Fatehpur BSP Decline: कभी जिले की 5 सीटों पर था एकछत्र राज, अब सियासी वजूद बचाने को जूझ रही बसपा

फतेहपुर में कभी 5 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बहुजन समाज पार्टी आज अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। कद्दावर नेताओं के दल बदलने से संगठन कमजोर हुआ है।

Oct 9, 2026 - 12:05
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Fatehpur BSP Decline: कभी जिले की 5 सीटों पर था एकछत्र राज, अब सियासी वजूद बचाने को जूझ रही बसपा
  • फतेहपुर में बसपा का सियासी ग्राफ गिरा: पुराने दिग्गजों ने थामा सपा-भाजपा का दामन, काडर वोट बैंक में भी बिखराव
  • UP Politics: फतेहपुर में कैसे ढहा बहुजन समाज पार्टी का मजबूत किला? सोशल इंजीनियरिंग टूटने से हाशिए पर नीला झंडा
  • Fatehpur News: कभी बसपा की तूती बोलती थी यहां, आज जमानत बचाने की नौबत; जमीनी पकड़ खोने की इनसाइड स्टोरी

उत्तर प्रदेश की सियासत में 'सोशल इंजीनियरिंग' और मजबूत काडर आधारित संगठन के दम पर चार बार हुकूमत करने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए गंगा और यमुना के दोआब में स्थित फतेहपुर जिला कभी सबसे अभेद्य दुर्ग माना जाता था। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों में जब मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, तब फतेहपुर जिले की कुल 6 विधानसभा सीटों में से 5 सीटों पर बसपा प्रत्याशियों ने ऐतिहासिक विजय हासिल कर परचम लहराया था। आज वही जिला बसपा के लिए राजनीतिक अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई का केंद्र बन चुका है। हालिया चुनावों में पार्टी यहां न सिर्फ जीत से कोसों दूर रही, बल्कि कई सीटों पर उसके उम्मीदवारों को अपनी जमानत तक गंवानी पड़ गई है।

कभी जिस दल से राजनीतिक आगाज कर कई नेताओं ने मंत्री और विधायक का पद हासिल किया, आज वही दिग्गज चेहरे बसपा का साथ छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में अपना भविष्य तलाश चुके हैं। फतेहपुर में बसपा के इस संगठनात्मक बिखराव और सिमटते जनाधार ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्षेत्रीय समीकरणों के तेजी से बदलते मिजाज को उजागर कर दिया है।

  • 2007 का वह दौर: जब जिले में लहराता था नीला झंडा

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव फतेहपुर में बसपा के चरम उत्कर्ष का समय थे। उस समय जिले की बिंदकी, जहानाबाद, फतेहपुर सदर, हसवा (अब हुसेनगंज) और खागा सीटों पर बसपा ने विरोधियों को धूल चटाते हुए शानदार जीत दर्ज की थी।

दलित-पिछड़ा-ब्राह्मण गठजोड़: उस दौर में पार्टी संस्थापक कांशीराम के वैचारिक आधार और मायावती के 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' के फॉर्मूले ने जिले के सामाजिक ताने-बाने को पूरी तरह अपने पाले में कर लिया था।

सत्ता में भारी दखल: जिले से चुनकर आए कई विधायकों को मायावती मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी दी गई थी, जिससे प्रशासन और पुलिस महकमे में स्थानीय स्तर पर बसपा नेताओं का भारी प्रभाव रहता था।

मजबूत काडर कैंप: बामसेफ और डीएस-4 की पृष्ठभूमि से निकले समर्पित काडर कार्यकर्ता बूथ स्तर तक सक्रिय थे, जिससे वोटरों को मतदान केंद्र तक पहुंचाना बेहद सहज होता था।

  • बड़े नेताओं का मोहभंग: एक-एक कर छूटा पुराना साथ

फतेहपुर में बसपा के पतन की सबसे बड़ी वजह स्थापित और जनाधार वाले नेताओं का दल छोड़ना रहा है। पार्टी हाईकमान की कार्यशैली, चुनाव दर चुनाव टिकट वितरण में होने वाले अचानक बदलावों और लगातार निष्कासन की नीति ने संगठन की रीढ़ तोड़ दी।

जिले के कई पूर्व विधायक और कद्दावर नेता, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत बसपा के नीले झंडे तले की थी, आज विरोधी खेमों में बैठकर रणनीति बना रहे हैं। अयोध्या प्रसाद पाल जैसे कई दिग्गज नेता, जो कभी बसपा के प्रमुख रणनीतिकार और पूर्व मंत्री रहे, पार्टी से किनारा कर चुके हैं। इसी तरह जहानाबाद, बिंदकी और सदर क्षेत्रों के कई जमीनी नेता या तो भाजपा के 'कमल' के साथ चले गए या फिर सपा की 'साइकिल' पर सवार हो गए। नेताओं के जाने के साथ ही उनका व्यक्तिगत प्रभाव और वर्षों में तैयार हुआ कार्यकर्ता नेटवर्क भी दूसरी पार्टियों में स्थानांतरित हो गया।

  • काडर में बिखराव और सोशल इंजीनियरिंग की दरार

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, फतेहपुर में बसपा की जमीन खिसकने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण रहे हैं:

गैर-जाटव दलित और पिछड़ा वर्ग का स्थानांतरण: भाजपा ने पिछले एक दशक में गैर-जाटव दलित जातियों (जैसे पासी, कोरी, धोबी) और गैर-यादव पिछड़ी जातियों (कुर्मी, मौर्य, लोध) को अपने पाले में मजबूती से जोड़ लिया। फतेहपुर में कुर्मी और निषाद आबादी का बड़ा प्रभाव है, जो कभी बसपा के साथ था, लेकिन अब पूरी तरह भाजपा और सपा में बंट चुका है।

मुस्लिम मतदाताओं का सपा की ओर झुकाव: 2017 के बाद से राज्य में द्विध्रुवीय (BJP vs SP) मुकाबला बनने के कारण मुस्लिम मतदाता रणनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी के साथ लामबंद हो गए, जिससे बसपा का परंपरागत सामाजिक समीकरण बिखर गया।

युवा नेतृत्व का अभाव: बहुजन समाज पार्टी में लंबे समय तक नई पीढ़ी के कार्यकर्ताओं को आगे लाने या स्थानीय स्तर पर आंदोलनकारी राजनीति खड़ा करने की कमी देखी गई। जमीन पर सड़कों पर उतरकर जनहित के मुद्दों पर संघर्ष न करने से युवा मतदाता पार्टी से छिटक गए।

  • तीसरे और चौथे स्थान पर सिमटी पार्टी

2022 के विधानसभा चुनाव और हालिया लोकसभा चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि फतेहपुर संसदीय सीट और इसके अंतर्गत आने वाली विधानसभाओं में बसपा अधिकांश स्थानों पर तीसरे या चौथे स्थान पर खिसक चुकी है। कई क्षेत्रों में पार्टी का वोट शेयर दहाई के आंकड़े को भी नहीं छू सका।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यदि बसपा को फतेहपुर जैसे अपने पुराने गढ़ों में वापसी करनी है, तो उसे केवल चुनावी रैलियों पर निर्भर रहने के बजाय जमीनी स्तर पर संगठन का पुनर्गठन करना होगा। पुराने उपेक्षित कार्यकर्ताओं की घर वापसी और स्थानीय मुद्दों पर लगातार जनसंवाद ही पार्टी को इस अभूतपूर्व राजनीतिक संकट से बाहर निकाल सकता है।

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