इफ्तार पार्टी में अपमान से भड़का शिया समुदाय: 'ईरान चले जाओ' के तंज ने पाकिस्तान में मचाया भारी कोहराम

ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध की स्थिति ने इस आग में घी डालने का काम किया है। पाकिस्तान के भीतर शिया समुदाय ईरान के समर्थन में प्रदर्शन कर रहा है, जबकि पाकिस्तानी सेना और सरकार वैश्विक दबाव के कारण एक संतुलित

Mar 21, 2026 - 12:27
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इफ्तार पार्टी में अपमान से भड़का शिया समुदाय: 'ईरान चले जाओ' के तंज ने पाकिस्तान में मचाया भारी कोहराम
इफ्तार पार्टी में अपमान से भड़का शिया समुदाय: 'ईरान चले जाओ' के तंज ने पाकिस्तान में मचाया भारी कोहराम

पाकिस्तान में छिड़ा आंतरिक गृहयुद्ध: शिया नेताओं का सेना प्रमुख असीम मुनीर के खिलाफ खुला विद्रोह

सैन्य नेतृत्व और मजहबी गुरुओं में ठनी: पाकिस्तान के शिया नेता मोहम्मद शिफा नजफी ने दी बड़े आंदोलन की चेतावनी

पाकिस्तान के आधिकारिक हलकों में 19 मार्च की शाम एक सामान्य इफ्तार सभा के रूप में शुरू हुई थी, लेकिन यह जल्द ही एक बड़े राष्ट्रीय विवाद में बदल गई। इस हाई-प्रोफाइल कार्यक्रम में देश के विभिन्न संप्रदायों के प्रमुख धार्मिक गुरुओं को आमंत्रित किया गया था। चश्मदीदों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, बातचीत के दौरान जब क्षेत्रीय सुरक्षा और ईरान के साथ पाकिस्तान के संबंधों का जिक्र आया, तब शिया नेताओं के प्रति बेहद कठोर और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया। शिया मौलानाओं का आरोप है कि उन्हें केवल उनके धार्मिक विश्वास और ईरान के प्रति सहानुभूति रखने के आधार पर निशाना बनाया गया। इस घटना ने साबित कर दिया है कि पाकिस्तान के भीतर संप्रदायों के बीच की खाई अब पाटने योग्य नहीं रह गई है, और राज्य प्रायोजित भेदभाव अब शीर्ष स्तर तक पहुंच चुका है।

इस विवाद की सबसे तीखी प्रतिक्रिया पाकिस्तान के वरिष्ठ शिया धर्मगुरु मोहम्मद शिफा नजफी की ओर से आई है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस बात की पुष्टि की है कि इफ्तार पार्टी के दौरान शिया नेतृत्व को यह कहकर अपमानित किया गया कि यदि उन्हें ईरान की नीतियों और वहां की विचारधारा से इतना ही लगाव है, तो उन्हें पाकिस्तान छोड़कर ईरान चले जाना चाहिए। नजफी ने इसे न केवल शिया समुदाय का अपमान बताया, बल्कि इसे पाकिस्तान के संविधान द्वारा दिए गए नागरिक अधिकारों का उल्लंघन भी करार दिया। उनका कहना है कि दशकों से देश की सेवा करने वाले नागरिकों को उनकी आस्था के आधार पर देश छोड़ने की सलाह देना सैन्य और प्रशासनिक अहंकार का पराकाष्ठा है। इस बयान के बाद पूरे पाकिस्तान में शिया संगठनों ने एकजुट होकर सेना की इस मानसिकता के खिलाफ विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया है।

पाकिस्तान में शिया-सुन्नी संघर्ष का इतिहास पुराना है, लेकिन मौजूदा हालात इसलिए अधिक गंभीर हैं क्योंकि अब सीधे तौर पर सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर को इस असंतोष का केंद्र बनाया जा रहा है। शिया नेताओं का मानना है कि सेना के भीतर कुछ तत्व कट्टरपंथी विचारधाराओं को बढ़ावा दे रहे हैं और जानबूझकर शिया अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलने की कोशिश की जा रही है। असीम मुनीर के कार्यकाल के दौरान यह पहली बार है जब किसी धार्मिक अल्पसंख्यक समूह ने इतनी मुखरता से सैन्य नेतृत्व की आलोचना की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सेना ने जल्द ही इस मामले में माफी नहीं मांगी या बीच-बचाव नहीं किया, तो यह असंतोष एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले सकता है, जिससे पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। पाकिस्तान की कुल जनसंख्या में शिया समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 15 से 20 प्रतिशत है। ईरान के साथ पाकिस्तान की सीमा साझा होती है और सांस्कृतिक व धार्मिक समानता के कारण पाकिस्तानी शियाओं का ईरान के प्रति स्वाभाविक झुकाव रहता है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान-ईरान सीमा पर हुई सैन्य झड़पों और आतंकवाद विरोधी अभियानों ने इस समुदाय को अक्सर दोहरी वफादारी के संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।

ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध की स्थिति ने इस आग में घी डालने का काम किया है। पाकिस्तान के भीतर शिया समुदाय ईरान के समर्थन में प्रदर्शन कर रहा है, जबकि पाकिस्तानी सेना और सरकार वैश्विक दबाव के कारण एक संतुलित या तटस्थ रुख अपनाने की कोशिश कर रही है। इफ्तार पार्टी में हुई घटना इसी कूटनीतिक दबाव का परिणाम मानी जा रही है, जहां सैन्य अधिकारियों ने कथित तौर पर शिया नेताओं को यह समझाने की कोशिश की कि उनकी 'ईरान समर्थक' गतिविधियां पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ जा सकती हैं। हालांकि, जिस भाषा और लहजे का उपयोग किया गया, उसने सुरक्षा चिंताओं को सांप्रदायिक नफरत में बदल दिया। इससे यह संदेश गया है कि पाकिस्तान में अब धार्मिक राष्ट्रवाद के नाम पर एक विशेष समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है।

इस घटना के बाद कराची, लाहौर, क्वेटा और इस्लामाबाद जैसे बड़े शहरों में शिया समुदाय के लोगों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे इस देश के समान नागरिक हैं और किसी को भी उनकी वफादारी पर सवाल उठाने का हक नहीं है। मोहम्मद शिफा नजफी ने चेतावनी दी है कि यदि इस अपमान के लिए जवाबदेही तय नहीं की गई, तो वे देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों को और तेज करेंगे। स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों ने इस हंगामे को दबाने के लिए कई स्थानों पर बल प्रयोग भी किया है, जिससे स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई है। यह विवाद अब केवल एक इफ्तार पार्टी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पाकिस्तान के अस्तित्व और वहां की धार्मिक विविधता के भविष्य से जुड़ गया है।

आंतरिक रूप से कमजोर पाकिस्तान के लिए यह सांप्रदायिक तनाव एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है। एक तरफ जहां बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में उग्रवाद चरम पर है, वहीं अब शहरी इलाकों में धार्मिक विद्रोह की सुगबुगाहट ने सेना की नींद उड़ा दी है। जनरल असीम मुनीर के लिए यह स्थिति एक बड़ी परीक्षा की तरह है। यदि वे शिया समुदाय को शांत करने में विफल रहते हैं, तो देश के भीतर शिया-सुन्नी दंगों का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा, ईरान के साथ संबंधों में भी खटास आ सकती है, क्योंकि तेहरान हमेशा से पाकिस्तान में शियाओं के उत्पीड़न पर कड़ी नजर रखता आया है। इफ्तार पार्टी की यह घटना पाकिस्तान की विदेश नीति और आंतरिक सुरक्षा नीति के बीच के गहरे अंतर्विरोधों को बयां कर रही है।

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