायर की गई है, जिस पर आज सुनवाई होनी है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस तरह से बिना किसी ठोस और पारदर्शी आधार के इंटरनेट बंद करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है। वहीं, पुलिस और प्रशासन का मानना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियातन यह कदम उठाया गया था। आज होने वाली यह सुनवाई न केवल इस मामले बल्कि भविष्य में जन-विरोध प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट निलंबन की प्रक्रियाओं के लिए भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
जंतर-मंतर पर हाल ही में आयोजित विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए प्रशासन द्वारा इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से बंद कर दी गई थीं। इंटरनेट ठप होने से न केवल प्रदर्शनकारियों बल्कि आसपास के दुकानदारों, रहवासियों और आम नागरिकों को भी दैनिक संचार, डिजिटल भुगतान और अन्य ऑनलाइन कार्यों में भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। इस प्रशासनिक निर्णय की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की गई, जिस पर अदालत ने आज की तारीख सुनवाई के लिए तय की है।
दिल्ली का जंतर-मंतर ऐतिहासिक रूप से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए जाना जाता है। हालिया प्रदर्शनों के दौरान कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के उद्देश्य से प्रशासन ने एहतियाती कदम उठाए। गृह विभाग और पुलिस प्रशासन द्वारा भारतीय टेलीकॉम नियमों (Temporary Suspension of Telecom Services Rules) के तहत इस क्षेत्र में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद करने का आदेश जारी कर दिया गया।
इस निर्णय के अमल में आते ही इलाके में इंटरनेट कनेक्टिविटी पूरी तरह ठप हो गई। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष अपनी बात रखते हुए कहा कि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता का पूरी तरह अभाव था और प्रशासन ने यह स्पष्ट नहीं किया कि स्थिति वास्तव में कितनी संवेदनशील थी। इंटरनेट आज के दौर में बुनियादी जरूरतों और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे मनमाने तरीके से निलंबित नहीं किया जाना चाहिए। इन सभी आपत्तियों को लेकर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया, जिसके बाद अदालत ने इस पूरे मामले पर आज सुनवाई करने का फैसला किया।
इस पूरे विषय पर याचिकाकर्ताओं और प्रशासनिक पक्ष के बीच दो स्पष्ट विचारधाराएं देखने को मिल रही हैं। याचिकाकर्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया है कि उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक अनुराधा भसीन फैसले के तहत इंटरनेट की पहुंच संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत एक मूल अधिकार है। उनका कहना है कि सुरक्षा के नाम पर इंटरनेट बंद करने का कोई भी फैसला अनुपातिकता (Proportionality) के सिद्धांत पर आधारित होना चाहिए और जनता को पूर्व सूचना मिलनी चाहिए।
दूसरी तरफ, दिल्ली पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों का यह मानना है कि प्रदर्शनों के दौरान अफवाहों के तेज प्रसार, भड़काऊ संदेशों के आदान-प्रदान और सुरक्षा संबंधी गंभीर खतरों को समय रहते रोकने के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य हो जाता है। पुलिस प्रशासन के अनुसार, इस प्रकार के एहतियाती फैसलों का मुख्य मकसद किसी भी अप्रिय घटना को रोकना और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है, न कि किसी के अधिकारों में बाधा डालना।
जंतर-मंतर जैसे व्यस्त व्यावसायिक और सार्वजनिक स्थान पर इंटरनेट सेवाएं ठप होने से व्यापक असर देखा गया। क्षेत्र में मौजूद व्यापारियों और दुकानदारों को सबसे अधिक समस्या का सामना करना पड़ा क्योंकि डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन ट्रांजेक्शन पूरी तरह रुक गए, जिससे उनके दैनिक कारोबार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। इसके साथ ही, आम लोगों और यात्रियों को ऐप-आधारित कैब बुकिंग, नेविगेशन और संचार संबंधी सेवाओं का उपयोग करने में खासी परेशानी उठानी पड़ी। इस घटना ने एक बार फिर देश में इंटरनेट निलंबन की प्रक्रिया, नागरिकों की सहूलियत और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ी राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है।
आज दिल्ली उच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई में अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगी। अदालत प्रशासन से यह स्पष्ट करने को कह सकती है कि इंटरनेट बंद करने के लिए किन मानदंडों का पालन किया गया था और क्या यह फैसला स्थिति के अनुसार अनिवार्य था। उच्च न्यायालय का फैसला यह तय करेगा कि भविष्य में ऐसे प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट निलंबन के क्या नियम होंगे और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा किस प्रकार की जाएगी।
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