PM Modi Statement: 'दिमाग़ी नक्सल' पर बोले पीएम मोदी- 'लाल क़िले से दी थी होमियोपैथी की गोली', जानिए पूरा मामला
PM Modi Statement: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'दिमागी नक्सलवाद' पर बड़ा बयान दिया है। लाल किले के भाषण का संदर्भ देते हुए पीएम ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी।

- 'लाल क़िले से होमियोपैथी की गोली दी थी...' पीएम मोदी ने 'दिमाग़ी नक्सल' पर दिया बड़ा बयान, जानिए क्या है पूरा विवाद
- PM Modi Urban Naxal Remark: 'दिमागी नक्सलवाद' पर पीएम मोदी का बड़ा बयान, लाल किले के भाषण का जिक्र कर कही यह बात
- PM Modi On Urban Naxalism: पीएम मोदी ने 'दिमागी नक्सलवाद' पर कसा तंज, कहा- लाल किले से दी थी होमियोपैथी की खुराक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'दिमागी नक्सलवाद' यानी अर्बन नक्सलिज्म के मुद्दे पर एक बार फिर बड़ा और तीखा बयान दिया है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने अपने लाल किले वाले भाषण का संदर्भ देते हुए कहा कि उन्होंने लाल किले की प्राचीर से देश के सामने इस विचारधारा के खतरे को रेखांकित करते हुए 'होमियोपैथी की एक गोली' दी थी। नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में देश की आंतरिक सुरक्षा और वैचारिक चुनौतियों पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री ने यह बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि नक्सलवाद केवल जंगलों और हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका बौद्धिक रूप समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित करने की कोशिश करता है। इस बयान के बाद देश के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर वैचारिक बहस तेज हो गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने संबोधन के दौरान 'दिमागी नक्सल' (Urban Naxalism) के खतरे को लेकर एक नया रूपक (Metaphor) इस्तेमाल किया है। पीएम मोदी ने कहा कि लाल किले से स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन के दौरान उन्होंने इस विषय पर जो चेतावनी दी थी, वह समाज और व्यवस्था को इस वैचारिक खतरे से सचेत करने के लिए 'होमियोपैथी की खुराक' की तरह थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश को भौतिक नक्सलवाद के साथ-साथ इस मानसिक और बौद्धिक नक्सलवाद से भी सतर्क रहने की आवश्यकता है, जो संस्थाओं और सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करने का प्रयास करता है।
प्रधानमंत्री का यह बयान उनके पूर्व में लाल किले से दिए गए राष्ट्रीय संबोधनों की निरंतरता में देखा जा रहा है। अपने भाषणों में पीएम मोदी अक्सर देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए वामपंथी उग्रवाद और उसके बौद्धिक समर्थकों को बड़ा खतरा बताते रहे हैं। नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि जब उन्होंने लाल किले से देश के सामने 'दिमागी नक्सल' का मुद्दा उठाया था, तो वह एक तरह से इस बीमारी के खिलाफ शुरुआती और धीमी लेकिन असरदार दवा यानी 'होमियोपैथी की गोली' की तरह थी।
पीएम मोदी के अनुसार, भौतिक क्षेत्र में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में भारी गिरावट आई है और सुरक्षा बलों ने उग्रवाद को सीमित करने में सफलता पाई है। लेकिन, शहरी क्षेत्रों और बौद्धिक विमर्श में मौजूद 'दिमागी नक्सलवाद' को पहचानना और उसके प्रभाव को बेअसर करना एक लंबी और सजग लड़ाई है। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं और नागरिकों को इस तरह की छद्म विचारधाराओं से बचाने के लिए निरंतर जागरूकता की जरूरत है।
प्रधानमंत्री के इस बयान पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सत्ता पक्ष के नेताओं ने पीएम मोदी के इस बयान का पुरजोर समर्थन किया है। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सही मुद्दा उठाया है, क्योंकि अर्बन नक्सलिज्म देश की अखंडता और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक अदृश्य लेकिन गंभीर खतरा है। सत्ता पक्ष के अनुसार, देश को बांटने और विकास की गति को रोकने वाली ताकतों को पहचानना बेहद जरूरी है।
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दलों और कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस तरह की शब्दावली के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है। विपक्ष का तर्क है कि 'अर्बन नक्सल' या 'दिमागी नक्सल' जैसे शब्दों का इस्तेमाल अक्सर सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाज दबाने के लिए किया जाता है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि लोकतंत्र में असहमति और आलोचना को नक्सलवाद से जोड़कर देखना अनुचित है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस बयान ने राष्ट्रीय विमर्श में एक बार फिर 'आंतरिक सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता' की बहस को केंद्र में ला दिया है। इस बयान का प्रभाव केवल राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों, मीडिया और सोशल मीडिया पर भी इस पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ केंद्र सरकार की रणनीति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि सरकार अब केवल हिंसक घटनाओं को रोकने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि उन वैचारिक और वित्तीय ढांचों पर भी नकेल कसने की तैयारी में है जो इस तरह की विचारधाराओं को प्रोत्साहन देते हैं। सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयानों से जांच एजेंसियों और प्रशासनिक तंत्र को ऐसे तत्वों के खिलाफ सतर्कता बढ़ाने का स्पष्ट संकेत मिलता है।
प्रधानमंत्री के इस कड़े रुख के बाद आने वाले दिनों में संसद से लेकर सड़क तक इस मुद्दे पर तीखी राजनीतिक बयानबाजी देखने को मिल सकती है। विपक्षी दल सरकार से इस बात का जवाब मांग सकते हैं कि आलोचकों और नक्सलियों के बीच का अंतर स्पष्ट किया जाए, जबकि सत्ता पक्ष इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता से जोड़कर जनता के बीच ले जाने का प्रयास करेगा।
प्रशासनिक स्तर पर भी आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियां और राज्य पुलिस बल शहरी क्षेत्रों में इस तरह के संदिग्ध नेटवर्क और फंडिंग स्रोतों पर अपनी निगरानी और सख्त कर सकते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी चुनावों में भी यह विषय सुरक्षा और राष्ट्रवाद के विमर्श का एक प्रमुख हिस्सा बना रहेगा।
What's Your Reaction?





